रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६ रुद्रयामलतन्त्रम् मंत्रेण मंत्रितं चैव शिरे बद्ध्वा च स्वापयेत् ।। स्वप्ने तदा देवताश्च वार्त्तां कुर्वंति तेन वा ।। ७ ।। मूलमें मंत्र है सो जपे, कटु तुंबीकी जड़ और बीज ले और कसौंदीकी जड़ ले मंत्र जपके शिरपर बाँधके सोवे तो उसके संगस्वप्नमें देवता बातें करें ।। ६ ।। ७ ।। मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय कर्णपिशाचाय स्वाहा । सर्वांजने सिद्धयेच्च मंत्रमघोरसंज्ञकम् ।। विनाघोरेण सिद्धिर्न जायते नात्र संशयः ।। ८ ।। मंत्र पढ़ अंजन करे । सब अंजनोंमें सिद्ध करनेवाला यह अघोर मंत्र है, विना अघोरके सिद्ध नहीं होती इसमें संशय नहीं है ।। ८ ।। मृत्कालिकां च निर्माय पूजयेद्धूपदीपकैः ।। ९ ।। अष्टादशसहस्रं तु जपेन्मंत्रं समाहितः ।। तदा च सर्वसिद्धिं हि दर्शयेन्नात्र संशयः ।। १० ।। माटीकी कालिका बनाकर पूजे, धूप दीप देवे, सावधानतासे अठारह हजार मंत्र जपे तो सब सिद्धि देख पड़े ।। ९ ।। ।। १० ।। मंत्रः । ॐ बहुरूपे विश्वतेजसे ॐविद्याध- रमहेश्वरं जपाम्यहं महादेवसर्वसिद्धिप्रदा- यकम् ।। रुद्राय नमो बहुरूपाय नमो स्व- रूपाय नमः ततः पूषाय नमः यक्षरूपाय नमः नुदे नद स्वाहा । इमं मंत्रं पठित्वा च पूजयेद्गिरिजापतिम् ।। तदा सिद्धिर्भवेच्चैव महादेवप्रसादतः ।। ११ ।।