ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 622, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संज्जितं धनानाम्.. (१७) धन प्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं के लिए भयंकर, युद्ध में राक्षस विनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (१७) सूक्त—३३ देवता—इंद्र प्र पर्वतानामुशती उपस्थादश्वेइव विषिते हासमाने. गावेव शुभ्रे मातरा रिहाणे विपाट्छुतुद्री पयसा जवेते.. (१) विश्वामित्र बोले—“जिस प्रकार घुड़साल से छूटी हुई दो घोड़ियां एक-दूसरे से आगे बढ़ने की इच्छा से दौड़ती हैं अथवा बछड़ों को जीभ से चाटने की इच्छुक दो गाएं शीघ्र चलती हैं, उसी प्रकार दो सुंदर गायों जैसी सतलुज एवं व्यास नामक नदियां पर्वत की गोद से निकलकर समुद्र से मिलने की इच्छुक होकर तेज बहती हैं. (१) इन्द्रेषिते प्रसवं भिक्षमाणे अच्छा समुद्रं रथ्येव याथः. समाराणे ऊर्मिभिः पिन्वमाने अन्या वामन्यामप्येति शुभ्रे.. (२) “हे इंद्र द्वारा प्रेरित दो नदियो! तुम इंद्र की आज्ञा की प्रार्थना करती हुई दो रथसवारों के समान सागर की ओर जाती हो, आपस में मिलती हुई, लहरों के द्वारा एक-दूसरे के प्रदेश को सींचती हुईं एवं शोभायमान होती हो. (२) अच्छा सिन्धुं मातृतमामयासं विपाशमुर्वी सुभगामगन्म. वत्समिव मातरा संरिहाणे समानं योनिमनु सञ्चरन्ती.. (३) “बछड़ों को चाटने की अभिलाषा करने वाली गायों के समान एक ही स्थान समुद्र का लक्ष्य करके बहने वाली सतलुज एवं महान् सौभाग्यवती व्यास नदी को मैं प्राप्त हुआ हूं.” (३) एना वयं पयसा पिन्वमाना अनु योनिं देवकृतं चरन्तीः. न वर्तवे प्रसवः सर्गतक्तः किंयुर्विप्रो नद्यो जोहवीति.. (४) नदियों ने कहा—“हम दोनों इस जल के द्वारा तृप्त होती हुईं इंद्र द्वारा निर्मित सागर की ओर बहती हैं. हमारे गमन का अंत नहीं होगा. यह ब्राह्मण हम दोनों को किस अभिलाषा से पुकार रहा है?” (४) रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावरीरुप मुहूर्तमेवैः. ebook converter DEMO Watermarks*