सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
कुण्डली विचार : १०७
इस नक्शा को देखने से प्रगट होगा कि इनमें जो १ ( मेघ राशि ) बताई गई है वह सूर्य का उदय स्थान है। ठीक उसके सामने पश्चिम में अस्त स्थान पर ७ ( तुला राशि ) है। दक्षिण में 'ख' स्वस्तिक अर्थात् सिर के ऊपर का आकाश का भाग या गध्याम्ह में १० ( मकर राशि ) है। उत्तर में पैर के नीचे ( पाताल में ) या अर्द्ध राशि स्थान में ४ ( कर्क राशि ) दी है। इस प्रकार ४ स्थान निश्चित हो जाने पर इनकी विदियाओं के कोण स्थान में भी राशियाँ हैं। जैसे २ ( वृष राशि ) के सामने ८ ( वृश्चिक राशि ) ३ ( मिथुन राशि ) के सामने ९ ( धन राशि ), ५ ( सिंह राशि ) के सामने ११ ( कृष्ण राशि ) और ६ ( कन्या राशि ) के सामने १२ ( मीन राशि ) आती है। इस प्रकार ये राशियाँ एक दूसरे से ६-६ राशियों के अन्तर पर—(१८०° के अन्तर पर ) हैं। एक दूसरे के सामने हैं अर्थात् सामने की राशि १८०° के अन्तर पर होती है। ये राशियाँ सदा चलायमान हैं। ( पृथ्वी की गति के कारण चलायमान दिखती हैं ) अर्थात् जो सिर पर के ऊपर राशि है उसके आगे की राशि पूर्व की ओर मिलेगी। पूर्व में जो राशि है उसके आगे की राशि क्षितिज के नीचे अर्थात् उत्तर की ओर मिलेगी। जैसे पूर्व में मेघ राशि है तो उसके आगे उत्तर की ओर जाने से ( क्षितिज के नीचे ), २ ( वृष राशि ), ३ ( मिथुन ) आदि मिलेगी। और ठीक उत्तर में ४ ( कर्क ) रहेगी। इससे यह समझ लेना चाहिये कि जो राशि पश्चिम ( अस्त ) में है उसके आगे क्रमानुसार राशियाँ दक्षिण ( सिर ) पर से होते हुए, पूर्व ( उदय स्थान ) की ओर घूमते हुए उत्तर ( पाताल ) की ओर जाती है। अर्थात् राशियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर क्रमानुसार स्थित हैं। परन्तु घूमते समय राशियाँ पूर्व से पश्चिम की ओर जाती हैं जैसा चित्र संख्या ५ में बताया है, जैसे मेघ उदय होकर पश्चिम की ओर बढ़ेगा तब उस उदय स्थान पर वृष आयगा।
इसी को दूसरे प्रकार से आकाश का नक्शा बनकर समझाते हैं। पहिले जो गोल चक्र में आकाश का नक्शा बनाया था उसमें एक दूसरे को काटने वाली दिशा सूचक जो लकीरों पर ४ स्थान बनाये गये हैं १-४-७-१० वहाँ ये राशियाँ बनाई गई हैं। इन्हीं स्थानों का नाम केन्द्र स्थान (बीच के स्थान ) हैं।
जिस प्रकार गोल चक्र में १-४-७-१० राशियाँ केन्द्र में हैं ( चित्र संख्या ६५ देखो ) उसी प्रकार चौकोर नक्शे में भी चारों केन्द्र स्थान आ जाते हैं और यहाँ भी चारों स्थानों के नाम केन्द्र स्थान हैं। चारों केन्द्र स्थान के अतिरिक्त उन दिशाओं के कोण स्थान भी यहाँ कोण में आ गये हैं, जिससे समझ में अब आ जायगा कि चित्र ६४ में बताया हुआ गोल नक्शा और इस चित्र ६५ के चौकोर नक्शा में कोई अन्तर नहीं है। यही कुण्डली आकाश का नक्शा है।
इसमें भी १ के सामने ७ ( ६ राशि=१८०° का अन्तर पर ) ४ के सामने १०, २ के सामने ८, ३ के सामने ९, ५ के सामने ११, ६ के सामने १२ है। इस प्रकार १ राशि के सामने जो राशि होगी वह ६ राशि के अन्तर पर होती है। यहाँ भी मेघ
१०० : सचित्र ज्योतिषशिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
में सकर राशि पूर्व में है वह उदय स्थान है, तुला पश्चिम में है वह अस्त का स्थान है ॥ मक
राशि दक्षिण में है वह सिर के ऊपर का ( आकाश ) और कर्क राशि उत्तर में है वह
पैर के नीचे का स्थान ( पाताल ) है ।
वें में जो उदय स्थान है इसी स्थान को लग्न कहते हैं । जो राशि उस समय
पुर्व हो उसे ही लग्न या उदय लग्न कहते हैं और उस स्थान को लग्न स्थान कहते
हैं । कुण्डली-चक्र चित्र ६५ में जहाँ मेष राशि का सूचक अंक १ लिखा है वही लग्न
स्थान है ।
चित्र संख्या ६५
आकाश का चोकोर चित्र और कुण्डली
लग्न ( राशियाँ ) सदेव पृथ्वी की गति के अनुसार घूमती रहती हैं । कभी लग्न ` में वृष कभी मिथुनं, कभी कोई राशि रहती है। इस कारण जो राशि जन्म समय उदय हो रही हो उसे ही लग्न कहते हैं और उस राशि को कुण्डली चक्र में पूर्व के
स्थान में रख देते हैं,
मान लो किसी का जन्म कुंभ लग्न में हुआ है अर्थात् पूवं में उस समथ कुम्भ राशि उदय हो रही थी । कुंभ लग्न की ११ वीं राशि है तो लगन स्थान ( पुर्व ) में इस ११ के अंक को रख देते हैं और उसके आगे के अंक क्रमशः बाई ओर से रखते जायेंगे जैसे ११ के आगे १२ फिर १ कोने में रखा, फिर पाताळ में २, फिर कोण में ३ और ४, अस्त में ५ फिर कोण में ६०७ और दशम स्थान ( सिर स्थान ) में ८ फिर कोण में ९-१० लिख देंगे देखो चित्र संख्या ६६। इसे ही लग्न कुंडली कहेंगे । इसमें केवल ग्रहों का भरना रह गया है । यह ग्रह रहित लग्न कुंडली हुई । अब ध्यान में आ गया होगा कि जो राशि उदय स्थान में हो अर्थात् उदय हो रही हो उसे छग्त स्थान में रखकर बाई ओर से लग्न के आगे की राशि क्रमशः एक
कुण्डली विचार : १०६
चित्र संख्या ६६
लग्न कुण्डली
पूर्व उदय
अस्त
एक कोठे में एक-एक राशि लिखते जाओ तो पूरी लग्न कुंडली बन जायगी। इससे यह भी प्रगट हुआ कि लग्न में राशियाँ सदैव बदलती रहती हैं।
भाव स्थान
