ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 875, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहम अत्रि ऋषि के समान मंत्रों द्वारा मित्र व वरुण को बुलाते हैं. वे सोमरस पीने के लिए कुशों पर बैठें. (१) व्रतेन स्थो ध्रुवक्षेमा धर्मणा यातयज्जना. नि बर्हिषि सदतं सोमपीतये.. (२) हे मित्र व वरुण! तुम विश्व को धारण करने वाले व्रतों के कारण अपने स्थान पर स्थित रहते हो. ऋत्विज् तुम्हारे यज्ञकर्मों में लगे रहते हैं. तुम दोनों सोमरस पीने के लिए कुशों पर बैठो. (२) मित्रश्च नो वरुणश्च जुषेतां यज्ञमिष्टये. नि बर्हिषि सदतां सोमपीतये.. (३) हे मित्र व वरुण! तुम दोनों हमारे यज्ञों को अपनी इच्छापूर्ति के लिए स्वीकार करो. तुम दोनों सोमरस पीने के लिए कुशों पर बैठो. (३) सूक्त—७३ देवता—अश्विनीकुमार यदद्य स्थः परावति यदर्वावत्यश्विना. यद्वा पुरु पुरुभुजा यदन्तरिक्ष आ गतम्.. (१) हे अनेक यज्ञों के भोगने वाले अश्विनीकुमारो! आज चाहे तुम दूरवर्ती स्वर्ग में हो, चाहे पहुंचने योग्य आकाश में हो और चाहे अनेक स्थानों में हो, तुम सभी स्थानों से यहां आओ. (१) इह त्या पुरुभूतमा पुरु दंसांसि बिभ्रता. वरस्या यामयद्भिगू हुवे तुविष्टमा भुजे.. (२) हे बहुत से यजमानों को संतुष्ट करने वाले, अनेक यज्ञकर्मों को धारण करने वाले, वरण करने योग्य तथा अन्यों द्वारा न रोके जाने वाले अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारे समीप आता हूं. मैं तुम दोनों को अपनी रक्षा के लिए अपने यज्ञ में बुलाता हूं. (२) ईर्मान्यद्वपुषे वपुश्चक्रं रथस्य येमथुः. पर्यन्या नाहुषा युगा मह्ना रजांसि दीयथः.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों ने सूर्य का रूप तेजस्वी बनाने के लिए अपने रथ का एक पहिया स्थिर कर लिया है एवं अपनी शक्ति से मानवों के काल को निश्चित करने के लिए रथ के दूसरे पहिए के सहारे लोकों में घूमते हो. (३) तद् षु वामेना कृतं विश्वा यद्धामनु ष्टवे. नाना जातावरेपसा समस्मे बन्धुमेयथुः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*