रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
हिन्दीटीकासहितम् ४९ फिर आँखियोंमें लपेटा हुआ वस्त्र खोले और भूमिमें द्रव्य देखे । शर- त्कालमें विशेषसे भूमिकी सब वस्तु देखे ॥ १८ ॥ हरिद्रारक्तमूलं च सिंदूरेण समन्वितम् ॥ अर्कसूत्रे वेष्टनं च कारयेद्वर्तिकां बुधः ॥ १९ ॥ हरदीकी लाल गाँठ ले उसमें सिंदूर मिलावे और आकका सूत लपेटे और बत्ती बनावे ॥ १९ ॥ तिलतैलेन संयोज्य मृद्दीपे धार्यते च ताम् ॥ तैलपूर्णं च दीपं च स्मशाने सुनिवेशयेत् ॥ २० ॥ वह बत्ती तिलके तेलमें बोरके माटीके दीपमें घरे और दीपमें तेल भर स्मशानमें घरे ॥ २० ॥ कपाले कारयेच्चैव कज्जलं चैव चांजयेत् ॥ भूमौ निखातद्रव्यं च पश्यच्चैव न संशयः ॥ २१ ॥ और कपालमें कज्जल पार नेत्रोंमें लगावे तो भूमिमें गडा द्रव्य दीखे इ समें संशय नहीं है ॥ २१ ॥ कृष्णकाकस्य जिह्वां च मांसं चैव निगृह्य वै ॥ अर्कसूत्रेण वर्त्तिं च ह्यजाघृतसमाप्लुताम् ॥ २२ ॥ कृष्ण काककी जीभ और मांस ले आकके सूतमें लपेटकर बत्ती बना छेरीके घृतमें भिगोय ॥ २२ ॥ दीपं प्रज्वालयेच्चापि निशायां सुसमाहितः ॥ तया हि चांजयेन्नेत्रे भूमिखातं च दृश्यते ॥ २३ ॥ रात्रिमें दीप बारके उस बत्तीसे कज्जल कर नेत्रोंमें लगावे तो पृथ्वीका द्रव्य दीखे ॥ २३ ॥
५० रुद्रयामलतन्त्रम् कमलसूत्रस्य वर्त्तिं कारयेत्सुविधानतः ॥ एरंडपत्ररसेन चार्द्रयेत्तां पुनः सुखेत् ॥ २४ ॥ कमलके सूतकी बाती बनाकर एरंडके पत्रके अर्कमें भिगोके फिर सुखावे ॥ २४ ॥ अंकोलतैले प्रज्वाल्य कज्जलं समकारयेत् ॥ पुष्यर्क्षे चांजयेच्चैव त्रयोदश्यां स्वनेत्रके ॥ पृथ्वोनिखातद्रव्यं तु दृश्यते नात्र संशयः ॥ २५ ॥ और अंकोलके तेल में बाती भिगोयके दीप बारे और कज्जल ले पुष्य- नक्षत्रमें तेरसको अपने नेत्रों में अंजन करे तो भूमिमें गढ़ा द्रव्य दीखे इसमें संदेह नहीं है ॥ २५ ॥ दीपमाल्यां स्मशाने न कज्जलं च कपालके ॥ कृत्वा तु चांजयेन्नेत्रे भूद्रव्यमवलोकयेत् ॥ २६ ॥ दिवालीकी रात्रिको श्मशानमें कपालमें कज्जल करे और अंजन करे तो भूमिका द्रव्य दीखे ॥ २६ ॥ काकरारक्तसंश्लिष्टं मनः सिलसमन्वितम् ॥ तदा भूनिखातद्रव्यं चांजनेनैव दृश्यते ॥ २७ ॥ काकके रक्तमें भिगोय मनसिल ले नेत्रमें अंजन करे तो भूमिमें गढ़ा धन दीखे ॥ २७ ॥ तुलसीं शीघ्रमृतस्य पुरुषस्योदरस्य च ॥ जलमानीय यत्नेन गोरोचनं च शर्कराम् ॥ २८ ॥ तुलसी शीघ्र मरे मनुष्यके पेटका पानी, गोरोचन और शर्करा ॥ २८ ॥ एकत्र कारयेत्तां च घर्मे स्थाप्य दिनाष्टकम् ॥ नवमे दिवसे चैव कारयेदंजनं स्वके ॥ २९ ॥
