ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 655, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंकविर्नृचक्षा अभि षीमचष्ट ऋतस्य योना विधृते मदन्ती. नाना चक्राते सदनं यथा वेः समानेन क्रतुना संविदाने.. (६) कवि एवं मानवों को देखने वाले सूर्य इस धरती-आकाश को सभी जगह देखते हैं. प्रसन्न, जल एवं ओषधियों को धारण करने वाले तथा समान कर्मों द्वारा एकता को प्राप्त धरती-आकाश जल के उत्पत्ति स्थल अंतरिक्ष में इस प्रकार अलग-अलग स्थानों में रहते हैं, जैसे पक्षी अपने घोंसले अलग-अलग बनाते हैं. (६) सामान्या वियुते दूरेअन्ते ध्रुवे पदे तस्थतुर्जगरूके. उत स्वसारा युवती भवन्ती आदु ब्रुवाते मिथुनानि नाम.. (७) एक-दूसरे से एकता को प्राप्त, पृथक्पृथक् स्थित एवं विनाशरहित धरती-आकाश जागरूक होकर स्थिर अंतरिक्ष में इस प्रकार स्थित हैं, जैसे दो जवान बहिनें हों. वे दोनों मिलकर जोड़े का नाम प्राप्त करती हैं. (७) विश्वेदेते जनिमा सं विविक्तो महो देवान्बिभ्रती न व्यथेते. एजद्ध्रुवं पत्यते विश्वमेकं चरत्पतत्रि विषुणां वि जातम्.. (८) ये धरती-आकाश समस्त वस्तुओं का विभाग करते हैं एवं महान् देवों को धारण करके भी दुःखी नहीं होते. जंगम एवं स्थावर विश्व एकमात्र धरती को प्राप्त करता है. चंचल पक्षी नाना रूप धारण करके इनके बीच में स्थित होते हैं. (८) सना पुराणमध्येष्यारान्महः पितुर्ज नितुर्जा मि तन्नः. देवासो यत्र पनिता॑र एवैरुरो पथि व्युते तस्थुरन्तः.. (९) महान्, सबके पालक एवं जननकर्त्ता आकाश का सनातनत्व, प्राचीनता एवं एक ही स्थान से अपना तथा उसका जन्म मैं जानता हूं. इसलिए मैं उसे अपनी बहिन स्वीकार करता हूं. उस आकाश के विस्तीर्ण मार्ग में भिन्न-भिन्न देव अपने-अपने वाहनों सहित स्तुति करते हुए स्थित हैं. (९) इमं स्तोमं रोदसी प्र ब्रवीम्यूदूदराः शृणवन्नग्निजिह्वः. मित्रः सम्राजो वरुणो युवान आदित्यासः कवयः पप्रथानाः.. (१०) हे धरती-आकाश! हम तुम्हारे इस स्तोत्र को बोलते हैं. सोमरस पेट में रखने वाले, अग्नि रूपी जिह्वा से युक्त, भली-भांति दीप्त, नित्य तरुण, क्रांतदर्शी एवं अपने-अपने कर्मों का विस्तार करने वाले मित्र, वरुण एवं आदित्य इस स्तोत्र को सुनें. (१०) हिरण्यपाणिः सविता सुजिह्वस्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानः. देवेषु च सवितः श्लोकमश्रेरादस्मभ्यमा सुव सर्वतातिम्.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*