पहिले बता चुके हैं कि पूर्व में जो राशि हो उसे उदय लग्न या लग्न कहते हैं। इसी प्रकार लग्न के आगे के प्रत्येक स्थानों के भिन्न-भिन्न नाम हैं जिनके स्थान और नाम जानना आवश्यक है। (१) जहाँ सूर्य उदय होता है वह उदय लग्न या लग्न (२) जहाँ सूर्य अस्त होता है वह अस्त लग्न या सप्तम लग्न=सप्तम स्थान या सप्तम भाव है। (३) जहाँ पाताल है वह चतुर्थ लग्न=चतुर्थ भाव या चतुर्थ स्थान है। (४) आकाश (सिर के ऊपर) दशम लग्न=दशम भाव या दशम स्थान है। ये चारों केन्द्र स्थान कहलाते हैं।
(५) लग्न के आगे कोण में दूसरे स्थान को=द्वितीय स्थान या द्वितीय भाव (६) तीसरे घर को तृतीय या तृतीय भाव (७) पाताल के आगे कोण में पाँचवाँ घर=पंचम स्थान या पंचम भाव (८) छठे को षष्ठ स्थान या षष्ठ भाव (९) अस्त के आगे कोण में षष्ठम स्थान या षष्ठम भाव (१०) नवम को नवम स्थान या नवम भाव (११) दशम के आगे कोण में एकादश को एकादश स्थान या एकादश भाव (१२) बारहवें को द्वादश स्थान या द्वादश भाव कहते हैं। देखो चित्र संख्या ६७। ये भाव के स्थान स्थिर हैं अर्थात् इन स्थानों में कभी परिवर्तन नहीं होता। ये ही स्थान भाव स्थान कहलाते हैं। भाव स्थिर हैं परन्तु इन भावों में आने वाली राशियाँ सदा बदलती रहती हैं।
११०: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चित्र संख्या ६७
आकाश में द्वादश भाव
उदय
अब इन्हीं स्थानों को फिर से क्रम पूर्वक समझाते हैं। देखो चित्र संख्या ६८ (१) जहाँ सूर्य उदय होता है वह उदय स्थान है इसी को लग्न कहते हैं। यहाँ कुण्डली में कुंभ राशि लग्न में है। (२) आगे द्वितीय स्थान है, इसमें मीन राशि है, (३) तृतीय स्थान में मेष राशि है, (४) चतुर्थ में वृष राशि, (५) पंचम में मियुन राशि, (६) षष्ठ में कर्क राशि (७) सप्तम भाव में सिंह राशि, (८) अष्टम भाव में कन्या राशि, (९) नवम भाव में तुला राशि, (१०) दशम भाव में वृश्चिक राशि (११) एकादश भाव में धन राशि और (१२) द्वादश भाव में अकर राशि है।
चित्र संख्या ६८
लग्न कुंडली
कुण्डली बिचार : १११
एक और उदाहरण देकर समझाते हैं देखो चित्र संख्या ६९ की भाव सूचक कुंडली । यहाँ इस समय कन्याराणि उदय स्थान में है अर्थात् कन्यालग्न उदय हो रही है । इससे ठग्न, मै कन्या राशि का अंक ६ रखा, (२) दूसरे में तुला, ( ३ ) तीसरे
चित्र संख्या ६९
भाव नाम सुचक कुण्डली
उदय
Rs ७ ./ A LTS
ह Me कोक ॥ (बन) पमु माय
पाताल अरद्धरानि सुद्दद ९
) कर्म १ आकाश घ्याल
सुत' १०); जाया १२
D2 ११ ““पर्ष २
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अस्त क
में वृश्चिक, (४) चौथे भाव में धन, (५) पंचम स्थान में पकर) (६) सच्छ में कुंभ, (७) सप्तम में मीन, (८) अष्टम में मेप, (९) नवम में बुष, (१०) दशम में मिथुन, (११) एकादश में ककं, (१२) द्वादश भाव में मिट राशि है । इसी प्रकार राशियों में परिबर्तन तो होता रहदा है परन्तु भाव ( स्थान ) में कोई परिवर्तन नहीं होता है ।
भाव स्थान के स्थान ( १ ) ळान=हदु स्वान ( शरीर) (२) दवितीय घन स्थान, ( ३ ) तृतीय-सहज-भातू या पराक्रम, ( ४) चढुवनमुद्दद या सु, (५) पंचम-सुत, ( ६) पष्ठ-रिपु, (७) सप्दम=्जावा, (८) अष्टमन्मृत्य, (९ ) चवमन्धमं, (१०) दशम ८ कर्म, (११ ) एकादश = आय, ( १२ ) द्वाबश= व्यय (खर्च) । इन्हीं द्वादश स्थानों को द्वादश भाव कहते हुँ। ये भाव आगे समझाये जायेंगे।
द्वादश भावों के नाम पढ्ने का कारग |
( १ ) तनु -जिस लग्म का जन्म समय उदय होता है उसका शरीर के साथ
ने शरीर या तनुभाव नाम पड़ा ।
ला रे Mind की रक्षा के लिए अन्न वस्न आदि >>! आदि प्राप्त
करने का विचार मन में उत्पन्न होता है इस कारण तनुभाव से दूसरे भाव का नाम
घन पडा ।
११२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
(३) सहज—धन प्राप्त कर उसकी रक्षा के लिए पराक्रम करना पड़ता है और इस पराक्रम में सहायता देने व ले धन का बटवारा करने वाले सहोदर होते हैं। इससे इसका नाम पराक्रम और सहज पड़ा।
(४) सुख—पराक्रम होने पर घर और भाई आदि बंधुओं के सुख की भावना मन में उत्पन्न होती है। इससे इस नाम का गृह बंधु और सुख पड़ा।
(५) सुत—यह बन्धु और सुख मिलने पर पुत्र विद्या आदि प्राप्त करने की भावना हृदय में उत्पन्न होती है। विषय सुख की अपेक्षा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना श्रेष्ठ है। ब्रह्मज्ञान विद्या से होता है इससे इसका नाम पुत्र और विद्या पड़ा।
(६) रिपु—सुत प्राप्ति का विचार होने पर इसका साधन विवाह है, इससे सन्तान के लिए विवाह करने का विचार होता है। रोगी होने से विवाह नहीं हो सकेगा। इससे शरीर को रोगहीन बनाने का विचार उत्पन्न होता है। इससे इस भाव का नाम रोगभाव पड़ा। रिपु भी रोगरूप है और कार्य में वाधक होता है। इससे इसका नाम रिपुभाव भी पड़ा।
(७) जाया भाव—रोग से निवृत्ति होने पर विवाह के लिए स्त्री प्राप्ति का विचार उत्पन्न होता है। इससे इसका नाम जाया (स्त्री) पड़ा।
(८) मृत्यु भाव—स्त्री मिलने के उपरान्त मृत्यु से रक्षा के लिए आयु बढ़ाने का विचार उत्पन्न होता है। इस कारण इसका नाम मृत्यु पड़ा।
(९) धर्म भाव—धर्म करने से ही आयु बढ़ती है और मृत्यु दूर होती है। इससे इसका नाम धर्म पड़ा।
(१०) कर्म भाव—धर्म की बढ़ती के लिए यज्ञ भजन पूजन आदि कर्म और कर्म की रक्षा के लिए पिता या राज्य का सहाय लेना पड़ता है। इससे यह कर्म-भाव हुआ।
