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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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कुण्डली विचार : १०७

इस नक्शा को देखने से प्रगट होगा कि इनमें जो १ ( मेघ राशि ) बताई गई है वह सूर्य का उदय स्थान है। ठीक उसके सामने पश्चिम में अस्त स्थान पर ७ ( तुला राशि ) है। दक्षिण में 'ख' स्वस्तिक अर्थात् सिर के ऊपर का आकाश का भाग या गध्याम्ह में १० ( मकर राशि ) है। उत्तर में पैर के नीचे ( पाताल में ) या अर्द्ध राशि स्थान में ४ ( कर्क राशि ) दी है। इस प्रकार ४ स्थान निश्चित हो जाने पर इनकी विदियाओं के कोण स्थान में भी राशियाँ हैं। जैसे २ ( वृष राशि ) के सामने ८ ( वृश्चिक राशि ) ३ ( मिथुन राशि ) के सामने ९ ( धन राशि ), ५ ( सिंह राशि ) के सामने ११ ( कृष्ण राशि ) और ६ ( कन्या राशि ) के सामने १२ ( मीन राशि ) आती है। इस प्रकार ये राशियाँ एक दूसरे से ६-६ राशियों के अन्तर पर—(१८०° के अन्तर पर ) हैं। एक दूसरे के सामने हैं अर्थात् सामने की राशि १८०° के अन्तर पर होती है। ये राशियाँ सदा चलायमान हैं। ( पृथ्वी की गति के कारण चलायमान दिखती हैं ) अर्थात् जो सिर पर के ऊपर राशि है उसके आगे की राशि पूर्व की ओर मिलेगी। पूर्व में जो राशि है उसके आगे की राशि क्षितिज के नीचे अर्थात् उत्तर की ओर मिलेगी। जैसे पूर्व में मेघ राशि है तो उसके आगे उत्तर की ओर जाने से ( क्षितिज के नीचे ), २ ( वृष राशि ), ३ ( मिथुन ) आदि मिलेगी। और ठीक उत्तर में ४ ( कर्क ) रहेगी। इससे यह समझ लेना चाहिये कि जो राशि पश्चिम ( अस्त ) में है उसके आगे क्रमानुसार राशियाँ दक्षिण ( सिर ) पर से होते हुए, पूर्व ( उदय स्थान ) की ओर घूमते हुए उत्तर ( पाताल ) की ओर जाती है। अर्थात् राशियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर क्रमानुसार स्थित हैं। परन्तु घूमते समय राशियाँ पूर्व से पश्चिम की ओर जाती हैं जैसा चित्र संख्या ५ में बताया है, जैसे मेघ उदय होकर पश्चिम की ओर बढ़ेगा तब उस उदय स्थान पर वृष आयगा।

इसी को दूसरे प्रकार से आकाश का नक्शा बनकर समझाते हैं। पहिले जो गोल चक्र में आकाश का नक्शा बनाया था उसमें एक दूसरे को काटने वाली दिशा सूचक जो लकीरों पर ४ स्थान बनाये गये हैं १-४-७-१० वहाँ ये राशियाँ बनाई गई हैं। इन्हीं स्थानों का नाम केन्द्र स्थान (बीच के स्थान ) हैं।

जिस प्रकार गोल चक्र में १-४-७-१० राशियाँ केन्द्र में हैं ( चित्र संख्या ६५ देखो ) उसी प्रकार चौकोर नक्शे में भी चारों केन्द्र स्थान आ जाते हैं और यहाँ भी चारों स्थानों के नाम केन्द्र स्थान हैं। चारों केन्द्र स्थान के अतिरिक्त उन दिशाओं के कोण स्थान भी यहाँ कोण में आ गये हैं, जिससे समझ में अब आ जायगा कि चित्र ६४ में बताया हुआ गोल नक्शा और इस चित्र ६५ के चौकोर नक्शा में कोई अन्तर नहीं है। यही कुण्डली आकाश का नक्शा है।

इसमें भी १ के सामने ७ ( ६ राशि=१८०° का अन्तर पर ) ४ के सामने १०, २ के सामने ८, ३ के सामने ९, ५ के सामने ११, ६ के सामने १२ है। इस प्रकार १ राशि के सामने जो राशि होगी वह ६ राशि के अन्तर पर होती है। यहाँ भी मेघ