सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहों का प्रभाव : १६३
राहु-केतु
इन दोनों ग्रहों में राहु का ही महत्त्व है, क्योंकि राहु से सदा ६ राशि अंतर पर केतु रहता है। राहु को छोड़कर केतु कहीं नहीं जा सकता। दोनों ग्रह सदा बन्धी रहते हैं और उनकी गति सदा एक-सी रहती है। जब राहु या केतु के बीच चन्द्र काति वृत्त पर आ जाता है उस समय उसका शर शून्य या बहुत थोड़ा रहता है, तभी ग्रहण सम्भव होता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्र आ जाने से जब सूर्य नहीं दिखता तो सूर्य ग्रहण होता है और सूर्य व चंद्र के बीच पृथ्वी आने से चंद्रग्रहण होता है। ये दोनों अपकाश ग्रह राहु-केतु बड़े महत्त्व के हैं, इस कारण इनकी गणना ग्रहों में की जाती है।
राहु का मुख्य धर्म मारना है। यह क्रूर ग्रह तीसरे स्थान में हो तो भाइयों का, चतुर्थ में माता का, पंचम में संतति का, सप्तम में स्त्री का, दशम में पिता का मारक होता है। यह पापग्रह है। दांत आँठों के बाहर या बड़े धनुषाकार दिखे तो राहु का प्रभाव समझना। यह लग्न व ६, ७, १२ स्थान में नाशकर्ता होता है। राहु बलवान हो तो, उन्नत दशा में लाता है।
इनका फल विचार—
राहु केतु जिस भाव में हों और जिस-जिस भावस्वामियों के साथ हों उसीके अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं। इनका कोई विम्ब न होने के कारण दूसरों का प्रभाव ग्रहण कर शुभाशुभ फल देते हैं। ये तमोगुणी हैं। केन्द्र में हों और त्रिकोण से सम्बन्धित हो या त्रिकोण में हो और केन्द्र से सम्बन्धित हों तो शुभकारक होते हैं। राहु केतु जिस स्थान में हों या जिस भावशे के साथ हों उस भाव की वृद्धि करते हैं। परन्तु कोई ग्रह अच्छा भी हो तो भी राहु के साथ रहने से दुःश फल होता है। राहु केतु २ या ११ भाव के स्वामी हों तो जिस ग्रह के साथ रहते हैं वैसा इनका स्वभाव हो जाता है अर्थात् शुभ ग्रह के साथ शुभ और पाप ग्रह के साथ अशुभ हो जाता है।
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अध्याय ३२
भाव-परिचय
पहले बतला चुके हैं कि द्वादश भाव के स्थान स्थिर हैं और वे स्थान लग्न स्थान से गिने जाते हैं। उन भावों के विशेष नाम नीचे कुण्डली में बताये गये हैं।
कुंडली में ग्रहों की स्थिति बदलती रहती है, परन्तु भाव वे ही रहते हैं। भाव में कोई परिवर्तन नहीं होता, परन्तु इन भावों में जो राशियाँ रहती हैं, वे लग्न की स्थिति के अनुसार सदा बदलती रहती हैं।