हिन्दीटीकासहितम् ५१ नेत्रे तदा च पश्येत सकलान्निधीन्शुभान् ॥ प्रसिद्धमंजनं चैव सर्वज्ञेन च भाषितम् ॥ ३० ॥ इकट्ठा कर घाममें आठ दिन धर नवें दिन अपने नेत्रोंमें अंजन करे और सब निधियोंको देखे यह प्रसिद्ध अंजन सर्वज्ञने कहा है ॥ २९ ॥ ३० ॥।।। मंत्रः ॥ नमो भगवते रुद्राय डामरेश्वराय सिलिशालपुननेनागवेतालिनिस्वाहा । , इति सर्वजनानां च मंत्रं चैव ह्युदाहृतम् ॥ पुष्यर्क्षे च शनौ वारे तुलसीवृक्षमूलकम् ॥ ३१ ॥ सूक्ष्मं कृत्वा जलेनैव लघुकन्याकुमारयोः ॥ अंजयेदंजनेनैव तदा पश्यन्निखातकम् ॥ पाताले च स्थितं वस्तु तदा दृश्यति निश्चितम् ॥३२॥ यह अंजन करने का मंत्र है इसको पढे और पुष्यनक्षत्रमें शनिवारको तुलसीकी मूल ले जलमें महीन पीस छोटी कन्या वा बालकके नेत्रोंमें अंजन लगावे तो गडी वस्तु दीखे, पातालकी धरी वस्तु निश्चयसे दीखे ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ कृष्णपक्षचतुर्दश्यां रविवारो यदा भवेत् ॥ गुरवैवृक्षस्य मूलं जलेन सह पेषयेत् ॥ ३३ ॥ स्त्रीदुग्धं क्षिपेत्तस्मिन्यदि पुत्रो भवेत्तदा ॥ तदंजनं कारयेद्वै तदा द्रव्यं स पश्यति ॥ ३४ ॥ कृष्णपक्षचतुर्दशीको रविवार पड़े तो गुरवे वृक्षकी जड जलमें पीस उसमें पुत्रवती स्त्रीका दुग्ध छोडे और अंजन करे तौ द्रव्य दीखे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ गोदुग्धे रक्तसर्षपं तिलं पिष्ट्वा तथापि च ॥ ३५ ॥ शशवृक्षस्य बीजं च तस्मिन्क्षिप्तवा स लेपयेत् ॥ यत्रस्थितो ज्ञायते च तत्र पश्यति नान्यथा । ३६ ।।
५२ रुद्रयामलतन्त्रम् गोदुग्धमें रक्त सरसों तिल डार पीस शनके बीज तिसमें छोडकर लेपन करे तो जहाँ स्थिर होय तहाँही वस्तुज्ञान होय, यह अन्यथा नहीं ॥ ३५ ॥ ॥ ३६ ॥ अदृष्टकरणम् चतुर्लक्षं जपेन्मंत्रं नग्नो भूत्वा स्मशानके ॥ प्रातःकाले यक्षिणी च वस्त्रैकं च ददाति तम् ॥ ३७ ॥ नग्न होकर स्मशानमें चार लक्ष मंत्र जपे तो प्रातः-समय यक्षिणी एक वस्त्र देय सो ॥ ३७ ॥ वस्त्रमाच्छाद्य गच्छंतं तं न पश्यंति केचन ॥ गृहे तिष्ठन्सदा द्रव्यं स पश्यति न संशयः ॥ ३८ ॥ वस्त्र ओढकर जहाँ जाय तहाँ कोई न देखे, वह गृहमें बैठे सबको देखे और सब द्रव्य देखे इसमें संदेह न करना ॥ ३८ ॥ मंत्रः । ॐ ह्रीं ह्रीं स्मशानवासिनी स्वाहा । कार्तिकस्य कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ स्मशानेषु जपेन्मंत्रं बलिं पूजां तथाकरोत् ॥ ३९ ॥ इस मंत्रको कार्तिककृष्णपक्षकी चतुर्दशीको स्मशानमें जपे, बलिदान पूजन करे ॥ ३९ ॥ अंकोलतैले प्रज्वाल्य दीपं कज्जलमाचरेत् ॥ कपाले स्थाप्य तं चापि नेत्रयोर्यदि ह्यंजयेत् ॥ केपि न पश्यंति तं च महादेवप्रसादतः ॥ ४० ॥ अंकोलके तेलमें दीप बारे, कज्जल करे और कपालमें धर नेत्रोंमें लगावे त े उसको महादेवके प्रसादसे कोई न देखे ॥ ४० ॥
हिन्दीटीकासहितम् ५३ अर्कफलस्य तूलं च कार्पासं कमलं तथा ॥ एषां सूत्रैः वर्तिकां च कार्येद्विधिना बुधः ॥ मनुष्यकपाले कृत्वा कज्जलं नेत्रमंजयेत् ॥ ४१ ॥ अर्कफलके भीतरकी रुई और कपास और कमलके भीतरका सूत्र इनके सूतकी बाती बना मनुष्यके कपालमें कज्जल कर नेत्रोंमें लगावे ॥ ४१ ॥ मंत्रः । ॐ फट काली काली महाकाली मांसशोणितभोजनसुखे देवी ममेयसिति- मानर्षीतोमानशोति । हरीतक्यां वचं पिष्ट्वा गुटिकां कारयेद्बुधः ॥ त्रिधातोगुटिकां धृत्वा मुखे न पश्यंति केचन ॥ ४२ ॥ यह मंत्र पढ हरडमें वच पीस गुटिका बनाके तीन धातुसे मढावे और संमुखमें रखे तो कोई नहीं देखे ॥ ४२ ॥ पादुकासाधनम् असगंधं तथा तैलमंकोलस्य विशेषतः ॥ श्वेतसर्षपमेकत्र हस्तौ पादौ प्रलेपयेत् ॥ शतयोजनं च गच्छेत् नात्र कार्या विचारणा ॥ ४३ ॥ असगंध अंकोलका तेल और सफेद सरसों एकत्र कर हाथ पाँवोंमें लगावे तो सौ योजन चले इसमें विचार नहीं ॥ ४३ ॥ कंदुरीमूलमादाय तिलतैलेन क्वाथयेत् ॥ जंघे पादे च लेपेन चतुर्योजन गच्छति ॥ ४४ ॥ कंदुरीकी जड ले तिलके तेलमें क्वाथ कर जंघामें तथा तलुवोंमें लगावे तो चार योजन चले ॥ ४४ ॥
५४ रुद्रयामलतन्त्रम् कंदुर्य्यामलयोर्मूलं पिष्ट्वा चांकोलतैलके ॥ पादलेपेन गच्छंति मनुजाः शतयोजनम् ॥ ४५ ॥ कंदुरी और आंवलेकी जड ले अंकोलके तेलमें पीसकर तलुवोंमें लगावे तो सौ योजन चले ॥ ४५ ॥ मंत्रः । ॐ नमः चंडिकायै गगनं गमय गमय चालय वेंगवाहिनी ॐ ह्रीं स्वाहा । कृष्णकाकस्य हृन्नेत्रे जिह्वां चैव मनःसि- लम् ॥ सिंदूरं गैरिकं चैवामरवल्लीं च मालतीम् ॥ ४६ ॥ रुद्रजटां मस्तकीं च मूलमेकत्र कारयेत् ॥ पादयोलेपयेच्चैव सहस्रं स च गच्छति ॥ ४७ ॥ काले काकका हृदय अर्थात् करेजा नेत्र और जिह्वा तथा मनशिल सिंदूर गैरिक अमरवेलि मालती रुद्रजटामस्तकीकी जड़ ये सब एकत्र कर पांवके तलुवोंमें लेप करके एक सहस्र वार मंत्र जप करे तो सिद्धि होय ॥ ४६ ॥ ॥ ४७ ॥ मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय नमो हरि- तगदाधराय त्रासय त्रासय क्षोभय क्षोभय चलने बलने स्वाहा । पारदं च त्रयं टंकं चिल्हनीडे निधापयेत् ॥ यस्मिन्नीडे भवे- डंडास्तस्मिन् समवधारयेत् ॥ ४८ ॥ दीर्घ-
हिन्दीटीकासहितम् ५५ सूच्या पारदेषु छिद्रं समवकारयेत् ॥ तद्वि ष्ठां लेपयेच्छिद्रे भोजनार्थं तु यत्नतः ॥ ४९ ॥ ओदनादिकमाधाय यदंडानि बिभेद सा ॥ तदा गृह्णीयात्पारदं गुटिकां समकारयेत् ॥ मुखे निधाय गुटिकां गच्छेद्द्वादशयोजनम् ॥ ५० ॥ ३ टंक पारा चिल्हरिके घुरघुच्चेमें धर दे और जब इसके अंडा होय तब बारीक सूचीसे पारे में छेद कर चिल्हरिके विष्ठासे लेप कर छिद्रमें लपेट देवे और भोजनके अर्थ भात धर दे और नीडमें जब अंडा फोरे तब पारा उठाय वटिका बनाके मुखमें धारण करे तो बारह योजन चले ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ ५० ॥ ॐ ह्रीं ह्रीं हूं फट्चीलावक्त्रे सुरं पारात्परे पादुकागमनं देहि देहि मे स्वाहा । मंत्रेण पूजयेच्चैव गुटिकां सुविधानतः ॥ अमृतसं- जीवनविधि महादेवेन भाषितम् ॥ ५१ ॥ पहिले गुटिका लाकर इस मंत्रसे पूजन करे। यह अमृतसंजीविनीविधि श्रीमहादेवजीने कही है। पूजन करके जब २ मुखमें धरे तब २ बारह योजन चले ॥ ५१ ॥ महादेवस्य लिंगैकं पूजयेदंकोलसंनिधौ ॥ जलपूर्णं घटं चैव तत्रैव च निधापयेत् ॥ ५२ ॥ पूजयेलिंगं पृथक् पृथक् स्थाप्य पुनः पुनः ॥ प्रहरे प्रहरे चैव पूजयेद्दिनरात्रिकम् ॥ यावॅल्लिंगं प्रजयोच्च ह्यघोरेण समं ततः ॥ ५३ ॥
५६ रुद्रयामलतन्त्रम् एक अंकोलवृक्षके नीचे जलपूर्ण कलश धर उसी पर महादेवके लिंगका एक २ प्रहरपर अघोर मंत्रसे रातदिन पूजन करे ॥५२॥५३॥ फलं पुष्पं सुहारीं च निवेद्य सुसमाहितः ॥५४॥ घटे निधाय तां पूजां नित्यं नित्यं प्रयत्नतः ॥ यदांकोले फलं पातं फलमादाय पक्वकम् ॥५५॥ बीजानि च पृथक् कृत्वा दीर्घभांडे समाधयेत् ॥ तस्य मुखे टंकणं च मृदा च लेपयेन्मुखम् ॥५६॥ उच्चे स्थाप्य च तं भांडं शुष्कयेत्सुसमाहितः ॥ अधश्छिद्रं च कर्तव्यं ताम्रपात्रं निधापयेत् ॥५७॥ फलफूल पूरी सावधान होकर घरे, कलशके समीप वा घडाके भीतर रोज २ यत्नसे पूजा घरे और जब अंकोलमें फल लगे तब पक्वफल लेकर बीज- दूर कर एक बडी हांडीमें घरे, ऊपरसे सोहागा डाले, माटीसे मुख बंद कर सुखानेके वास्ते घाममें ऊँचेपर धरदे, पेंदीमें छिद्रकर नीचे ताम्रका बरतन धर देवे ॥५४॥५५॥५६॥५७॥ घर्मे स्थाप्ये च भांडे च तैलं निःसरते तदा ॥ अर्द्धमासं च तैलं हि मृतस्य नस्यमाचरेत् ॥ घामके जोरसे पंदरह दिनमें तेल निकसे तब वह तेल लेकर लोथके नासिकामें डाले ॥५८॥ विषभक्षणप्रेतेन मृतो वा कालतोऽपि वा ॥ सजीवो तत्क्षणाज्जातो शम्भोर्वचनसादतः ॥५९॥
हिन्दीटीकासहितम् ५७ जो विष खाके या और कोई कालसे मरा होय तो नास दियेसे क्षणमात्रमें महादेवके प्रसादसे जीवे ॥ ५९ ॥ पारदं मानुषं वीर्यं समभागं समानयेत् ॥ तैले समर्थं यत्नेन मृतस्य नस्यमाददेत् ॥ ६० ॥ कालतो गतजीवस्य देहे जीवो प्रविश्यति ॥ महादेवेन कथितं मिथ्या नैव भविष्यति ॥ ६१ ॥ तथा तेलमें पारा या मनुष्यका वीर्य बराबर २ मिलाके नास दे तो मरे हुये मनुष्यको चेत करे यह महादेवका वाक्य है मिथ्या नहीं हो सकता है ॥ ६० ॥ ६१ ॥ पुष्यार्के गुरमैमूलं तप्ततोयेन मर्दयेत् ॥ धेलप्रमाणपीतेन मृत्युं न स्यादकालतः ॥ ६२ ॥ मंत्रः । ॐ अघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः स्वाहा । सर्वतः . सर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपाय ॥ इति श्रीअवस्थिप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते रुद्रयामले भाषावार्तिकासंस्कृते अमृता- दिकथनं नाम तृतीयःपटलः ॥ ३ ॥ पुष्यार्कमें गुरमाकी मूल तप्त जलमें मर्दन कर एक धेलाभर (८ मासे) नित्य प्रति पीवे तो अकालसे मृत्यु नहीं होवे और यह मंत्र जपे तो सिद्धि होय ॥ ६२ ॥ इति हिन्दीटीकायां तृतीयः पटलः ॥ ३ ॥
५८ रुद्रयामलतन्त्रम् बह्वाहारकथनम् । बिभीतपत्रमंत्रेण दक्षजंघेन पीडयेत् ।। तदा विंशज्जनस्यैव ह्याहारं कुरुते नरः ।। १ ।। बहेरेका पत्ता दहिनी जंघासे पीसे अरकु लगावे तो बीस जनोंका आहार भक्षण करे। मंत्रसे पत्तेका पीडन करे ।। १ ।। बिभीतपत्रं दंतं च श्वेतश्वानस्य निश्चितम् ।। कटौ बंधनमात्रेण बहुभुग्जायते नरः ।। २ ।। बहेरेका पत्ता तथा सफेद कुत्तेका दांत कमरमे बाँधे और मंत्रका जप कर सिद्ध करे तो बहुत भक्षण करे ।। २ ।। संध्यायां च समादाय ह्यमलतालस्य पुष्पकम् ।। मालां निर्माय यत्नेन कंठे कृत्वासुभोजयेत् ।। ३ ।। कौपीनमोचनं कृत्वा तदा च बहुभोजयेत् ।। ४ ।। मंत्रः ॐ नमः भूतादिपतये ग्रस ग्रस शोषय शोषय भैरवी आज्ञापयती स्वाहा । वमनं कृत्वा तु तं गृह्य शिखायां च निवेशयेत् ।। तदा बहु करोत्येव भोजनं नात्र संशयः ।। ५ ।। संध्याके समय मंत्रसे किरअरी जिसमे अमिलतास होती है तिसके फूलकी माला बनाके यत्नसे कंठमे बाँधे और कौंपीन छोडकर बहुत भोजन करे । मंत्र मूलमें लिखा है वह पढे अथवा वमन कर मंत्र से वही माला शिखामे बाँधे तो बहुत भोजन करे ।। ३ ।। ४ ।। ।। ५ ।।
हिन्दीटीकासहितम् ५९ मंत्रः । ॐ नाडी वेगे उर्वशी स्वाहा । इस मंत्रका भोजनके समय जप करे । केकरस्यार्द्धक्षारस्य बीजं पिष्ट्वा गुणेन च ॥ गुटिकां बंधयेत्त्रीणि ताम्रे लौहेऽथ धारयेत् ॥ मुखे निधाय तं चैव क्षुत्पिपासा न बाधते ॥ ६ ॥ मंत्रः । ॐ सासं सरीरं अमृतभाषाय स्वाहा । केकरके बीज तथा अर्द्धक्षारके बीज पीसके मिठाईमें मिलाके गोली बाँध तीन तामे या लोहेमें यंत्र बनाकर मुखमें धारण करे तो क्षुधा या पिपासा बाधा न करे, मूलस्थ मंत्र पढे ॥ ६ ॥ कमलफलं तंडुलं शाटिकस्य च पाचयेत् ॥ अजादुग्धेन तं चापि घृतेन च स भोजयेत् ॥ तदा द्वादश दिनानि क्षुधा नैव च बाधते ॥ ७ ॥ कमलगट्टा और साठीके चावल छागीके दूधमें पकाके घी में मिला खावे तो बारह दिन क्षुधा न लगे ॥ ७ ॥ जंबोरस्य त्वचं चापि साल्लिकस्य तथैव च ॥ ८ ॥ विम्बाबीजानि संगृह्य घृतेन सह पेषयेत् ॥ एषां यो भोजयेच्चैव न क्षुधा बाधते च तम् ॥ ९ ॥ जंभोरीनींबूकी छाल तथा साल्लिककी छाल कुंदरूके बीज सबको घृतमें मिला प्रातःकाल भोजन करे तो क्षुधा न लगे ॥ ८ ॥ ९ ॥
६० रुद्रयामलतन्त्रम् ददुघ्नस्य च बीजं च कशेरुं कमलस्य च ॥ मूलं गोदुग्धपक्वं च खादेन्मासं न भक्षति ॥ १० ॥ पमारके बीज कसेरू और कमलकी जड गौके दूधमें पक्वकर भक्षण करे तो एक महीना भूख न लगे ॥ १० ॥ उमरीफलपक्वं च तैलेन च समन्वितम् ॥ अंकोलेन च तं चैव खादेन्मासं न बाधते ॥ ११ उमरीके पक्के फल तेलमें मिलाके अंकोलकी छाल या तेल मिलाके खावे तो एक मासतक क्षुधा न लगे ॥ ११ ॥ क्षुधा चैव पिपासा च ह्येतत्तंत्रं प्रकाशते ॥ महादेवेन कथितं न तथान्यत्प्रभाषणम् ॥ १२ ॥ क्षुधाका तथा पिपासाका तंत्र यह शिवजीने कहा है, सत्य है ॥ १२ ॥ ॐ गणपति वीर वसे मासानजो में मांगौ सो तुम आनुपांच लडुवा सिर सिंदुर त्रिभुवन मागें चंपेके फूल अष्टकुलि नाग मोहु नो नारी बहत्तरि कोटा मोहु इंद्रकी बेटी सभा मोहु आवती आवती इस्त्री मोहु जाता जाता पुरुष मोहु डांवा अंग वसे नरंसिंहजी वने क्षेत्रपलाजें आवै मारमर करतो सो जाइ हमारे पाउ परंता गुरूकी
