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रोगों की पहचान

रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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रोगों की पहचान

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योगमत और संतमत में अंतर

योगमतसंतमत
1. योगमत में काया का नाम है।1. संतमत में विदेह नाम है।
2. योग मत चाचरी, भूचरी, अगोचरी मुद्राओं के ईर्द-गिर्द घूमता है, जो शरीर में हैं।2. संतमत में पाँच मुद्राओं से आगे शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान रखने को कहा है।
3. यह नाम लिखने-पढ़ने में आता है। इनसे काल-पुरुष ने पाँच तत्व पैदा किये और शरीरों की रचना की।3. यह अकह नाम है जो लिखने-पढ़ने में नहीं आता है और पाँच तत्वों से बाहर है।
4. योगमत में अनहद धुनों को ही परमात्मा माना जाता है।4. संतमत में आत्मा किसी शब्द की मोहताज नहीं, क्योंकि आत्मा अपने आप में परिपूर्ण है।
5. योगमत करनी अथवा कर्माई का मार्ग है।5. यह सहज मार्ग है, गुरु कृपा का मार्ग है और भुंग-मता है।
6. योगमत में सुरति शब्द का अभ्यास किया जाता है।6. संतमत सुरति को चेतन करने का मार्ग है।
7. योगमत में काल का नाम लिया जाता है। यह नाम शरीर को दिया जाता है।7. संतमत जिंदा नाम प्रदान करता है जो कि शरीर को छोड़ आत्मा को दिया जाता है।
8. योगमत में गुरु की भूमिका न के बराबर होती है।8. संतमत में भक्ति का सार ही संत सदगुरु है।
9. योगमत सीमाबद्ध है, जिसमें साधक दसवें द्वार तक ही जाता है।9. संतमत असीम है जो कि ग्यारहवें द्वार की बात करता है, जो सुरति में है।
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