रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें44
साहिब बन्दगी
तो जिन दवाओं को कीड़ा नहीं लगता, जब वो खून में पहुँचेंगी, उसी से तो माँस भी बनेगा। फिर उस माँस के पास कीड़ा आयेगा ही नहीं। इस तरह नयी पीढ़ी पनपेगी ही नहीं, विकास भी रुक जायेगा। मैंने पहले अपने पर शोध किया, सोचा कि यदि शरीर पर कुछ असर हुआ तो निपट लूँगा।
तो बड़ी औषधियाँ हैं, जिन्हें कोई भी कीड़ा नहीं लगता है। जोजड़े देखे, उनके चारों तरफ काँटे हैं। कनियारी में भी काँटे हैं। कीड़ा पहुँचता नहीं है। ये बड़ी संजीवनी-सी बूटियाँ हैं।
...तो मैंने तीन दिन उसे आश्रम में रखा, वो चीज़ दी। वो कहने लगा कि मुझे अब रोग नहीं है। ऐसे ही कुछ और लोगों को भी वो दवा दी। पाँच साल से भी ज्यादा हो गये, वे स्वस्थ हैं।
जब भी वो दवा रक्त में पहुँचेंगी तो उन कीटाणुओं का विकास रुक जायेगा, आगे भी नहीं होगी। तो कहने का भाव है कि बनस्पति जगत में बहुत कुछ है।
मेरे पास वैद्य भी आते हैं। पर मेरा लक्ष्य इससे हटकर है। यह इसलिए कि लोगों को शरीर का भी लाभ मिले। शरीर स्वस्थ होगा तो भक्ति-ध्यान भी ठीक हो पायेगा।
पहला स्वर्ग नीरोगी काया।
इसलिए सोचा कि यदि लोगों को लाभ मिल जाए तो अच्छा ही तो है। आप सोचें कि पहले ऋषि-मुनियों की आयु भी लंबी थी, उन्हें इन चीजों का ज्ञान था।