हिन्दीटीकासहितम् ६१ शक्ति हमारी भक्ति चलौ मंत्र आदेश गुरूकी पूजयेद्घृतखंडाभ्यां गुग्गुलैर्होममाचरेत् ॥ वनसमिद्भिद्रूश्च शतं त्रिकं पंचाशच्चैककम् ॥ एतानि चाहुतिं दत्त्वा मंत्रमुच्चार्य यत्नतः ॥ १३ ॥ ऊपर लिखे मंत्रका घृत खांड गुग्गुलसे होम करे, वनकी समिधा ३५१ से होम करे, घी खांड गुग्गुल एकमें मिलाके ३५१ आहुति दे और यत्नसे मंत्र जपे ॥ १३ ॥ देवदेव महाआरण्य माता वरुण पिता शांडिल्यगोत्र वाहनभू अग्नेस्वाहा । ॐ विद्या किंल किंल कटुस्वाहा । सर्वासां सिद्धीनां स्वाहा । ॐ हंषंषं लोकाय स्वाहा । रक्त- तुंडायस्वाहा । अन्यगणेशमंत्रः । ॐ नज- गजोक्षस्वामी ॐ नजगजोक्षस्वामी । इति मंत्रं जपेच्चैव सहस्त्रैकं अष्टोत्तरं । सर्वकार्याणि सिध्यंति पृथक् पृथगुदाहृतम् ॥ १४ ॥ द्यूतविजयं नृपस्य वश्यं वचनमान्यं च सं ग्रामेऽप्यपराजितं पृथ्वीवशं तथा भवेत् ॥ १५ ॥ मनोवश्यं तथा लक्ष्मीक्षमौदास्यं याति संशयम् ॥ बुद्धि प्राप्नोति नित्यं च गणे-
६२ रुद्रयामलतन्त्रम् शस्य पूजनात् ॥ १६ ॥ अथ पूजनविधिं च होमस्य च विधिं तथा धूपं दीपं च नैवेद्यं दधिघृततिलं तथा ॥ १७ ॥ हवन- स्याष्टगुणं च मंत्रं पठेच्च स्वाहया ॥ तदन- तरं जपं च कुर्याच्चैव विंशति ॥ १८ ॥ यह मंत्र ११०८ बार जपे सब कार्यसिद्धि होय, द्यूतमें जय होय, राजा वश होय, राजाओंमें मान्य होय, संग्राममें जय होय, पृथ्वी वश होय, मन वश होय, लक्ष्मी वश होय, दास्यभाव दूर होय, बुद्धिप्राप्ति होय और चित्त शुद्ध होय यह सब गणेशके पूजनसे तथा मंत्र के जपनेसे होय ॥ १४ ॥ ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ मंत्रः । जिभ्या आग अमृत वशै सो काम दृष्टि आगू हनुमत वसै सभा मोहु श्रीरामचंद्रं . मंत्रेणानेन विधिना मोहितं च जगत्त्रयम् ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन जपेन्मंत्रं समाहितम् ॥ १९ :। इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचिते रुद्रयामले चतुर्थः पटलः ॥ ४ ॥ इन मंत्रोंको सावधान होकर जपे तो तीनों लोक वश होंय ॥ १९ ॥ इति हिन्दीटीकायां चतुर्थः पटलः ॥ ४ ॥
