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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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कुण्डली विचार : १०६

चित्र संख्या ६६

लग्न कुण्डली

पूर्व उदय

अस्त

एक कोठे में एक-एक राशि लिखते जाओ तो पूरी लग्न कुंडली बन जायगी। इससे यह भी प्रगट हुआ कि लग्न में राशियाँ सदैव बदलती रहती हैं।

भाव स्थान

पहिले बता चुके हैं कि पूर्व में जो राशि हो उसे उदय लग्न या लग्न कहते हैं। इसी प्रकार लग्न के आगे के प्रत्येक स्थानों के भिन्न-भिन्न नाम हैं जिनके स्थान और नाम जानना आवश्यक है। (१) जहाँ सूर्य उदय होता है वह उदय लग्न या लग्न (२) जहाँ सूर्य अस्त होता है वह अस्त लग्न या सप्तम लग्न=सप्तम स्थान या सप्तम भाव है। (३) जहाँ पाताल है वह चतुर्थ लग्न=चतुर्थ भाव या चतुर्थ स्थान है। (४) आकाश (सिर के ऊपर) दशम लग्न=दशम भाव या दशम स्थान है। ये चारों केन्द्र स्थान कहलाते हैं।

(५) लग्न के आगे कोण में दूसरे स्थान को=द्वितीय स्थान या द्वितीय भाव (६) तीसरे घर को तृतीय या तृतीय भाव (७) पाताल के आगे कोण में पाँचवाँ घर=पंचम स्थान या पंचम भाव (८) छठे को षष्ठ स्थान या षष्ठ भाव (९) अस्त के आगे कोण में षष्ठम स्थान या षष्ठम भाव (१०) नवम को नवम स्थान या नवम भाव (११) दशम के आगे कोण में एकादश को एकादश स्थान या एकादश भाव (१२) बारहवें को द्वादश स्थान या द्वादश भाव कहते हैं। देखो चित्र संख्या ६७। ये भाव के स्थान स्थिर हैं अर्थात् इन स्थानों में कभी परिवर्तन नहीं होता। ये ही स्थान भाव स्थान कहलाते हैं। भाव स्थिर हैं परन्तु इन भावों में आने वाली राशियाँ सदा बदलती रहती हैं।