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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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१३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

घर में बैठता है दूसरे भाव में घन राशि है घन का स्वामी गुरु होता है। यह गुरु अपने ही घर में बैठता है तो कहेंगे द्वितीयेश गुरु स्व-गृही या(स्वलेनी) है। तीसरे भाव में मकर राशि है, इसका स्वामी शनि होता है। यह शनि, बुध के घर में है, क्योंकि जहाँ शनि बैठता है वहाँ कन्या राशि है और कन्या का

स्वामी बुध होता है। यहाँ तृतीय शनि बुध स्थानी है। चतुर्थ भाव में कुम्भ राशि है जिसका स्वामी शनि होता है। यह शनि बुध के घर में है। चतुर्थ भाव में राहु बैठता है तो कहेंगे राहु शनि के घर में बैठता है, और चतुर्थेश शनि बुध के घर में है। पंचम में मीन राशि है जिसका स्वामी गुरु होता है, गुरु पंचमेश होकर घन-भाव में बैठता है। षष्ठ में मेष राशि है। इसका स्वामी मंगल है। इससे कहेंगे कि षष्ठेश मंगल सप्तम में है और मंगल के स्थान में सूर्य बैठता है। सप्तम में वृष राशि है जिसका स्वामी शुक्र होता है। इससे यह शुक्र का घर है, इसमें मंगल और बुध बैठे हैं। यहाँ बुध, पाप ग्रह मंगल के साथ होने से पाप ग्रह माना जायगा। सप्तमेश शुक्र द्वादश भाव में स्वरस्थानी ( अपने घर का ) है। अष्टम में मिथुन राशि है यह बुध का घर है, क्योंकि मिथुन का स्वामी बुध होता है। इस घर का स्वामी बुध मंगल के साथ, शुक्र के घर में बैठता है। नवम भाव में चन्द्र स्वगृही है, क्योंकि कर्क राशि यहाँ है जिसका स्वामी चन्द्र होता है। दशम भाव में सिंह राशि है जिसका स्वामी सूर्य षष्ठ भाव में मंगल के घर में बैठता है। दशम भाव में केतु है, यह सूर्य के घर में बैठता है। एकादश स्थान में बृध स्थानी (के स्थान में) शनि है, क्योंकि यहाँ कन्या राशि है जिसका स्वामी बुध होता है। द्वादश भाव में स्वरस्थानी शुक्र है यहाँ तुला राशि है जो शुक्र का ही घर है।

स्वामित्व का और भी विचार

कुंडली में मुख्यतः चन्द्र सूर्य और लग्न से फल के विचार में ध्यान दिया जाता है। द्वितीय स्थान से नेत्र ज्योति, कुट्टम्ब और विद्या का भी विचार होता है। तीसरे स्थान से कंठ, वस्त्र, कर्ण, आशुषण, चतुर्थ से बाहुन भू सम्पत्ति आदि, पंचम से ईश्वर प्रेम विद्या मंत्र आदि, षष्ठ से भूल्य, व्यसन, रोग आदि का विचार होता है। इन सब स्थानों से किंश-किंस बात का विचार होता है आगे बताया जायगा, यहाँ तो इससे ग्रहों का प्रभत्व विचारना है, इस कारण संक्षेप में थोड़ा विचार किया गया है।

सब ग्रहों से सूर्य अधिक प्रभावशाली है, इस कारण उसे राजा कहा है। राजा सूर्य के स्थान सिंह से दूसरी राशि कन्या है। दूसरे स्थान से कुट्टम्ब विद्या आदि का