रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्वेद का महत्व
हमारे देश में पहले आयुर्वेद का बड़ा महत्व था। टीके नहीं थे। चेचक बगैरह से बचाने के लिए माताएँ बच्चों को घुट्टी पिलाती थीं। आज हम अंग्रेजी दवाओं पर निर्भर हो गये हैं, इसलिए उम्र कम होती जा रही है, बीमारियाँ भी बढ़ती जा रही हैं।
मेडिकल साईंस ने बड़ी तरक्की की, वैज्ञानिक उन्नति पर हैं, पर वे कुछ बीमारियों की दवा नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं। उदाहरण के लिए एड्स। यह जानलेवा है। रोगी मरेगा-ही-मरेगा। आखिर क्या चीज़ है एड्स। शरीर के अंदर रोग-निरोधक शक्ति का ह्रास ही एड्स है। वो कीटाणु इतने ठीठ हैं कि आसानी से मरते भी नहीं हैं। यदि तेज दवा दी जाएगी तो पहले इंसान ही मर जायेगा। इसी तरह जितनी भी दवाएँ डॉ० देता है, वो रोग के कीटाणुओं की तो खबर लेती ही है, साथ में आपकी भी खबर लेती है। जैसे मच्छरों को भगाने के लिए जो आप गुड नाइट बगैरह का इस्तेमाल करते हैं, वो मच्छरों की खबर तो लेगा ही, साथ ही आपकी भी खबर ले लेगा। मैंने एक बार अखबार में पढ़ा कि यदि छोटे बच्चे को किसी बंद कमरे में सुलाकर गुड नाइट लगा दी जाए तो वो सुबह तक मर भी सकता है। इस तरह दवा भी आपको कुछ-न-कुछ नुकसान पहुँचाकर ही जाती है।
तो एड्स के कीटाणु जल्दी पनपते हैं। उनका हमला रक्त पर है। भाई, रक्त के ग्राहकी बहुत हैं। हम जो भी खा रहे हैं, उसी से तो रक्त बन रहा है। आदमी उत्तम खाता है। जो शेर एक बार नरभक्षी हो जाए, वो फिर किसी दूसरे जानवर का माँस खाना ही नहीं चाहता है। मनुष्य उत्तम पदार्थ खाता है। काजू, बादाम आदि कोई जानवर तो खाता नहीं है। इसलिए जो शेर आदमी का माँस खा लिया, वो बाकी जानवर की तरफ जाता ही नहीं है।
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