भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 288 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

ग्रहमैत्री : १४५

सम्पूर्ण ग्रहों का फल विचारते समय इसी पंचधा मैत्री चक्र के अनुसार ग्रहमैत्री का विचार होता है। जैसे लग्नकुंडली में लग्न में वृश्चिक राशि है। इसका स्वामी

लग्नकुंडली

मंगल हुआ, यह मंगल चतुर्थ भाव में शनि के घर (कुंभ) में बैठता है। पंचधा मैत्री में मंगल का शनि मित्र है। इस कारण मंगल मित्रस्थानी हुआ। वृष का शनि सप्तम में है वृषेश्वर (वृष का स्वामी) गुरु है, शनि का यह गुरु पंचधा मैत्री से अधिक मित्र है तो कहेंगे कि शनि अधिमित्र क्षेत्री है। इसी प्रकार सब ग्रहों की मैत्री का

विचार करना पड़ता है। मित्र क्षेत्र में ग्रह होने से उसका बल बढ़ेगा और शत्रु क्षेत्र में बल घटेगा। यह सब विचार के लिए मैत्री का उपयोग होता है।

जो ग्रह मित्रक्षेत्री, स्वक्षेत्री, अधिमित्रक्षेत्री या उच्च का हो वह शुभ फल देगा। शत्रुक्षेत्री, अधिशत्रुक्षेत्री या नीच में ग्रह हो तो अनिष्ट (बुरा) फल देगा। इस कारण यह का क्षेत्र जानने के लिए इस लग्नकुंडली से ग्रह क्षेत्र विचार कर नीचे देते हैं।

उपयुक्त लग्नकुंडली के ग्रहों का क्षेत्र विचार

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलवृषगुरुशुक्रशनिराहु
क्षेत्रअधि-अधि-मित्रअधि-समअधि-अधि-सम
मित्रगृहीमित्रस्थानीक्षेत्रीमित्रक्षेत्रीगृहीमित्रगृहीमित्रक्षेत्रीक्षेत्री

अध्याय १२

ग्रहों की दृष्टि Aspects of the planets

प्रत्येक भाव राशि या ग्रह पर किस-किस ग्रह की किस प्रकार की दृष्टि है, इसका विचार भी, ग्रहों के फल निर्णय करने के लिए करना पड़ता है, इस कारण ग्रहों की दृष्टि का जानना आवश्यक है।

दृष्टि का स्पष्टीकरण—

जब सूर्य चंद्र होता है तो उसकी किरण तिरछी होने के कारण गर्मी इस जगह पड़ती है। ज्यों-ज्यों सूर्य का अंश बढ़ता है त्यों-त्यों सूर्य का तेज बढ़ता है। जब सूर्य ९०° पर अर्थात् क्षिर पर आजाता है तो उसकी किरणें सामने पड़ने से सूर्य का प्रकाश

१०