सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६४ : सच्चिद्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
भाव के नाम
लग्न कुण्डली
जैसे यहाँ लग्नकुण्डली में वृश्चिक लग्न है तो तब स्थान ( लग्न ) में वृश्चिक का अंक ८ रहेगा और इसी क्रम से शेष भावों में राशियों के अंक लिखे रहेंगे जैसा यहाँ लग्नकुंडली में दिया है।
इसको इस प्रकार पढ़ेंगे कि ( तीसरा ) सहज स्थान में केतु मकर का है ( चौथे ) सुहृद स्थान में कुम्भ का मंगल है, ( षष्ठ ) रिपु स्थान में मेष का सूर्य है, ( सप्तम ) जाया स्थान में वृष का बुध और शनि हैं, ( अष्टम ) मृत्यु स्थान में मिथुन का चंद्र गुरु और शुक्र है, ( नवम ) धर्म स्थान में कर्क का राहु है। शेष स्थानों में कोई ग्रह नहीं है।
तन स्थान में वृश्चिक राशि, घन स्थान में धनु राशि, सुत स्थान में मीन राशि दशम भाव या कर्म स्थान में सिंह राशि, आय भाव में कन्या राशि, और व्यय भाव में तुला राशि है। इस प्रकार इन भावों के वर्णन में विशेष नाम का ही उपयोग होता है।
इन १२ भावों के जो प्रचलित नाम हैं इन्हें कंठस्थ कर लेना चाहिये, परन्तु इनके अतिरिक्त और भी नाम हैं जो कभी-कभी उपयोग में आते हैं उनके नाम नीचे दिए हैं।
१ तनु भाव—लग्न, होरा, मूर्ति, उदय, सिर, अंग, वपु, कल्प।
२ घन भाव—कुट्टम्ब, वाक्, पित्त, वित्त, स्व, अर्थ, कोष; अक्षि ( नेत्र )।
३ सहज भाव—सहोत्थ, गल, दुःखचय, प्राता, पराक्रम।
४ सुहृद भाव—मुख, दैवम, पाताल, हृत्, ( हृदय ), वाहन, मातृ, ( माता ) रसातल, बंधु, अम्बु, कर्ण, हिबुक, सौर्य, तुर्य, मान, नोर, सप्त, गृह।
५ सुत भाव—आत्मज, मंत्र, विवेक, शक्ति, उदर प्रवेश, प्रभाव, प्रतिभा, धी, बुद्धि, तनुज, तनय, विद्या, वाक् स्थान।
६ रिपु भाव—रोग, क्षत, अरि, व्यसन, चोर, विघ्न।
७ जाया भाव—चित्तोत्थ, काम, मदन, भर्ता, कलत्र, दधि, सूप, धून, अस्त, स्मर, जाभिन्न या मित्र।