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रोगों की पहचान

रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

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रोगों की पहचान

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ब्यूटी-पार्लर का कोर्स करके आई है। यह सब तो हमारे धर्म-शास्त्रों से चुराकर वो ले गये हैं। यहाँ तो पहले ही था।

तो चौथा उपवेद है—अर्थवेद। वो मूल वेद तो अथर्ववेद है, पर यह अर्थवेद है। इसमें धन-उपार्जन के फार्मूले बताए गये हैं। किस मौसम में क्या खरीद करनी चाहिए, यह भी बताया गया है। लोग कहते हैं बिजनेस एण्ड मैनेजमेंट। भाइयों, यह सब तो यहाँ से लिया गया है। यह सब यहाँ का मूल है। हमारा देश आगे था, आगे है। तो उसमें यह भी लिखा है कि आपका आवास कैसा हो। आज जो इंजीनियर बता रहे हैं, वो सब उसमें है। जैसे उत्तर दिशा में शोचाल्य नहीं रखना चाहिए, क्योंकि वायुकोण की तरफ रखा तो दिन-भर हवा द्वारा वही गंद बदबू आती रहेगी।

...तो एड्स पर चिकित्सा विज्ञान फेल हो गया। वनस्पति जगत की पूरी-पूरी खबर उसे नहीं हुई। वनस्पति जगत में कई लाख किस्म के पौधे हैं। हरेक का बड़ा महत्व है। लोग नहीं जानते हैं, इसलिए आश्चर्यचकित हैं एड्स के मरीजों को पीड़ित देखकर।

मैंने एड्स पर शोध किया। मैंने उन जड़ी-बूटियों को देखा, जिन्हें कीड़ा नहीं लगता है। 27 लाख कीटों में से कोई भी कीड़ा उन पौधों में नहीं लग रहा था। उन बूटियों पर शोध किया। जैसे नीम, कनियारी आदि बूटियों पर कीड़ा नहीं लग रहा है। पपीते पर भी कीड़ा नहीं लग रहा है। ऐसे अन्य बूटियाँ भी हैं। मैंने प्रयोग किया। एक फौज के सूबेदार को मेरा शिष्य अरुणाचल प्रदेश से लाया। वो अंतिम स्टेज पर था। डॉ० तो ऐसा कर देगा, ऐसी दवा दे देगा कि यदि 3 साल में मरना होगा तो 5 पाँच साल में मरेगा। पर मरेगा। क्योंकि कीटाणु बढ़ते ही जायेंगे। उनका विकास रुकेगा नहीं।

एड्स के मरीज को यदि बुखार हुआ तो उतरेगा नहीं, यदि जुकाम हुआ तो चलता ही रहेगा, क्योंकि रोग-प्रतिरोधक शक्ति ही नहीं रहती है। फिर सभी कीटाणु हमला बोल देते हैं। कीटाणु बढ़ते जाते हैं, उसने तो मरना ही है।