(११) आय—कर्म करने के लिए धन आदि के लाभ की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इस कारण इसे लाभ या आय भाव कहते हैं।
(१२) व्यय—लाभ होने पर उस धन को किस प्रकार व्यय करना ऐसा विचार उत्पन्न होता है। इससे इसका नाम व्यय भाव पड़ा।
अध्याय २१
कुण्डली बनाने के लिए लग्न निकालना
कुंडली बनाने के प्रयास में यह जानने की आवश्यकता है कि कौन लग्न है। और इस समय जो लग्न है वह किस प्रकार जान सकते हैं? क्योंकि बिना जन्म-समय की लग्न जाने कुंडली नहीं बन सकती। इस कारण जन्म-तिथि, महिना, सन-ईस्वी ( या
कुण्डली विचार : ११३
तिथि बार मास सम्बत) और जन्मसमय और जन्मस्थान अवश्य मालूम होना चाहिए। बिना समय और तिथि आदि के जाने, लगन नहीं मालूम हो सकती। कुण्डली में लगन बहुत महत्व की है, क्योंकि यदि लगन में अन्तर पड़ जायगा तो कुण्डली के फल कहने में बहुत अन्तर पड़ेगा। जितना ही अधिक सूक्ष्म समय होगा उतनी ही सूक्ष्म लगन निकाली जा सकती है।
गणित द्वारा सूक्ष्म लगन निकालने में नवीन विद्या थीं को आरम्भ में कठिनाई जान पड़ेगी। इस कारण पहिले उसका सिद्धांत बता देते हैं। सूक्ष्म रूप से लगन निकालने की विधि गणित खण्ड में मिलेगी। यहाँ प्रारम्भिक ज्ञान के लिए लगन निकालने की स्थूल रीति बतायेंगे, क्योंकि स्थूल रीति से लगन निकालना सरल है, इसी कारण पहिले उसे उदाहरण देकर समझायेंगे।
लगन जानने के पहिले यह जान लेना आवश्यक है कि सूर्य कहाँ पर अर्थात् किस राशि पर है। यह पञ्चांग में दिया रहता है। किसी-किसी पञ्चांग में प्रातः काल का, किसी में मिश्र कालीन सूर्य स्पष्ट दिया रहता है। मिश्र काल की जो घड़ी पल दी है उस समय पर सूर्य किस राशि के कितने अंश कला विकला पर है यह देखो। जिस राशि पर सूर्य होगा, पञ्चांग देखने से प्रगट हो जायगा। यदि दैनिक सूर्य स्पष्ट पञ्चांग में नहीं दिया है तो सूर्य की संक्रांति कौन है और कब हुई पञ्चांग में देखो। जहाँ मेघेऽर्कः वृषेऽर्कः इत्यादि लिखा होगा वहाँ घड़ी पल भी लिखी होगी, उससे प्रगट होगा कि अमुक तिथि को अमुक समय पर अमुक संक्रान्ति हुई है। जिस राशि पर सूर्य आता है उसी राशि की संक्रांति भी कहलाती है, इसी कारण राशि के आगे अर्कः लिखा रहता है।
सूर्य एक राशि पर लगभग एक मास रहता है और प्रतिदिन लगभग एक अंश अनुमान से चलता है। ज्योतिषी को सर्वत्र ध्यान में रखना चाहिए कि आजकल कौन राशि पर सूर्य है, और उस राशि पर कब सूर्य आया था (कब संक्रान्ति हुई थी)।
मान लो श्रावण कृष्ण २ को पञ्चांग में कर्क चाकः ३४।२ लिखा है। इस समय से कर्क राशि में सूर्य आया। अपने को श्रावण की अमावस्या को सूर्य की स्थिति जाननी है। अमावस्या तक १४ तिथियाँ होती हैं। गत २ तिथि घटाई तो शेष १३ दिन में १३° सूर्य चला। इससे प्रगट हुआ कि सूर्य अभी कर्क का ही है, केवल १३° लगभग कर्क के अभी व्यतीत हुए हैं।
जिस राशि पर सूर्य होता है वही राशि सूर्योदय पर होती है। ज्यों-ज्यों सूर्य मध्याह्न की ओर बढ़ता है उसी के अनुसार उसके आगे की लगनों का क्रमानुसार उदय होता रहता है। इस प्रकार लगन में परिवर्तन होता रहता है।
मान लो वृष राशि पर सूर्य है और समय प्रातः काल का है तो सूर्य उदय के
८
११४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
साय-साय वृष लग्न भी प्रातःकाल उदय होगी तब उस समय कहेंगे कि वृष लग्न का उदय हुआ है। यदि ठीक उसी समय किसी का जन्म हुआ हो तो लग्न स्थान में हम वृष राशि का सूचक २ अंक लिख देंगे और आगे की राशियाँ क्रमशः एक-एक कोठे में रखकर आगे की पूरी १२ राशियाँ क्रमानुसार भर देने पर जन्म समय की ग्रह रहित लग्न कुंडली बन जायगी। इस कुंडली में वृष लग्न है।
जब सूर्य ठीक सिर पर आता है तो हम कहेंगे कि सूर्य दशम स्थान पर आया है, क्योंकि सिर के ऊपर का ही नाम दशम स्थान है और मध्याह्न काल में सूर्य सिर पर आता है। मान लो किसी का जन्म ठीक दोपहर को हुआ है तो हम दशम स्थान में, सिर पर जो राशि हो उस राशि को रख देंगे, क्योंकि उस समय दशम स्थान में सूर्य होने से, सूर्य की वृष राशि भी दशम स्थान में रहेगी। यहाँ सूर्य वृष राशि का है तो दशम स्थान में वृष का अंक २ लिखकर वहाँ सूर्य की लिख देंगे और आगे की राशियाँ
क्रम पूर्वक आगे के कोठों में भर देंगे जैसा यहाँ बताया है। इस कुण्डली में लग्न के स्थान में ५ अंक आया है यही पाचवीं सिंह लग्न यहाँ पर जन्म लग्न हुई, और यही उस समय के जन्म की ग्रह रहित कुण्डली बन गई।
जब सूर्य अस्त होने लगता है तो कहेंगे कि सूर्य अस्त स्थान अर्थात् सप्तम स्थान पर आया है। यदि उस समय किसी का जन्म हो तो सप्तम स्थान पर सूर्य जिस राशि पर हो वह राशि लिख दो और आगे सब राशियाँ क्रमशः भर दो तो ग्रह रहित लग्न कुण्डली बन जायगी। यहाँ पर वृष राशि का सूर्य है इस कारण सप्तम स्थान (अस्त) पर वृष का २ अंक लिखा और आगे की राशियाँ भर देने से लग्न स्थान में वृषिक राशि आई। इससे प्रगट हुआ कि उस समय वृषिक लग्न थी।
कुण्डली बनाने के लिए ज्ञान निकालना : ११५
जब ठीक अर्द्ध राशि हो तो कहेंगे कि सूर्य पाताल ( चतुर्थ स्थान ) में हैं। यदि ठीक उस समय किसी का जन्म हो तो जिस राशि पर सूर्य हो उसे चतुर्थ स्थान में लिखकर आगे की शेष राशियाँ क्रमानुसार भर देंगे तो उस समय की ग्रह रहित कुण्डली बन जायगी। यहाँ वृष का सूर्य है तो २ को चतुर्थ स्थान ( पाताल ) में रखा और शेष राशियाँ क्रमानुसार भर देने पर लगन में ११ कुंभ राशि आई तो कहेंगे कि जन्म समय कुंभ लगन थी और यही ग्रह रहित जन्मकुंडली होगी।
