रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
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बिन देखे उस देश की, बात करे सो क्रूर। आप तो खारही खात है, बेचत फिरे कपूर ॥
इसलिए ऐसे लोगों से तो बहुत सावधान रहने की जरूरत है। कुछ कह रहे हैं कि सत्लोक में धुनें हो रही हैं। वो शब्द को ही परमात्मा कह रहे हैं। नहीं, साहिब ने तथा संतों ने कभी शब्द को परमात्मा नहीं कहा। वो तो कह रहे हैं-
जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, वाको काल न खाय ॥
कह रहे हैं कि जाप भी मर जाता है। जाप यानी मुँह से जो उच्चारण हुआ, वो जाप है। फिर अजपा भी मर जाता है। जो मन से जाप हुआ, वो अजपा है, वो तुरिया की स्थिति में होता है। वो भी मर जाता है। फिर अनहद भी महाशून्य तक जाता है, आगे नहीं जा पाता, इसलिए वो भी मर जाता है।
आवाज दो के बिना नहीं हो सकती है। इसलिए जहाँ आवाज है, वहाँ द्वैत है और जहाँ द्वैत है, वहाँ माया है। तो वो कह रहे हैं कि सत्लोक में धुनें हो रही हैं। यानी उन्होंने कहीं निचले देशों को ही अमर-लोक मान लिया है, वो वहाँ पहुँचे नहीं हैं। इसलिए उनके पास सच्चा नाम भी नहीं हैं। इसलिए यह भी सावधानी बरतनी है। जन्म-मरण के महारोग से छूटना है तो सच्चे सद्गुरु की खोज करनी होगी, क्योंकि उन्हीं से तो सच्चा नाम मिलेगा। इसलिए-
सतगुरु खोजो संत, जीव काज को चाहहु। मेटो भव को अंक, आवागमन निवारहु ॥