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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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१४६ : राशिच ज्योतिष शिक्षा प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अधिक बढ़ जाता है अर्थात् उस समय गर्मी बहुत बढ़ जाती है। जब दिन ठलने लगता है तो उसकी किरणें तिरछी पड़ती हैं और प्रभाव कम होते-होते अन्त में लुप्त हो जाता है। उसी प्रकार सब ही ग्रहों का प्रभाव होता है। जिस ग्रह के सामने दूसरा ग्रह होगा उस पर, उस ग्रह पर पूरा प्रभाव पड़ेगा, जब वाजू से होगा तो कम प्रभाव पड़ेगा।

जिस राशि पर कोई ग्रह हो उसके ठीक सामने सातवीं राशि होती है और उस समय दोनों ग्रहों का अन्तर १८०° का रहता है। इस कारण सातवें स्थान पर ग्रह का पूरा प्रभाव पड़ता है, इसी का नाम पूर्ण दृष्टि है। इसी प्रकार शेष दृष्टि में किरणें तिरछी पड़ती हैं। इस कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है।

जो ग्रह देखता है उसे ब्रह्मा ग्रह कहते हैं। जिस ग्रह या भाव पर किसी दूसरे ग्रह की दृष्टि पड़ती है उसे दृश्य कहते हैं।

दृष्टि ४ प्रकार की होती है—(१) एक पाद दृष्टि या चौथाई दृष्टि, (२) द्विपाद दृष्टि या अर्द्ध दृष्टि, (३) त्रिपाद दृष्टि या तीन दृष्टि और (४) पूर्ण दृष्टि।

चित्र संख्या ७३ ग्रह की दृष्टि

चित्र संख्या ७३ में बताया है कि किसी ग्रह की अपने स्थान से किसी भाव पर या कितने अन्तर पर किस प्रकार की दृष्टि पड़ रही है। जहाँ दृष्टि नहीं है वहाँ बताया है। इस चित्र में ग्रहों की दृष्टि के प्रकार बतला कर उनकी किरणों का प्रभाव बताया गया है। इस चक्र में भीतर किनारे पर ३०-३०° की एक-एक राशियाँ दी हैं और ग्रह स्थान से अन्तर अंगों में बताया है। चक्र के ऊपर भी १२ भाव या स्थान दिये हैं। इससे प्रगट होगा कि ग्रह स्थान से कौन से स्थान पर या कितने राशि अन्तर पर किस प्रकार की दृष्टि होती है।