ऊपर के उदाहरण में सूर्य की स्थिति के अनुसार ठीक ठीक जन्म समय मिल जाने पर कुंडली बना लेना सरल हो गया था।
यदि इनके अतिरिक्त और कोई समय में किसी का जन्म हो तो कैसे लगन जानना, यहाँ बतलाते हैं।
पहिले बता चुके हैं कि एक चक्र में ३६०° और ४ समकोण होते हैं। सूर्य उदय से अस्त तक १८०° ( ६ राशियाँ ) पार करता है। ३०-३० अंश की १ राशि होती है। उदय से मध्याह्न तक ९०° का कोण बनता है और सूर्य ३ राशियाँ पार करता है। इस प्रकार उदय से अस्त तक १८०°=६ राशि पार करता है। देखो चित्र संख्या ७०।
जब सूर्य उदय होता है तो लगन पर होता है। मध्याह्न में दशम पर, संध्या को सप्तम पर होता है। इसी के अनुसार बीच के भाव कोण जान लेना। जैसे उदय से ३० अंश ऊपर सूर्य जाने पर द्वादश भाव में सूर्य पहुँचेगा। ३० अंश और ऊपर चढ़ने पर एकादश भाव में आवेगा। इसी प्रकार अस्त स्थान से ३० अंश ऊपर सूर्य है तो अष्टम स्थान में सूर्य है ऐसा कहेंगे। यदि सूर्य और ऊपर अस्त से ६०° पर मध्याह्न की ओर है या मध्याह्न से ३०° आगे बढ़ा है तो कहेंगे सूर्य नवम स्थान या नवम भाव में है।
आकाश के अर्द्ध गोलार्द्ध को जो क्षितिज के ऊपर है ६ भागों में अनुमान से विभक्त कर लो और वे ६ भाव ( स्थान ) आकाश में कहाँ कहाँ हैं बताए हुए चित्र संख्या ७० के अनुसार अनुमान करो।
११६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चित्र संख्या ७०
आकाश में लग्न से अस्त तक भाव
यदि दिन है तो सूर्य को देखो और अनुमान करो कि किस भाव में है, जैसे सूर्य को देखकर कितना बजा होगा इसका अनुमान हो जाता है इसी प्रकार इसके भी अनुमान करने का अभ्यास कर लो। जिस भाव में सूर्य हो उस भाव में सूर्य लिख कर सूर्य की राशि भी लिख दो और आगे की राशियाँ सब क्रमानुसार भर दो तो उस समय की लग्न कुण्डली बन जायगी और लग्न के स्थान में जो राशि आवे उसे लग्न समझो।
अब यह बात विचारने की है कि ६ राशियों में सूर्य उदय से अस्त तक प्रायः १२ घंटे में घूमता है, इससे एक राशि में लगभग २ घण्टे का औसत पड़ा। जैसे सूर्य ६ बजे उदय हुआ तो १२ बं भाव में न बजे, ११ बं में १० बजे, दशम में १२ बजे, (सोपहर) नवम भाव में २ बजे, अष्टम में ४ बजे और सप्तम में ६ बजे संख्या को सूर्य पहुँचैगा।
उदय काल के अनुसार समय बदलता रहता है। इस कारण सूर्य को देखकर भाव का अनुमान करना और जिस भाव में सूर्य दिखे उसी भाव में सूर्य रखकर सूर्य की राशि भी उसी भाव में लिख दो और क्रमशः आगे की राशियाँ भर दो तो ग्रह रहित लग्न कुण्डली बन जायगी।
ऊपर लग्न प्रकार २-२ घंटे का दिया है, परन्तु वास्तव में किसी लग्न का अधिक किसी का कम प्रमाण है परन्तु (१) मेष-मीन (२) वृष-कुम्भ (३) मिथुन-मकर (४) कर्क-धन, (५) सिंह-वृश्चिक (६) और कन्या-तुला इतका सदैव एक समान लग्न प्रमाण रहता है अर्थात् मेष और मीन का एक ही लग्न प्रमाण है। इसी प्रकार शेष २-२ राशियों की जोड़ी दी है उन दोनों का एक ही लग्न प्रमाण होता है।
परन्तु यहाँ पर अधिक खट-पट में न पड़कर स्पष्ट रूप से २-२ घण्टे का प्रत्येक राशि का उदय प्रमाण सिद्धान्त समझाने के लिए ही मान लिया है। सूक्ष्म रूप से इसका विचार गणित खण्ड में मिलेगा।
कुण्डली बनाने के लिए लगन निकालना : ११७
मान लो किसी का जन्म २ बजे रात का है। यदि ६ बजे सूर्योदय हुआ है तो सूर्योदय से ( १२-६ )=६ घण्टा दोपहर तक+१२ घण्टा आधी रात तक + २ घण्टा और=२० घण्टा हुआ था=२४ घण्टा अर्द्ध रात्रि तक + २ घंटा= २६ घंटा-६ घंटा सूर्योदय के=२० घंटा-२=१० राशि। १ राशि २ घंटा में हुई तो २० घंटा में १० राशि हुई। सूर्य वृष राशि का है तो वृष राशि से १ गिना तो १० की राशि कुंभ हुई। यही कुंभ लगन उस समय होगी।
यदि जन्म २-२५ बजे मध्याह्न का है=१२+( २-२५ )=१४ घंटा २५ मि० इसमें से ६ बजे सूर्योदय का घटाया तो ६-२५ रहे। इसमें २ का भाग दिया तो ४ बार पूरा भाग लग गया और शेष बचा उसकी पाँचवीं राशि हुई। वृष से पाँचवीं राशि कन्या हुई। इस कारण उस समय कन्या लगन होगी।
इसी प्रकार सूर्योदय से जन्म समय तक घंटा मिनट गिन कर २ का भाग देने से और सूर्योदय की राशि से उतनी संख्या गिनने पर इसका अनुमान हो जाता है कि उस समय लगन में कौन राशि होगी।
मान लो रात्रि का समय है और चन्द्र विखता है तो पंचांग से देखलो कि चन्द्र किस राशि पर है। पञ्चांग विषय में दैनिक चन्द्र देखना बतला दिया गया है। सूर्य देख कर जिस प्रकार कुण्डली बनाई थी यही उसी प्रकार चन्द्र देखकर कुण्डली बना लेना। जिस स्थान पर चन्द्र आकाश में दिखेगा उसी स्थान पर चन्द्र लिखकर चन्द्र की राशि भी लिख देंगे और क्रमानुसार आगे की राशियाँ भर देंगे तो लगन कुण्डली बन जायगी।
जैसे कन्या राशि का चन्द्र जन्म समय सिर पर है अर्थात् दशम स्थान में है तो दशम भाव में चन्द्र और चन्द्र की राशि का अंक ६ लिख कर आगे की राशियाँ क्रम पूर्वक भर देने से घन लगन आ जाती है। यह लगन कुण्डली बन गई। यहाँ सूर्य भी लिख दो। अपने को पहले से मालूम है कि इस समय वृष राशि का सूर्य है। जहाँ वृष राशि हो सूर्य लिख दो। यहाँ षष्ठ भाव में वृष राशि है इस कारण षष्ठ भाव में सूर्य लिख दिया।
