भारतकोश
रूपमण्डन एवं देवमूर्त्ति-प्रकरणम् (मण्डन सूत्रधार - प्राचीन मूर्तिकला एवं देव-प्रतिमा लक्षण सटीक)

रूपमण्डन एवं देवमूर्त्ति-प्रकरणम् (मण्डन सूत्रधार - प्राचीन मूर्तिकला एवं देव-प्रतिमा लक्षण सटीक)

Rupamandanam and Devatamurti Prakaranam of Sutradhara Mandana

मण्डन सूत्रधार द्वारा

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः १२५ (याम्योदरतत् ?) संपादमग्रे स्यात् सार्धभागिकम् । कूर्मपृष्ठोन्नताकारं दर्पणो(द्ववमस्तकम् ? दरसन्निभम् ) ॥१३३॥ [ पीठम् ] मेखलामध्यकर्त्तव्या नवपीठन्तु कामदम् । भागैकं भूगतं कार्यं त्रिभागं (कर्त्तु?कण्ठ)पट्टिका ॥१३४॥ भा(गो?गा)र्धं मुखपट्टञ्च (स्कन्धसार्धत्रिभागोन्नतम् ?स्कन्धं सार्धत्रिभागतः) । स्कन्धश्च पट्टिकाद्व(यं न्द्रं) भागार्थं चान्तरपल्लिका ॥१३५॥ कणकं सार्धद्वयं भागै × × × कञ्चिन्निका मता । द्विभागं चान्तरपट्टं (क?च) (पोताविद्विसार्धका?) ॥१३६॥ (अर्धयं च मन्नासपट्टि?)कर्त्तव्यं विधिपूर्वकम् । अर्धे स्कन्धपट्टिकाख्या त्रिभागं स्कन्धशोभनम् ॥१३

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