भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 656

देने के निमित्त हाथ में सोना लिए हुए एवं शोभन वचनों वाले सविता देव यज्ञ के तीनों सवनों में आकाश से आते हैं. हे सविता! स्तोताओं का स्तोत्र प्राप्त करो एवं हमारे लिए समस्त अभिलषित फल प्रदान करो. (११) सुकृत्सुपाणिः स्ववाँ ऋतावा देवस्त्वष्टावसे तानि नो धातु. पूषण्वन्त ऋभवो मादयध्वमूर्ध्वग्रावाणो अध्वरमतष्ट.. (१२) शोभन जगत् के कर्त्ता, सुंदर हाथ वाले, धनयुक्त एवं सत्य संकल्प त्वष्टा देव रक्षा के लिए हमें अभिलषित फल दें. हे ऋभुआे! तुम पूषा के साथ मिलकर हमें प्रसन्न करो, क्योंकि सोम निचोड़ने के लिए पत्थर उठाने वाले ऋत्विजों ने यह यज्ञ किया है. (१२) विद्युद्रथा मरुत ऋष्टिमन्तो दिवो मर्या ऋतजाता अयासः. सरस्वती शृणवन्द्यज्ञियासो धाता रयिं सहवीरं तुरासः.. (१३) तेजस्वी रथों वाले, ऋष्टि नामक आयुध युक्त, द्योतमान, शत्रुओं को मारने वाले, यज्ञ से उत्पन्न, नित्य गतिशील एवं यज्ञ के योग्य मरुद्गण तथा सरस्वती हमारे स्तोत्र को सुनें. हे शीघ्रता करने वाले मरुतो! हमें पुत्रों सहित धन दो. (१३) विष्णुं स्तोमासः पुरुदस्ममर्का भगस्येव कारिणो यामनि ग्मन्. उरुक्रमः ककुहो यस्य पूर्वीर्न मर्घन्ति युवतयो जनित्रीः.. (१४) हमारा यह धनमूलक स्तोत्र तथा पूज्य मंत्र नित्य विस्तृत इस यज्ञ में बहुकर्मा विष्णु को प्राप्त हो. सबको जन्म देने वाली एवं परस्पर दूर स्थित दिशाएं उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करतीं. विष्णु का पादविक्षेप महान् है. (१४) इन्द्रो विश्वैर्वीर्यै३ः पत्यमान उभे आ पप्रौ रोदसी महित्वा. पुरन्दरो वृत्रहा धृष्णुषेणः सङ्गभ्या न आ भरा भूरि पश्वः.. (१५) समस्त सामर्थ्यो से युक्त इंद्र ने अपनी महिमा से धरती और आकाश दोनों को पूर्ण कर दिया है. शत्रु नगरों का ध्वंस करने वाले, वृत्रविनाशक एवं शत्रुपराभवकारिणी सेना के स्वामी इंद्र! तुम पशुओं को एकत्र करके अधिक मात्रा में हमें दो. (१५) नासत्या मे पितरा बन्धुपृच्छा सजात्यमश्विनोश्चारु नाम. युवं हि स्थो रयिदौ नो रयीणां दात्रं रक्षेथे अकवैरदब्धा.. (१६) हे बंधुओं की अभिलाषा जानने के इच्छुक अश्विनीकुमारो! तुम हमारे पालनकर्त्ता बनो. तुम दोनों का मिलन अत्यंत सुंदर है. तुम दोनों हमारे लिए महान् धन देने वाले बनो. तुम्हारा कोई तिरस्कार नहीं कर सकता. हवि देने वाले हमें उत्तम कर्मों से रक्षित करो. (१६) महत्तद्वः कवयश्चारु नाम यद्ध देवा भवथ विश्व इन्द्रे. ebook converter DEMO Watermarks*