रोगों की पहचान

रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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सत्यपुरुष का पाँचवा पुत्र निरंजन है
जो तीन लोक का राजा और चौरासी लाख योनियों व अनहद का रचयिता भी है
- 1. मैं सिरजों में मारऊँ, मैं जारी में खाऊँ। जल थल नभ मैं रहूँ, मोर निरंजन नाऊँ॥
- 2. सात शून्य सातहि कमल, सात सुरति स्थान। इक्षीस ब्रह्माण्ड लग, काल निरंजन ज्ञान॥
- 3. एक पाट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लगे, सवा लाख की धानी॥
- 4. गुप्त भयो हैं संग सबके, मन ही निरंजन जानिये॥
- 5. अनहद की धुन भँवरगुफा में, अति घनघोर मचाया है। बाजे बजे अनेक भाँति के, सुनि के मन ललचाया है॥ ..... यह सब काल जाल को फँदा, मन कल्पित ठहराया है॥
- 6. तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार हैं। लग रहे सिद्ध साधु न पावत पार हैं॥
- 7. मन ही निराकार निरंजन जानिए॥
- 8. ज्योति निरंजन लग काल पसारा। मन माया भई किया सृष्टि विस्तारा॥
- 9. बिना जाने जो नर भक्ति करई। सो नहीं भवसागर से तरई॥
- 10. मन ही सरूपी देव निरंजन तोहि रहा भरमाई। हे हँसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई॥
- 11. निराकार जो वेद वखाने, वोही काल कोई भेद न जाने॥
—कबीर साहिब
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