भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 883, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 883

हे अश्विनीकुमारो! तुम भयभीत एवं प्रार्थना करते हुए सप्तवध्रि ऋषि के छुटकारे के लिए बंद संदूक को खोलो. (६) यथा वातः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः. एवा ते गर्भ एजतु निरैतु दशमास्यः.. (७) सप्तवध्रि ऋषि अपनी पत्नी से कहते हैं—"हवा जिस प्रकार सरोवर के जल को सब ओर से कंपित करती है, उसी प्रकार तुम्हारा दस महीने का गर्भ गतिशील हो." (७) यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति. एवा त्वं दशमास्य सहावेहि जरायुणा.. (८) “वायु, वन एवं समुद्र जिस प्रकार कांपते हैं, उसी प्रकार तुम्हारा दस मास का गर्भ जरायु के साथ बाहर आवे.” (८) दश मासाञ्छशयानः कुमारो अधि मातरि. निरैतु जीवो अक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि.. (९) “माता के गर्भ में दस मास तक सोने वाला कुमार संपूर्ण जीवधारी के रूप में जीवित माता के गर्भ से बाहर आवे.” (९) सूक्त—७९ देवता—उषा महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती. यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (१) हे दीप्तिशालिनी, शोभन जन्म वाली, स्तुति सुनकर अश्व प्रदान करने वाली एवं सत्य यश वाली उषादेवी! हमें अधिक धन पाने के लिए, जैसे पहले जगाया था, वैसे ही जागृत करो. (१) या सुनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः. सा व्युच्छ सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (२) हे स्वर्ग की पुत्री उषा! तुमने शुचद्रथ के पुत्र सुनीथि का अंधकार भगाया था. हे शक्तिशालिनी, शोभन जन्म वाली एवं अश्वप्रद स्तुतियुक्त उषा! तुम सत्यश्रवा का अंधकार मिटाओ. (२) सा नो अद्याभरद्वसुर्व्युच्छा दुहितर्दिवः. यो व्यौच्छः सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*