सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहों का प्रभाव : १६१
३ मंगल—यह आकार आदि में पृथ्वी सरीखा है, इसी से इसे भूमिपुत्र कहते हैं। वह रक्षिद्र का प्रभाव बताते हुए तामड़ रंग का चमकते हुए दिखाता है। यह मंगल स्वभाव से क्रोधी, चुगुलखोर और मूठा होता है। यह निर्बल हो तो उस समय स्वभाव में झुटाई, चुगुलखोरी; क्रोधीपना, दुष्टता और क्रोध के कार्य प्रगट करता है। यह अनिष्ट हो तो उष्णता का विकार, भयंकर व विरोधिक ज्वर, प्लेग, कालरा, माता आदि स्पृशजंय रोगों से दुःख उत्पन्न करता है।
४ बुध—यह चन्द्र सरीखा महत्व का है, यह अपने बल के अनुसार मानसिक एवं बौद्धिक उन्नति दर्शाता है। जब यह चन्द्र के साथ त्रिकैलाश दृष्टि योग करता है तो उसकी बुद्धि सामर्थ्य अच्छी होती है। यह ग्रह चातुर्य, धार्मिक दशा, शोधक बुद्धि, शास्त्रीय विषय में प्रवेश, वाणी में मिठास आदि का कारक है। बुध अनिष्ट होता है तो सिर दुखना, लड्डखड़ाते या तुलताते बोलना, और कई प्रकार के मानसिक त्रास रोग प्रगट करता है।
यह ग्रह दूसरे ग्रह के साथ युक्त या दृष्ट हो तो जैसा वह ग्रह शुभ हो उसी प्रमाण से फल उत्पन्न करता है। इसका फल विचारते समय यह कौन राशि पर है और इस पर कौन ग्रह की कौती दृष्टि है आदि बातों का पूर्ण विचार करना होता है।
५ गुरु—सब ग्रहों में बड़ा है और इसके ४ चन्द्र (उपग्रह) हैं। उनमें से एक तो लगभग अपनी पृथ्वी के बराबर है। यह अति शुभ दायक ग्रह है। न्याय प्रियता सब अच्छे गुण या अच्छी वार्त और सुख का स्रोतक है। यह शुभ ग्रह है। जिसकी कुंडली में लग्न चन्द्र या बुध इनसे गुरु का शुभ योग होता है तो वह जातक उदार मन, न्यायी, प्रामाणिक, स्वच्छ हृदय का होता है, परन्तु अशुभ दृष्टि योग से साम्प्रतिक अड्चन बड़े लोगों की अप्रसन्नता आदि प्रगट करता है। यह ग्रह रक्तदोष, यकृत का विकार आदि उत्पन्न करता है। गुरु जहां हो उस स्थान की हानि करता है, परन्तु जिस भाव पर उसकी दृष्टि हो यह दृष्टि शुभ समझी जाती है, भाव की बृद्धि करती है।
६ शुक्र—यह दूसरे ग्रहों की अपेक्षा अधिक प्रकाशवान दिखाता है। यह बुध के साथ हो तो काव्य, ललित कला, चित्र कला, वाचन कला आदि में प्रवीण होता है। शुक्र लग्न में हो तो मुह मनमोहन होता है। उत्तम भाषण शैली, मिलनसार स्वभाव सबसे मिलने वाला, कपड़े आदि स्वच्छ रखता है। शुक्र जन्मकुण्डली में निर्बल हो तो, हलकापन, निरुज्ज, भयानक शब्द प्रिय आदि अवगुण करता है। शुक्र में बुध राशि की अपेक्षा तुला राशि में अधिक बलवान होता है और शुभ फल देता है ये पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो अशुभ फल उत्पन्न करता है।
यह मूलाशय का विकार, उपदेश आदि विकार, अपने दुर्व्यसन के कारण या अनौचित्य पर चलने के कारण होने वाले रोग वीर्यपात या उससे होने वाली दुर्बलता आदि विकार उत्पन्न करता है।
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