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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

१६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

७ शनि—इसके चहूँ ओर ३ बलय और ८ चन्द्र (उपग्रह) हैं। मानो छोटी सूर्य माला ही हो, इसी कारण इसे सूर्यपुत्र कहते हैं। जन्मसमय शनि बलवान हो तो कुशा-ग्रसति, मार्मिक, कठोर और क्रुण, डरपोक, दृढ़, थोड़ा बोलने वाला, हिंसाव किताव से खर्च करने वाला, उद्योगी और सम्य स्वभाव का होता है। शनि निर्बल हो तो संशय युक्त, दुष्ट, अधम, क्रोधी स्वभाव का होता है। सब ग्रहों में शनि अधिक पाप फल देने वाला है। शनि रवि, चन्द्र या लून के साथ अशुभ दृष्टियोग करता हो तो दन्त विकार, नाना प्रकार के रोग जो अधिक समय तक रहने वाले हों, संधिवात, पक्षाघात, कुछ बहरापन आदि रोग दर्शाता है।

संक्षेप में शनि ये डर, उदासीनता और मृत्यु का खोतक ग्रह माना जाता है। शनि जहाँ पर हो उस स्थान को बृद्धि करता है, परन्तु जिस भाव को देखता है उसकी हानि करता है।

८ हर्षल—(प्रजापति) यह अनेक आकस्मिक विचित्र प्रकार की घटना घटित करने वाला ग्रह है। साधारण प्रकार से ये पाप ग्रह है। इसी प्रकार वह कई प्रकार के चामत्कारिक और कल्पना जिसकी न हो सके ऐसा फल उत्पन्न करता है। जिस कुण्डली में यह बलवान हो तो अच्छे प्रकार के शुभ फल दर्शाता है। निर्बल होने पर संगार के नाना प्रकार के कष्ट और स्त्री-सुख या प्रातु-सुख में न्यूनता लाता है। अगड़ा और विचित्र प्रकार के भ्रमण सम्बन्धी कार्य प्रगत करता है।

जिसकी कुण्डली में लून चंद्र या बुध इस ग्रह से शुभ दृष्टि योग करता हो तो उसकी वृद्धि और मानसिक उन्नति अच्छी प्रकार की प्रगत होती है। उसे विशेष कर आध्यात्मिक, गूढ़, फलित ज्योतिष, सामुद्रिक आदि शास्त्रीय विषय में प्रवेश या इतर विषय में योग्यता बढ़ती है।

९ नेपच्यून—वर्षण—इस ग्रह का धर्म पानी सरीखा अस्थिर है और सर्व साधारण पन से यह ग्रह अधिक अशुभ फल उत्पन्न करता है। बार-बार विचार बदलना, विश्वास करने अयोग्य, अस्थिरता आदि गुण प्रकट करता है। यह ग्रह कुण्डली में जब बलवान हो या इसपर शुभग्रह की दृष्टि हो या बुध, चंद्र, से शुभ दृष्टि योग करता हो, उस समय बुद्धि की तीव्रता बढ़ेगी। अन्तर्दृष्टि में या दैवी दृष्टि में विचार करने की प्रेरणा मन में बढ़ती है, मन आध्यात्मिक मार्ग की ओर झुकता है। यदि वह कुण्डली में घुरे स्थान में या पीड़ित हो तो घुरी वासना, मत्सर, लोभ, आदि की ओर ले जाने वाले विचार उत्पन्न करता है।

इस ग्रह के प्रभाव से दूसरे की नकल शीघ्र करने में निपुण होता है। इससे जल तत्व से लाभ, गायन, तंतु वाद्य, काव्य, गूढ़ शास्त्र में प्रवेश, स्वप्न सृष्टि के विचित्र अनुभव दर्शाता है। यह जल राशि (कर्क या मीन) में बलवान होता है। यह बुध के साथ अशुभ दृष्टि योग करता हो तो मछवा तंतु में लोभ उत्पन्न करता है। चन्द्र के साथ पीड़ित हो तो शागीरक व मानसिक स्वास्थ्य नहीं रहता।

ग्रहों का प्रभाव : १६३

राहु-केतु

इन दोनों ग्रहों में राहु का ही महत्त्व है, क्योंकि राहु से सदा ६ राशि अंतर पर केतु रहता है। राहु को छोड़कर केतु कहीं नहीं जा सकता। दोनों ग्रह सदा बन्धी रहते हैं और उनकी गति सदा एक-सी रहती है। जब राहु या केतु के बीच चन्द्र काति वृत्त पर आ जाता है उस समय उसका शर शून्य या बहुत थोड़ा रहता है, तभी ग्रहण सम्भव होता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्र आ जाने से जब सूर्य नहीं दिखता तो सूर्य ग्रहण होता है और सूर्य व चंद्र के बीच पृथ्वी आने से चंद्रग्रहण होता है। ये दोनों अपकाश ग्रह राहु-केतु बड़े महत्त्व के हैं, इस कारण इनकी गणना ग्रहों में की जाती है।

राहु का मुख्य धर्म मारना है। यह क्रूर ग्रह तीसरे स्थान में हो तो भाइयों का, चतुर्थ में माता का, पंचम में संतति का, सप्तम में स्त्री का, दशम में पिता का मारक होता है। यह पापग्रह है। दांत आँठों के बाहर या बड़े धनुषाकार दिखे तो राहु का प्रभाव समझना। यह लग्न व ६, ७, १२ स्थान में नाशकर्ता होता है। राहु बलवान हो तो, उन्नत दशा में लाता है।

