भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 621

हे पृथ्वी आदि को जन्म देने वाले इंद्र! तुमने अत्यंत विशाल बनकर जल को घेरकर सोए हुए एवं स्वयं को बलवान् समझने वाले अहि राक्षस को मारा था। जब तुम अपनी बगल में धरती को दबा लेते हो, उस समय स्वर्ग तुम्हारी महिमा को नहीं जान पाता. (११) यज्ञो हि त इन्द्र वर्धनो भूदुत प्रियः सुतसोमो मियेधः. यज्ञेन यज्ञमव यज्ञियः सन्यज्ञस्ते वज्रमहिहत्य आवत्.. (१२) हे इंद्र! हमारा यज्ञ तुम्हारी वृद्धि करता है. सोम निचोड़े जाने के कारण हमारा यज्ञ तुम्हें प्रिय है. हे यज्ञ योग्य इंद्र! यज्ञ के द्वारा यजमान की रक्षा करो. यह वृत्र को मारते समय तुम्हारे वज्र की रक्षा करे. (१२) यज्ञेनेन्द्रमवसा चक्रे अर्वागैनं सुम्नाय नव्यसे ववृत्याम्. यः स्तोमेभिर्वावृधे पूर्व्येभिर्यो मध्यमेभिरुत नूतनेभिः.. (१३) जो इंद्र प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक स्तोत्रों द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उन्हीं को यजमान रक्षा करने वाले यज्ञ के द्वारा अपनी ओर आकृष्ट करता है एवं नवीन धन प्राप्त करने के लिए यज्ञ से ढकता है. (१३) विवेष यन्मा धिषणा जजान स्तवै पुरा पार्यादिन्द्रमह्णः. अंहसो यत्र पीपरद्यथा नो नावेव यान्तमुभये हवन्ते.. (१४) इंद्र की स्तुति करने का विचार जब मेरी बुद्धि में आता है, तब मैं स्तुति करता हूं. मैं अशुभ दिन आने के पहले ही इंद्र की स्तुति करता हूं. जिस प्रकार दोनों तटों वाले लोग नाव वाले को पुकारते हैं, उसी प्रकार हमारे दोनों मातृ एवं पितृ कुलों के लोग दुःख से पार लगाने के विचार से तुम्हें पुकारते हैं. (१४) आपूणो अस्य कलशः स्वाहा सेक्तेव कोशं सिसिचे पिबध्यै. समु प्रिया आववृत्रन्मदाय प्रदक्षिणिदभि सोमास इन्द्रम्.. (१५) हे इंद्र! तुम्हारा कलश सोम से भर गया है. तुम्हारे सोमरस पीने के लिए ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण भी हो चुका है. जैसे पानी भरने वाला पानी भरे हुए पात्र से दूसरे पात्र में जल डालता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारे पीने के लिए कलश में सोम भरता हूं. स्वादिष्ट सोम प्रदक्षिणा करता हुआ इंद्र की प्रसन्नता के लिए उनके सामने जाता है. (१५) न त्वा गभीरः पुरुहूत सिन्धुर्नाद्रयः परि षन्तो वरन्त. इत्था सखिभ्य इषितो यदिन्द्रा दृळ्हं चिदरुजो गव्यमूर्वम्.. (१६) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! न गहरा सागर तुम्हें रोक सकता है और न उसके चारों ओर वर्तमान पर्वतसमूह! देवों की प्रार्थना पर तुमने दृढ़ वाडवाग्नि का भी निवारण कर दिया था. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*