भारतकोश
रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)

Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary

भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished68 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासहितम् ४९ फिर आँखियोंमें लपेटा हुआ वस्त्र खोले और भूमिमें द्रव्य देखे । शर- त्कालमें विशेषसे भूमिकी सब वस्तु देखे ॥ १८ ॥ हरिद्रारक्तमूलं च सिंदूरेण समन्वितम् ॥ अर्कसूत्रे वेष्टनं च कारयेद्वर्तिकां बुधः ॥ १९ ॥ हरदीकी लाल गाँठ ले उसमें सिंदूर मिलावे और आकका सूत लपेटे और बत्ती बनावे ॥ १९ ॥ तिलतैलेन संयोज्य मृद्दीपे धार्यते च ताम् ॥ तैलपूर्णं च दीपं च स्मशाने सुनिवेशयेत् ॥ २० ॥ वह बत्ती तिलके तेलमें बोरके माटीके दीपमें घरे और दीपमें तेल भर स्मशानमें घरे ॥ २० ॥ कपाले कारयेच्चैव कज्जलं चैव चांजयेत् ॥ भूमौ निखातद्रव्यं च पश्यच्चैव न संशयः ॥ २१ ॥ और कपालमें कज्जल पार नेत्रोंमें लगावे तो भूमिमें गडा द्रव्य दीखे इ समें संशय नहीं है ॥ २१ ॥ कृष्णकाकस्य जिह्वां च मांसं चैव निगृह्य वै ॥ अर्कसूत्रेण वर्त्तिं च ह्यजाघृतसमाप्लुताम् ॥ २२ ॥ कृष्ण काककी जीभ और मांस ले आकके सूतमें लपेटकर बत्ती बना छेरीके घृतमें भिगोय ॥ २२ ॥ दीपं प्रज्वालयेच्चापि निशायां सुसमाहितः ॥ तया हि चांजयेन्नेत्रे भूमिखातं च दृश्यते ॥ २३ ॥ रात्रिमें दीप बारके उस बत्तीसे कज्जल कर नेत्रोंमें लगावे तो पृथ्वीका द्रव्य दीखे ॥ २३ ॥