चन्द्र यदि और कोई स्थान में हो तो आकाश में चन्द्र जिस भाव में दिख रहा हो उस भाव में चन्द्र और उसकी राशि लिख कर उपर्युक्त रीति से कुण्डली बना लो तो लगन निकल आवेगी।
यदि चन्द्र भी नहीं है और अंधेरी रात है तो तारागणों को देखो कौन नक्षत्र
११८ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारंभिक ज्ञान खण्ड
कहाँ पर है और वह नक्षत्र किस राशि का है। किसी एक नक्षत्र पर से राशि जान कर देखो वह किस भाव में है, जिस भाव में वह राशि हो लिख कर क्रम पूर्वक भेष राशियाँ भर दो तो लग्न स्थान में जो राशि आवे वही लग्न होगी। यदि सब नक्षत्रों की अच्छी तरह पहचान हो गई हो तो कौन नक्षत्र उदय हो रहा है, कौन उदय हो चुका है उन नक्षत्रों की राशि पर से उनके ठीक-ठीक स्थान का अनुमान कर उपर्युक्त रीति से कुंडली बना कर जान लो।
परन्तु स्मरण रहे कि यह सब स्थूल मान से है। जैसे कोई पुखे कि इस समय क्या वजा होगा तो सूर्य की ओर देखकर अनुमान किया जा सकता है कि इस समय ३ बजा होगा। यदि उस समय घड़ी देखते हैं तो विधित होता है कि ३ बज कर ३० मिनट ४० सेकेण्ड हुआ है या ३ बजने को १४ मिनट बाकी हैं। इसी प्रकार उपर्युक्त रीति भी स्थूल है। इससे कुछ सूक्ष्म और शुद्ध लग्न पञ्चाङ्ग में दिये हुए दैनिक लग्न पत्र से जानी जा सकती है।
दैनिक लग्न होरा सारिणी
यह प्रत्येक पञ्चाङ्ग में नहीं दिया रहता, परन्तु काशी, जवलपुर आदि कई स्थानों के पञ्चाङ्ग में अवश्य दिया रहता है। यद्यपि इसके विषय में पहिले बता चुके हैं परन्तु यहाँ और भी उदाहरण देकर समझाते हैं। उदाहरण के लिए जवलपुर का लोक विजय पञ्चाङ्ग सम्बत् २००० का लेते हैं।
पञ्चाङ्ग के तिथिपत्र के नीचे उस पक्ष भर की तिथियाँ और बार ऊपर लिखा है। बाईं ओर खड़ी पंक्ति में लग्न के नाम दिये हैं और आगे वह लग्न कब तक रहेगी उसका घंटा मिनट दिया है।
जन्म समय ठीक क्या वजा है देखो, यदि लड़ाई के समय का नया समय* (१ घंटा बढ़ा हुआ) है तो १ घंटा घटाकर पुराना समय बनालो और लग्नपत्र में उस तिथि और बार के नीचे अपना इष्ट समय खोजो। इष्ट समय सारिणी में दिये हुए जिस समय के भीतर मिले उसके बाईं ओर जो लग्न लिखी हो वही लग्न उस समय होगी।
मान लो किसी का जन्म वैशाख शुक्ल ३ शुक्रवार के रात्रि के ९-४० बजे का है। लग्न पत्र के नीचे शुक्ल पक्ष की ३ तिथि शुक्रवार के नीचे ७-७ तक तुला और ९-२४ तक वृश्चिक लग्न है। अपना समय बढ़ा हुआ समय होने से एक घंटा घटा कर लिया तो (९-४०)-(१०)=८-४० यह पुराना समय हुआ। ९-२४ के भीतर यह ८-४० है। इस कारण उस समय वृश्चिक लग्न हुई। यही जन्म लग्न हुई। वृश्चिक लग्न को लग्न स्थान में रखकर कुण्डली बना लो।
*लड़ाई के समय तारीख १-९-१९४२ ई० से ता० १५-१०-१९४५ तक गर्वनेमेंट की आज़ा से भारतवर्ष में घड़ियाँ १ घंटा आगे बढ़ा दी गई थीं। जिसके कारण उस समय १ घंटा बढ़ा हुआ समय प्रचलित था।
कुण्डली बनाने के लिए लगन निकालना : ११९
ध्यान रहे लगनपत्र में घंटा मिनट में ही समय दिया रहता है, इससे अपना समय घंटा मिनट में रात या दिन का है जान कर लगन निकाल लो। इससे लगन जानना बहुत ही सरल है।
किसी दो में लगन प्रारम्भ होने का समय दिया रहता है और समय रेलवे के अनुसार २४ बजे तक दिया रहता है। जिस प्रकार लगनपत्र हो बुद्धि से विचार कर उपयोग करो। नये विचार्यों को कोई ऐसा पंचाङ्क खरीदना चाहिए जिसमें लगनपत्र आदि आवश्यक बातें दी हों।
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अध्याय २२
इष्ट काल निकाल कर लगन सारिणी से लगन निकाल कर जन्म कुण्डली बनाना। इष्टकाल—
कोई भी विचारणीय इष्ट विषय के सम्बन्ध में यह जानना कि उस समय क्या बजा है, वही समय इष्टकाल कहलाता है। जैसे किसी का जन्म १० बजे दिन को हुआ तो १० बजे का समय इष्टकाल घंटा में हुआ। यदि किसी ने कोई प्रश्न पूछा तो उसका उत्तर देने१ लिए उस समय की लगन जानने के लिए समय की आवश्यकता होगी वही समय इष्ट काल है। जैसे किसी ने २ बजे रात को पूछा कि अमुक द्रव्य चोरी गया है मिलेगा कि नहीं तो २ बजे रात का समय अपना इष्ट काल हुआ।
इष्ट काल का समय घड़ी पल में होना आवश्यक है। यदि यह समय घंटा मिनट में दिया हो तो इसके घड़ी पल बना लो। यह स्मरण रहे कि घंटा मिनट का समय अब्द रात्रि से आरम्भ होता है अर्थात् १२ बजे रात के उपरान्त १-२ आदि बजता है और अपना इष्ट घड़ी पल का समय सूर्योदय के उपरान्त आरम्भ होता है अर्थात् इष्ट घड़ी पल से प्रगट होता है कि सूर्योदय से इतने घड़ी पल उपरान्त किसी का जन्म आदि हुआ है।
जन्म समय घंटा मिनट में दिया रहता है उसे घड़ी पल में परिवर्तन करने की युक्ति यह है :—
उस दिन सूर्योदय का समय ( जो घंटा मिनट में दिया रहता है ) पंखांग से देख लो और उस समय को इष्ट काल के घंटा में से घटा दो, जो शेष घंटे बचे उनके घड़ी पल बना लो तो इष्ट निकल आयगा। इसी को कुछ उदाहरण देकर समझाते हैं :—
( १ ) यदि १२ बजे ( दोपहर ) के प्रथम जन्म है तो उसमें से सूर्योदय के घंटा मिनट घटा कर जो बचे उसके घड़ी पल बना लो। मान लो सूर्योदय ५ घं० ३१ मि० पर है और जन्म ११ बजकर ५० मिनट पर हुआ है तो जन्म घंटा में सूर्योदय घटाने से ६—१९ घंटा बचा। इसके घड़ी पल बना दें तो १५ घंटा ४७।। पल हुए तो अपना इष्ट काल १५ घं० ४७।। पल हुआ।
