सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
७ शनि—इसके चहूँ ओर ३ बलय और ८ चन्द्र (उपग्रह) हैं। मानो छोटी सूर्य माला ही हो, इसी कारण इसे सूर्यपुत्र कहते हैं। जन्मसमय शनि बलवान हो तो कुशा-ग्रसति, मार्मिक, कठोर और क्रुण, डरपोक, दृढ़, थोड़ा बोलने वाला, हिंसाव किताव से खर्च करने वाला, उद्योगी और सम्य स्वभाव का होता है। शनि निर्बल हो तो संशय युक्त, दुष्ट, अधम, क्रोधी स्वभाव का होता है। सब ग्रहों में शनि अधिक पाप फल देने वाला है। शनि रवि, चन्द्र या लून के साथ अशुभ दृष्टियोग करता हो तो दन्त विकार, नाना प्रकार के रोग जो अधिक समय तक रहने वाले हों, संधिवात, पक्षाघात, कुछ बहरापन आदि रोग दर्शाता है।
संक्षेप में शनि ये डर, उदासीनता और मृत्यु का खोतक ग्रह माना जाता है। शनि जहाँ पर हो उस स्थान को बृद्धि करता है, परन्तु जिस भाव को देखता है उसकी हानि करता है।
८ हर्षल—(प्रजापति) यह अनेक आकस्मिक विचित्र प्रकार की घटना घटित करने वाला ग्रह है। साधारण प्रकार से ये पाप ग्रह है। इसी प्रकार वह कई प्रकार के चामत्कारिक और कल्पना जिसकी न हो सके ऐसा फल उत्पन्न करता है। जिस कुण्डली में यह बलवान हो तो अच्छे प्रकार के शुभ फल दर्शाता है। निर्बल होने पर संगार के नाना प्रकार के कष्ट और स्त्री-सुख या प्रातु-सुख में न्यूनता लाता है। अगड़ा और विचित्र प्रकार के भ्रमण सम्बन्धी कार्य प्रगत करता है।
जिसकी कुण्डली में लून चंद्र या बुध इस ग्रह से शुभ दृष्टि योग करता हो तो उसकी वृद्धि और मानसिक उन्नति अच्छी प्रकार की प्रगत होती है। उसे विशेष कर आध्यात्मिक, गूढ़, फलित ज्योतिष, सामुद्रिक आदि शास्त्रीय विषय में प्रवेश या इतर विषय में योग्यता बढ़ती है।
९ नेपच्यून—वर्षण—इस ग्रह का धर्म पानी सरीखा अस्थिर है और सर्व साधारण पन से यह ग्रह अधिक अशुभ फल उत्पन्न करता है। बार-बार विचार बदलना, विश्वास करने अयोग्य, अस्थिरता आदि गुण प्रकट करता है। यह ग्रह कुण्डली में जब बलवान हो या इसपर शुभग्रह की दृष्टि हो या बुध, चंद्र, से शुभ दृष्टि योग करता हो, उस समय बुद्धि की तीव्रता बढ़ेगी। अन्तर्दृष्टि में या दैवी दृष्टि में विचार करने की प्रेरणा मन में बढ़ती है, मन आध्यात्मिक मार्ग की ओर झुकता है। यदि वह कुण्डली में घुरे स्थान में या पीड़ित हो तो घुरी वासना, मत्सर, लोभ, आदि की ओर ले जाने वाले विचार उत्पन्न करता है।
इस ग्रह के प्रभाव से दूसरे की नकल शीघ्र करने में निपुण होता है। इससे जल तत्व से लाभ, गायन, तंतु वाद्य, काव्य, गूढ़ शास्त्र में प्रवेश, स्वप्न सृष्टि के विचित्र अनुभव दर्शाता है। यह जल राशि (कर्क या मीन) में बलवान होता है। यह बुध के साथ अशुभ दृष्टि योग करता हो तो मछवा तंतु में लोभ उत्पन्न करता है। चन्द्र के साथ पीड़ित हो तो शागीरक व मानसिक स्वास्थ्य नहीं रहता।