भारतकोश
रोगों की पहचान

रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

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रोगों की पहचान

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लें। गाढ़ा हो जाने पर उतार लें।

अब ऊपर का चूर्ण इस काढ़े में डाल दें। जब ठंडा हो जाए तो उसमें 450 ग्राम शहद की मात्रा डालें। आपकी दमे की दवा तैयार है। सुबह-शाम 10 ग्राम यह दवा रोगी को चटाकर बकरी का दूध पिला दें।

❑ 120 ग्राम संखिया में ढाई ग्राम मीठा सोडा मिलाकर अच्छी तरह पीस लें। अब इसकी 15 पुड़ियाँ बना लें। अब सुबह-शाम पानी के साथ रोगी को एक पुड़िया की दवा लें। 6-7 हफ्ते रोगी को यह दवा दें।

❑ सतगिलोय, सोंठ, विधारा, बहेड़ा की छाल, बड़ी हरड की छाल, आँवले की छाल, अश्वगन्ध नागौरी, बायविडंग, सौंठ, छोटी पीपर, सफेद पुनर्नवा, काली मिर्च, चित्रक जड़ की छाल-सब 210-210 ग्राम की मात्रा में लेकर अच्छी तरह अलग-2 से खरल में पीस लें। फिर छानकर सबको मिला लें। फिर गुड़ की चासनी बनाकर सब दवाई उसमें मिला लें। अब 5-5 ग्राम की छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। मरीज को ऐसी एक गोली रोज सुबह-सबेर कूटकर गाय के दूध के साथ दें।

सावधानी बरतें

❑ नमक बिलकुल न खाएँ।

ग्रहणी रोग होने पर

उदर और पक्काशय के बीज की आँत को ग्रहणी कहते हैं। जब उसमें खराबी हो जाती है, तो दस्त की बीमारी हो जाती है। सार रूप में ग्रहणी अंग जब सुचारू रूप से काम नहीं कर पाता तो ग्रहणी रोग होता है। इसकी गड़बड़ी में भी वात, पित्त और कफ को मुख्य कारण माना गया है।

जब भोजन के बाद कफ सहित मल आए और मीठी-2 डकारें