१२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
| घंटा मिनट | घड़ी पल ---|---|--- जन्म— | ११-५० | ६ घण्टा=१५-० सूर्योदय | ५-३१ | १९ मि०=०-४७॥ शेष | ६-१९ | योग=१५-४७॥
( २ ) यदि दोपहर ( १२ बजे ) के उपरान्त रात्रि के १० बजे तक जन्म है तो जन्मसमय रेलवे टाइम के अनुसार बना लो अर्थात् १२ घंटा और जोड़ देना । जैसे रात के ११ बजे हैं तो ११+१२=२३ बजे जन्म समझो । अब इसमें से सूर्योदय घंटा कर घड़ी पल बना लो जैसे जन्म १२ बजे रात का है तो १२+१२ = २४ बजे जन्म समझो । यदि उस दिन सूर्योदय ५ घंटा ४५ मिनट पर हुआ तो २४ घंटा से सूर्योदय का समय घटाने से शेष १८ घण्टा १५ मिनट बचा, इसके ४५ घड़ी ३७॥ पल हुए । इस कारण ४५ घड़ी ३७॥ पल इष्ट काल हुआ ।
| घण्टा मिनट | घड़ी पल ---|---|--- जन्म— | २४-० | १८ घंटा = ४५-० सूर्योदय | ५-४५ | १५ मि० = ०-३७॥ शेष | १८-१५ | योग = ४५-३७॥
यदि जन्म अर्द्धरात्रि के उपरान्त है तो उसमें ( १२ दोपहर-॥ १२ बजे अर्द्धरात्रि के=२४ ) २४ घंटा जोड़ दो और उसमें सूर्योदय घंटा कर घंटा मिनट के घड़ी पल बना लो तो इष्ट निकल आवेगा जैसे रात के २ बं ४५ मि० पर जन्म है तो इसमें २४ घंटा जोड़े तो २६ घंटा ४५ मिनट हुए । इसमें सूर्योदय घटाया । मान लो सूर्योदय ५ बं ३१ मि० पर था यह घटाने से २१-१४ बचे इसके ५३-५ घड़ी पल हुए । इस कारण अपना इष्ट ५३ बं ५ पल हुआ ।
| बं मि० | घं पं ---|---|--- जन्म— | २-४५ | २१ घण्टा=५२-३० | +२४-० | १४ मि०= ०-३५ जन्म = | २६-४५ | योग ५३-५ सूर्योदय | ५-३१ | इष्ट शेष | २१-१४ |
लग्नसारिणी से लग्न देखना
किरी-किरी पञ्चांग में दैनिक लग्नपत्र नहीं रहता । लग्न पत्र से केवल लग्न ही विदित होती है, परन्तु यह पता नहीं चलता वह लग्न कितने अंश युक्त हो चुकी है । इस कारण लग्न जानने की तीसरी सरल रीति यहाँ देते हैं । इससे लग्न की राशि और अंश भी जान सकते हैं । यह लग्न सारिणी द्वारा जानी जा सकती है ।
लग्नसारिणी प्रत्येक पंचांग में दी रहती है । बहुधा ज्योतिषी जो गणित द्वारा लग्न निकालने की खट-पट से बचना चाहते हैं, इसी सारिणी द्वारा लग्न निकाल लेते
अध्याय २२ : १२१
है। गणित द्वारा इससे भी सूक्ष्म रूप से मुद्रा लग्न कला विकला तक निकाली जा सकती है। प्रत्येक स्थान के अनुसार लग्न प्रमाण में कुछ अन्तर पड़ जाता है, परन्तु काम चलाने की यह सारिणी बहुत उपयोगी है, इससे लग्न तो अवश्य ठीक निकल आती है। आरम्भ में इसका उपयोग जान लेने से नया विद्यार्थी काम चला सकता है। अपने स्थान की लग्नसारिणी बनाना और लग्न निकालने का पूरा गणित, गणित खण्ड में मिलेगा।
जिस दिन की लग्न निकालनी हो उस दिन के सूर्य की राशि और अंश पञ्चांग से देख लो। जैसे वैशाख शुक्ल ३ सम्बत् २००० शुक्रवार को पंचांग में प्रातः रवि स्पष्ट ० २२-१५-१ दिया है। अर्थात् मीनराशि गत होकर मेघराशि के २२°-१५-'१" पर प्रातः काल सूर्य था।
अब लग्नसारिणी देखो। वार्ड और खड़ी पंक्ति में राशि दी है और ऊपर आड़ी पंक्ति में अंश दिये हैं। अपनी सूर्य की राशि ० रा २२° है ( मेघ के २२ अंश ) यहाँ कला विकला छोड़ दिया। अब खड़ी पंक्ति में देखो जहाँ मेघ वृष आदि राशियाँ लिखी हैं वहाँ ० मेघ, वृष १, मिथुन २ इत्यादि दिया है अर्थात् दिये हुए अंक की राशि गत हो गई और अक्षरों में बताई राशि वर्तमान है। जैसे मेघ ० दिया है इसका अर्थ यह है कि ० ( मीन ) राशि तो गत राशि है और मेघराशि वर्तमान राशि है। सूर्य मेघ ० का है इससे मेघ ० के सीध में दाहिनी ओर, और सूर्य मेघ के २२° पर है, इससे २२° के नीचे देखा ( ऊपर की पंक्ति में २२° खोजो )। २२° के नीचे मेघ की सीध मे ५-५६-० लिखा हुआ मिला। इसमें अपना इष्ट काल जोड़ो। मान लो अपना इष्ट काल ८-४० बजे रात का है। उस, दिन सूर्योदय ५-३१ पर था तो ८-४० में १२ घंटा जोड़ के सूर्योदय घटाया और उसके घड़ी पल बनाये तो इष्ट ३७-५२-३० हुआ। इसमें ऊपर का प्राप्त सारिणी अंक ५-५६-० जोड़ो तो ४३-४८-३० घड़ी हुई। अब
| चं० मि० | च० प० |
|---|---|
| ८-४० | १५ घण्टा = ३७-३० |
| + १२ - ० | ९ मिनट = ०-२२-३० |
| जन्म=२०-४० | = इष्ट = ३७-५२-३० |
| सूर्योदय ५-३१ | + सारिणी अंक ५-५६-० |
| मेघ=१५-१९ | = ४३-४८-३० |
सारिणी के भीतर खोजो इस अंक के समीप का अंक कहाँ है, सारिणी में इसके समीप का ४३-५२-० मिला। अपना इष्ट युक्त सारिणी अंक ४३-४८-३० है। इनके समीप का यही ४३-५२-० मिलता है। इसके आगे / ४४-१०-२० अंक है वह बहुत अधिक है, इस कारण ४३-५२-० को ही लिया। अब इस अंक के वार्ड और देखा दृषिचक राशि है और ऊपर अंश देखा तो २२° मिला। इससे प्रगट हुआ कि दृषिचक लग्न २२° भुक्त हुए हैं। या लग्न ७ रा० २२° है।
१२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अब लग्न कुण्डली में लग्न के स्थान पर वृश्चिक के ८ अंक रख कर पूर्व बताई रीति से पूरी कुण्डली बना लो।