हिन्दीटीकासहितम् ६३ नवपंचनवेदौ च वत्सरे मार्गशीर्षके १८४९ ॥ कृष्णपक्षस्य द्वादश्यां बुधे ग्रंथसमाप्तकम् ॥ १॥ अवस्थिवंशे विख्यातो सर्वविद्यानिधिः शुचिः ॥ ब्रह्मण्यो धर्मवक्ता च ठाकुरप्रसादनामकः ॥ २ ॥ तस्य पुत्रौ च विख्यातौ ज्योतिषशास्त्रप्रवीणकौ ॥ ज्येष्ठो रषनलालश्च तिषालालकनिष्ठकः ॥ ३ ॥ रषनलालस्य पुत्रो परमसुखसुसंज्ञकः ॥ ज्योतिषशास्त्रे प्रवीणश्चशिष्यानध्यापयन्बहु ॥ ४ ॥ तस्य पुत्रौ प्रसूयेते लोके विख्यातकीर्तिकौ ॥ तयोज्येष्ठो हि यो पु त्रो प्रयागदत्तसंज्ञकः ॥ ५ ॥ व्याकरणशास्त्रनिपुणः पुराणेषु प्रवर्तकः ॥ थस्ग्रंथ कर्ता सद्बैद्यो प्रतापी विमलद्युतिः ॥ ६ ॥ तस्य पुत्रास्त्रयो ह्यासन् लोकविश्रुतधार्मिकाः ॥ तेषां ज्येष्ठो मुन्नालालः सर्वशास्त्रप्रवर्तकः ॥ ७ ॥ कनिष्ठो भगवद्दासो भगवान्प्रशादेतिच ॥ किंचिद्धीतो हि विद्यायां गृहकार्यप्रवीणकः ॥ ८ ॥ मध्यमो रामचरणो भगवद्दासदासकः ॥ श्रीरामचरणांभोजे नितरां प्रीतिमुद्वहन् ॥ ९ ॥
६४ रुद्रयामलतन्त्रम् तेनेदं कृतग्रंथं रुद्रयामलसंस्कृतम् ॥ नोदिते नंदरामेण रमुआपुरवासिना ॥ १० ॥ जिलाशीतापुरे तस्य तहसीलं च मिश्रिते ॥ डाकवेश्ममहोल्यां वै वशारोग्रामनामकः ॥ ११ ॥ नैमिषाद्वायव्यदेशे गोकर्णादानलेपि च ॥ चतुर्योजनमानेन तयोर्मध्ये हि वर्तते ॥ १२ ॥ यादृशं पुस्तकं ह्यस्ति तादृशं च कृतं मया ॥ मंत्राणां शुद्धमशुद्धे मम दोषो न दीयते ॥ १३ ॥ इति श्रीअवस्थीप्रयागदत्तसुतरामचरणविरचितं हिन्दीटीकासहितं रुद्रयामलतन्त्रम् समाप्तम् । पुस्तकें मिलने के स्थान :- १. खेमराज श्रीकृष्णदास, | २. गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस, | लक्ष्मीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, | व बुक डिपो, सातवीं खेतबाड़ी खम्बाटा लेन | अहिल्या बाई चौक, कल्याण, बम्बई - ४०० ००४ | (जि० ठाणे-महाराष्ट्र) ३. खेमराज श्रीकृष्णदास, चौक-वाराणसी (उ. प्र.)
क/298
पुस्तकें मिलने के स्थान - १. खेमराज श्रीकृष्णदास, | २. गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस, | लक्ष्मीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, | व बुक डिपो, सातवीं खेतवाडी खम्बाटा लेन | अहिल्या बाई चौक, कल्याण, बम्बई-४०० ००४ | (जि० ठाणे-महाराष्ट्र) ३. खेमराज श्रीकृष्णदास, चौक-वाराणसी-(उ. प्र.) मुद्रक एवं प्रकाशक: खेमराज श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४