भारतकोश
रोगों की पहचान

रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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साहिब बन्दगी

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

वापिस आना ही पड़ा। सदा के लिए, जड़ से यह महारोग समाप्त न हुआ। बड़े-2 योगियों का भी यह रोग सदा के लिए समाप्त नहीं हुआ। तभी तो बड़े-बड़े योगी भी माया और निरंजन के वश में हो गये। बड़ी-बड़ी तपस्या करने के बाद भी माया ने सबको छल लिया। जहाँ देवराज इंद्र को छल लिया गया, जो गौतम की स्त्री के पास पहुँच गया, वहाँ अन्य की बात करना ठीक नहीं है। देवराज बड़ी तपस्या से बनता है। कहने का भाव है कितनी भी तपस्या कर लो, माया नहीं छोड़ेगी।

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गूह छोड़ भये संयासी, तऊ न पावत पारा ॥

इसलिए यह सही उपाय नहीं है। सही उपाय बता रहे हैं-

सत्य नाम निज औषधी, सतगुरु दीन बताय।

औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ॥

सच्चा नाम ही इस महारोग की औषधी है। पर इस औषधी की भी नक़ल हो गयी है। सब संत बनकर यह औषधी दे रहे हैं। तभी तो साहिब को कहना पड़ा-

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय।

मूल नाम जो गुप्त है, जाने बिरला कोय ॥

कहने में सब संत बने हैं, पर भक्ति इस संसार में बार-बार आने की दे रहे हैं, नाम काल पुरुष का दे रहे हैं। खैर, जनता जनादन को भी सलाम है कि लगी है फिर भी।

...तो सदगुरु के सत्यनाम के बिना इस महारोग से कोई छूट नहीं सकता है। कुछ नाम की बात कर रहे हैं, अमर लोक की भी बात कर रहे हैं, पर वो वहाँ पहुँचे नहीं है, केवल पढ़ी-लिखी बातें कह रहे हैं, उन्हें उस अमर-लोक का सही-सही ज्ञान नहीं है। ऐसे लोगों के लिए साहिब कह रहे हैं-

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