लग्न सारिणी से लग्न देखने की रीति यह है कि उस दिन का सूर्य जिस राशि अंश पर है पंचांग से देख लो। समझो किस राशि के कितने अंश भुक्त हुए हैं। जैसे सूर्य रा० १०-२५° दिया है तो मकर राशि भुक्त होकर कुम्भ के २५° भुक्त हुए हैं, यहाँ सूर्य की राशि कुम्भ लेगे। खड़ी बाईं ओर की पंक्ति में सूर्य की राशि मिलेगी और ऊपर आड़ी पंक्ति में अंश मिलेंगे। खड़ी पंक्ति में वर्तमान राशियों के नाम और भुक्त राशियों के अंक दिये हैं जैसे ६ तुला, यहाँ ६ कन्या राशि भुक्त हो गई है और तुला राशि वर्तमान है ऐसा समझना। सूर्य की जो राशि वर्तमान हो उसको खड़ी पंक्ति में खोज कर उसके आगे दाहिनी ओर सीध में और सूर्य के इष्ट अंकों के नीचे जो अंक में मिले उसमें इष्ट काल जोड़ लो। यदि इष्ट काल जोड़ने से ६० घड़ी से अधिक इष्ट काल हो जाता है तो उसमें से ६० घड़ी निकाल दो ( घटा दो ) और शेष ( बचे हुए ) अंक लो। फिर इष्ट भुक्त प्राप्त सारिणी अंक को सारिणी में खोजो। इससे मिलता जुलता और इससे कम अंक जहाँ मिले उसके बाईं ओर, लग्न की राशि और सबसे ऊपर सीध में अंश लिखा मिलेगा, वही लग्न होगी। जैसे ३ कर्क लिखा हो और ऊपर १४ अंश लिखा हो तो लग्न राशि ३-१४° समझना अर्थात् कर्क के १४° भुक्त हो गये हैं। कुण्डली में यही कर्क लग्न लिखना जैसा ऊपर उदाहरण देकर समझा दिया गया है।
जन्मसमय बहुधा चंटा मिनट में दिया रहता है, यह बहुत साधारण समय है। वास्तव में समय कई प्रकार के हैं। जन्मन की दूसरी लड़ाई के समय यहाँ का प्रचलित स्टेण्डर्ड टाइम १ घण्टा बढ़ा दिया गया था अर्थात् वरमा का स्टेण्डर्ड टाइम भारतवर्ष भर में प्रचलित कर दिया गया था। इस टाइम से स्टेण्डर्ड टाइम पृथक् है। घूघ घड़ी के अनुसार ( लोकल टाइम ) स्थानिक समय पृथक् है। यहाँ तो केवल प्रारम्भिक बातें बताई जा रही हैं जिसके समझने में नवीन विचार्यों को सरलता हो। समय का सूक्ष्म ज्ञान गणित खंड में मिलेगा।
संग्रह कुंडली बनाना
अभी तक लग्न निकाल कर कुंडली चक्र में राशियों स्थापित करना ही बताया है, उसमें यहाँ की स्थिति विचार कर ग्रह स्थापित करने को रह गया है। कुंडली में ग्रह कैसे रखना यहाँ बतलाते हैं।
मान लो बौधाख भुक्त ३ संभवत २०००, जन्मसमय ८ घं० ४० बजे रात्रि की कुंडली बनाना है। लग्न सारिणी देखने से ८-४० बजे वृश्चिक लग्न आई थी वृश्चिक लग्न होने से लग्न कुंडली में, लग्न स्थान में ८ रखकर शेष राशियाँ शेष स्थानों में भर दीं। अब ग्रह भरने के लिये पंचांग देखो। उस दिन प्रातः काल रवि स्पष्ट में
अध्याय २२ : १२३
लग्न कुंडली
सूर्य रा०-२२°-३५'-१" दिया है अर्थात् मीन गत होकर मेष राशि पर सूर्य है। इससे जहाँ मेष का अंक १ लिखा है वहाँ सूर्य लिख दिया। अब चंद्र को देखा तो उस दिन ३१ घं० ४५ प० उपरांत मिथुन राशि में आया है। अपना इष्ट काल ३७ घं० ५२ प० ३०
वि० है यह ३१-४५ से अधिक है। इस कारण चंद्र मिथुन राशि पर आ गया है, इससे मिथुन के अंक ३ के कोठे में चन्द्र रखा।
शेष ग्रह साप्ताहिक ग्रह चक्र देखकर भरना पड़ता है। पंचांग में वैशाख शुक्ल ८ बुधवार का ग्रह स्पष्ट का चक्र दिया है और इसके पहिले चैत्र कृष्ण ३० (अमावस) मंगलवार का ग्रह स्पष्ट का चक्र दिया है। अपना जन्मसमय इन दोनों के बीच का है। दोनों चक्रों को देखो उनमें क्या अंतर है। चन्द्र और सूर्य ग्रह तो पहिले लिख चुके हैं, शेष ५ ग्रह और लिखना है।
वैशाख कृष्ण ३०
वैशाख शुक्ल ८
इन दोनों चक्रों में वे ग्रह जिनमें कोई अंतर नहीं है ये हैं—२ बु० ११ मं० ३ गु० २ श० ४ रा० १० के०। इस कारण ये ग्रह अपनी कुंडली में भी इन्हीं स्थानों में लिख देंगे। अब केवल शुक्र ग्रह लिखने को रह गया है, क्योंकि पहिली कुंडली में शुक्र बुधराशि में है और दूसरी कुंडली में शुक्र मिथुनराशि में आ गया है। यह कब बदला है पंचांग देखो। अब देखना है कि यह अपने इष्ट काल के पहिले बदला है या उसके उपरांत। पंचांग के तिथिपत्र के अंत में ये सब सूचनाएँ मिलती हैं।
पंचांग में वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को मिथुने शुक्र: २७-१७ लिखा है अर्थात् वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के २७-१७ इष्ट पर मिथुनराशि पर शुक्र आया है। इससे प्रगट हुआ कि इष्ट काल के प्रथम ही मिथुनराशि पर शुक्र आ गया है। इससे शुक्र को मिथुन
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राशि पर ही लिखना पड़ेगा। इस प्रकार सब ग्रह लिख देने पर अपनी लग्नकुंडली तैयार हो गई।
लग्न कुंडली
चन्द्र कुंडली
अब चन्द्रकुंडली तैयार करना है। चन्द्र मिथुनराशि का है। इस कारण चन्द्र की राशि मिथुन, लग्न स्थान में लिखो और शेष राशियाँ क्रमानुसार भर कर, लग्नकुंडली के अनुसार ही ग्रह भर दो तो चन्द्रकुंडली बन जायगी। अर्थात् लग्न ८ की जगह चन्द्र की राशि ३ लिख कर शेष सब राशियाँ ग्रह सहित लग्नकुंडली के अनुसार ही लिख देना पड़ता है। चन्द्र कुंडली में केवल राशियों के स्थान में परिवर्तन हुआ है और कोई अंतर नहीं पड़ता जैसा ऊपर बताया है।
चन्द्रकुंडली को राशिकुंडली भी कहते हैं। मनुष्य के शरीर से जैसा लग्न का सम्बन्ध है उसी प्रकार चन्द्र का भी सम्बन्ध है। विशेष कर चन्द्रग्रह मन का चोतक है। जन्म के चन्द्र से गर्भाधान काल का लग्न से विशेष सम्बन्ध रहता है। इस कारण लग्नकुंडली के साथ-साथ चन्द्रकुंडली भी स्थापित की जाती है।
ऊपर जो कुंडली बनाने की रीति समझाई गई है यह कुंडली, जन्म (जन्म पत्र बनाना), वर्ष (वर्ष फल बनाना), प्रश्न (किसी प्रश्न के निर्णय करने के समय) इत्यादि के सम्बन्ध से जहाँ जैसी आवश्यकता हो बनाई जाती है और उस पर से फल कथन किया जाता है। इस कारण यह कुंडली बहुत महत्व की होती है, यह जितनी शुद्धता पूर्वक बनाई जा सके उतना ही शुद्ध फल होगा।
