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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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१०० : सचित्र ज्योतिषशिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

में सकर राशि पूर्व में है वह उदय स्थान है, तुला पश्‍चिम में है वह अस्त का स्थान है ॥ मक

राशि दक्षिण में है वह सिर के ऊपर का ( आकाश ) और कर्क राशि उत्तर में है वह

पैर के नीचे का स्थान ( पाताल ) है ।

वें में जो उदय स्थान है इसी स्थान को लग्न कहते हैं । जो राशि उस समय

पुर्व हो उसे ही लग्न या उदय लग्न कहते हैं और उस स्थान को लग्न स्थान कहते

हैं । कुण्डली-चक्र चित्र ६५ में जहाँ मेष राशि का सूचक अंक १ लिखा है वही लग्न

स्थान है ।

चित्र संख्या ६५

आकाश का चोकोर चित्र और कुण्डली

लग्न ( राशियाँ ) सदेव पृथ्वी की गति के अनुसार घूमती रहती हैं । कभी लग्न ` में वृष कभी मिथुनं, कभी कोई राशि रहती है। इस कारण जो राशि जन्म समय उदय हो रही हो उसे ही लग्न कहते हैं और उस राशि को कुण्डली चक्र में पूर्व के

स्थान में रख देते हैं,

मान लो किसी का जन्म कुंभ लग्न में हुआ है अर्थात्‌ पूवं में उस समथ कुम्भ राशि उदय हो रही थी । कुंभ लग्न की ११ वीं राशि है तो लगन स्थान ( पुर्व ) में इस ११ के अंक को रख देते हैं और उसके आगे के अंक क्रमशः बाई ओर से रखते जायेंगे जैसे ११ के आगे १२ फिर १ कोने में रखा, फिर पाताळ में २, फिर कोण में ३ और ४, अस्त में ५ फिर कोण में ६०७ और दशम स्थान ( सिर स्थान ) में ८ फिर कोण में ९-१० लिख देंगे देखो चित्र संख्या ६६। इसे ही लग्न कुंडली कहेंगे । इसमें केवल ग्रहों का भरना रह गया है । यह ग्रह रहित लग्न कुंडली हुई । अब ध्यान में आ गया होगा कि जो राशि उदय स्थान में हो अर्थात्‌ उदय हो रही हो उसे छग्त स्थान में रखकर बाई ओर से लग्न के आगे की राशि क्रमशः एक