रोगों की पहचान

रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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साहिब बन्दगी
| योगमत | संतमत |
|---|---|
| 10. योगमत निराकार निरंजन की ही सत्ता को सर्वश्रेष्ठ मानता है। 11. योगमत में कमाई का फल खत्म होने पर वापिस माता के पेट में आना पड़ता है। 12. योगमत वैशाखियों के सहारे चलता है जो कि शास्त्रों की साक्षी देकर अपने आप को स्थापित करता है। 13. इसमें रिद्धि-सिद्धि और दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, मगर आत्मा का ज्ञान नहीं होता है। 14. योगमत मीन और पपील मार्ग हैं। | 10. संतमत में निराकार सत्ता से आगे चौथे लोक अर्थात अमर लोक की बात की जाती है। 11. संतमत में जीव सदा के लिए आवागमन से मुक्त हो जाता है और अपने निजधाम सत्य लोक को चला जाता है। 12. संतमत में संत सद्गुरु अपने अनुभव से बोलता है जो किसी का मोहताज नहीं होता है। 13. संतमत में जीव को आत्मज्ञान होने से आध्यात्मिकशक्तियाँ मिलती हैं। 14. जबकि संतमत विहंगम मार्ग है। |
- □ पाँच शब्द औ पाँचों मुद्रा, सोई निश्चय माना। आगे पूर्ण पुरुष पुरातन, उसकी खबर न जाना ॥
- □ नौ नाथ चौरासी सिद्ध लों, पाँच शब्द में अटके। मुद्रा साथ रहे घट भीतर, फिर औंधे मुँह लटके ॥
- □ काया नाम सबहिं गुण गावैं, विदेह नाम कोई बिरला पावै। विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सद्गुरु साँचा होई ॥
- □ जब तक गुरु मिले नहीं साँचा, तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