अध्याय २३
राशियाँ और कालाङ्क
कालाङ्क (काल पुरुष का अंग)
प्रत्येक राशियाँ का प्रभाव अंग के विशेष भाग में पड़ता है। काल पुरुष के किस अंग के विभाग में कौन राशि विशेष प्रभाव डालती है यह जानना चाहिये। कालपुरुष
राशियों और कालांग : १२५
के अंग और राशियों से सम्बन्ध है, इस कारण कालांग यहाँ बतलाते हैं। लग्न के विभाग के अनुसार लग्न से या मेष से क्रमानुसार गिनने पर शरीर में इन राशियों का स्थान कहाँ पड़ता है, नीचे बताया है।
लग्न मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुष मीन या राशि
| मुख्य अंग | सिर | मुख | कंधा | हृदय | पेट | कमर | वस्ति | गुह्योन्मिष | जांघ | घुटना | टांग | पैर |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गला | बाहु | छाती | कलेजा | मूत्रपिंड | ||||||||
| Face | Arms | Breast | Stomack | Heart | Pelvis | Reins | Private parts | Thigh | Knees | |||
| neck | anus | ect | Legs | |||||||||
| Feet | ||||||||||||
ऊपर चक्र में इन राशियों या भाव का प्रभाव अंग विशेष में बताया है, परन्तु इसके अतिरिक्त ये और भी अंगों पर प्रभाव डालते हैं इस कारण इनको और भी समझाते हैं।
१ मेष—इसका प्रभाव विशेष कर मस्तक पर पड़ता है। भौंह के ऊपर के भाग पर इसका प्रभाव जानाना। सिर और भेजा, मेधाशक्ति आदि इसके अंतर्गत हैं।
२ वृष—भींह के नीचे मुख, नेत्र, चेहरा, गला इसमें शामिल हैं। इसका प्रभाव ग्रीवा ( गर्दन ) तक है।
३ मिथुन—दोनों हाथ, कंधे, भुजा, और छाती की ओर के भाग तक इसका प्रभाव है। इसका प्रभाव फेफड़े गला वाणी पर भी पड़ता है। दोनों छातियों में भी प्रभाव करता है। ग्रीवा और छाती के बीच के भाग पर इसका प्रभाव पड़ता है।
४ कर्क—हृदय, वित्त, दोनों छाती और जठर (पेट की अग्नि) पर प्रभाव पड़ता है।
५ सिंह—कुक्षि ( कूख-कोखा ), पीठ, पेट, हृदय, रक्त स्थान, कलेजा पर प्रभाव करता है।
६ कन्या—कमर, पेट की अंतर्द्वियाँ और जठर पर भी प्रभाव करता है।
७ तुला—मूत्राशय, गुदा, वस्ति, पेट; नाभि, कटि आदि पर इसका प्रभाव पड़ता है। नाभि के नीचे लिंग स्थान के ऊपर के भाग में इसका प्रभाव है। यह हाथ के पंजे पर भी प्रभाव डालता है। त्वचा पर भी प्रभाव करता है।
८ वृश्चिक—गुह्योन्मिष, मल मूत्राशय ( गुदा लिंग ) आदि पर इसका प्रभाव है।
९ धन—दोनों जंघाओं पर इसका प्रभाव है। शरीर का नाड़ी चक्र ( Artrial system ) धमनी चक्र आदि पर भी प्रभाव डालता है।
१० मकर—दोनों घुटने, हड्डी, हृद्वियों की संधि, पर प्रभाव डालता है।
१२६ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
११ कुम्भ—टाँग, घूटने के नीचे का भाग पिङ्गली आदि पर और रक्त के बहाव पर प्रभाव डालता है। मञ्जा तंतु और नेत्र पर भी प्रभाव डालता है।
१२ मीन—दोनों पैर के पंजें, पैर की अँगुली आदि पर प्रभाव करता है। यह आँत और पेट में भी प्रभाव करता है।
यह प्रभाव लग्न से या गत राशियों के अनुसार पड़ता है।
इनका उपयोग
मान लो किसी के जन्मसमय भेद का सूर्य हो, भेद का सूर्य उच्च का होता है (जैसा आगे बताया है) तो वह मनुष्य बड़े मस्तक वाला होगा। अपने मस्तक-बल से धनोपार्जन करेगा। यह मन्त्री आदि बड़े ओहदे पर भी हो सकता है।
किसी राशि में कोई पापग्रह (यह आगे समझाया है) हो तो उन राशियों से जिस अंग का बोध होता है, उस अंग में व्रण (फोड़े) आदि होंगे या उस अंग में कोई ग्रह जनित बाधा उपस्थित होगी, जैसे भेद का मंगल पड़ा है तो, भेद से सिर पीड़ित होगा। यदि जन्मकाल में, लग्न में भेद राशि हो और उसमें मंगल हो तो उसके सिर में चोट आदि का भय हो। जन्म समय जिस राशि में पाप ग्रह हों उस राशि का बतलाने वाले अंश में मसादि चिह्न होंगे। उसी प्रमाण से जिस राशि में पाप ग्रह हो या रवि-चन्द्र * पीड़ित हो उस राशि के अंग विभाग में रोग होगा।
भाव के अनुसार कालांग
ऊपर राशि के सम्बन्ध से कालपुरुष के अंग बताये हैं वे अंग लग्नादि भाव से भी सम्बन्ध रखते हैं और समस्त भाव के सम्बन्ध से भी शरीर के अंगों पर प्रभाव पड़ने का विचार किया जाता है।
जैसे मिथुन लग्न है यह जातक (जिसकी जन्मकुण्डली है) का सिर हुआ। उस स्थान पर कोई ग्रह नहीं हो तो सिर में कोई चिह्न होगा। मान लो लग्न में युध्द है, युध्द शुभ ग्रह होने से उसका कपाल या सिर सुन्दर होगा। दूसरे स्थान में कर्क राशि है और कोई ग्रह नहीं है वह मुख का स्थान है, इस कारण मुख स्वच्छ होगा। तीसरा स्थान कंघा या बाहु पर प्रभाव करता है, तीसरे में सिंह है और कोई ग्रह नहीं है तो बाहु स्वस्थ होंगे। छठा स्थान का प्रभाव कमर पर होता है। मान लो छठे भाव में वृश्चिक राशि है और इसमें चन्द्र है तो उसे खाज गजकर्ण आदि रोग कमर में होंगे, परन्तु चन्द्र शुभ ग्रह होने से अपनी दशा में उस रोग को अच्छा करेगा, इत्यदि, प्रकार से भाव के सम्बन्ध में भी विचार होता है।
- दिप्पणी—सूर्य चन्द्र पाप ग्रह से युक्त हों या ग्रहण से युक्त हों या कोई ग्रह युद्ध में पराजित, केतु से धूम्रित ग्रह और उल्कापात वाला ग्रह पीड़ित कहलाते हैं। इसका स्पष्टीकरण पृथक् खण्ड में होगा।