इनका फल विचार—

राहु केतु जिस भाव में हों और जिस-जिस भावस्वामियों के साथ हों उसीके अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं। इनका कोई विम्ब न होने के कारण दूसरों का प्रभाव ग्रहण कर शुभाशुभ फल देते हैं। ये तमोगुणी हैं। केन्द्र में हों और त्रिकोण से सम्बन्धित हो या त्रिकोण में हो और केन्द्र से सम्बन्धित हों तो शुभकारक होते हैं। राहु केतु जिस स्थान में हों या जिस भावशे के साथ हों उस भाव की वृद्धि करते हैं। परन्तु कोई ग्रह अच्छा भी हो तो भी राहु के साथ रहने से दुःश फल होता है। राहु केतु २ या ११ भाव के स्वामी हों तो जिस ग्रह के साथ रहते हैं वैसा इनका स्वभाव हो जाता है अर्थात् शुभ ग्रह के साथ शुभ और पाप ग्रह के साथ अशुभ हो जाता है।

अध्याय ३२

भाव-परिचय

पहले बतला चुके हैं कि द्वादश भाव के स्थान स्थिर हैं और वे स्थान लग्न स्थान से गिने जाते हैं। उन भावों के विशेष नाम नीचे कुण्डली में बताये गये हैं।

कुंडली में ग्रहों की स्थिति बदलती रहती है, परन्तु भाव वे ही रहते हैं। भाव में कोई परिवर्तन नहीं होता, परन्तु इन भावों में जो राशियाँ रहती हैं, वे लग्न की स्थिति के अनुसार सदा बदलती रहती हैं।

१६४ : सच्चिद्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

भाव के नाम

लग्न कुण्डली

जैसे यहाँ लग्नकुण्डली में वृश्चिक लग्न है तो तब स्थान ( लग्न ) में वृश्चिक का अंक ८ रहेगा और इसी क्रम से शेष भावों में राशियों के अंक लिखे रहेंगे जैसा यहाँ लग्नकुंडली में दिया है।

इसको इस प्रकार पढ़ेंगे कि ( तीसरा ) सहज स्थान में केतु मकर का है ( चौथे ) सुहृद स्थान में कुम्भ का मंगल है, ( षष्ठ ) रिपु स्थान में मेष का सूर्य है, ( सप्तम ) जाया स्थान में वृष का बुध और शनि हैं, ( अष्टम ) मृत्यु स्थान में मिथुन का चंद्र गुरु और शुक्र है, ( नवम ) धर्म स्थान में कर्क का राहु है। शेष स्थानों में कोई ग्रह नहीं है।

तन स्थान में वृश्चिक राशि, घन स्थान में धनु राशि, सुत स्थान में मीन राशि दशम भाव या कर्म स्थान में सिंह राशि, आय भाव में कन्या राशि, और व्यय भाव में तुला राशि है। इस प्रकार इन भावों के वर्णन में विशेष नाम का ही उपयोग होता है।

इन १२ भावों के जो प्रचलित नाम हैं इन्हें कंठस्थ कर लेना चाहिये, परन्तु इनके अतिरिक्त और भी नाम हैं जो कभी-कभी उपयोग में आते हैं उनके नाम नीचे दिए हैं।

१ तनु भाव—लग्न, होरा, मूर्ति, उदय, सिर, अंग, वपु, कल्प।

२ घन भाव—कुट्टम्ब, वाक्, पित्त, वित्त, स्व, अर्थ, कोष; अक्षि ( नेत्र )।

३ सहज भाव—सहोत्थ, गल, दुःखचय, प्राता, पराक्रम।

४ सुहृद भाव—मुख, दैवम, पाताल, हृत्, ( हृदय ), वाहन, मातृ, ( माता ) रसातल, बंधु, अम्बु, कर्ण, हिबुक, सौर्य, तुर्य, मान, नोर, सप्त, गृह।

५ सुत भाव—आत्मज, मंत्र, विवेक, शक्ति, उदर प्रवेश, प्रभाव, प्रतिभा, धी, बुद्धि, तनुज, तनय, विद्या, वाक् स्थान।

६ रिपु भाव—रोग, क्षत, अरि, व्यसन, चोर, विघ्न।

७ जाया भाव—चित्तोत्थ, काम, मदन, भर्ता, कलत्र, दधि, सूप, धून, अस्त, स्मर, जाभिन्न या मित्र।

भाव परिचय : १६५

न मूल्य भाव—भरण, रंध्र, आयु, अंतक, गुण, सूत्रकृच्छ्र, गुहा, क्षीर, छिद्र, ग्राम्य, निघन, लय; स्थान ।

९ धर्म भाव—पैतृक, भाग्य, गुरु, तप; लाभ, शुभ, दया, मार्ग, अर्जित ।

१० कर्म भाव—आज्ञा, मान, खं, आस्पद, दशम, व्योम, ताल, मेघूरण ।

११ आय भाव—लाभ, प्राप्ति, आगम, भव, सर्वतो भद्र ।

१२ व्यय भाव—रिफ्त, अंत्य, विनाश, लन का अन्त्य खण्ड, प्रांत्य, अंतिम, रिःफ । भाव संज्ञा—

उपर्युक्त भावों के नाम क्रमशः बताये हैं परन्तु विशेष परिस्थिति के अनुसार इनके विशेष नाम भी हैं जिनको जानना आवश्यक है । नीचे बताया है कि किस-किस भाव की क्या विशेष संज्ञा है । यहाँ भाव के नाम न लिखकर उनके क्रम सूचक अंक दिए हैं ।

भाव

लनकुण्डली

  • (१) केन्द्र, कंटक या चतुष्टय १,४,७,१०
  • (२) पणफर २,५,८,११
  • (३) आपोदिलम ३,६,९,१२,
  • (४) उपचय ३,६,१०,११,
  • (५) अपचय ( जो उपचय नहीं ) १,२,४ ५,७,८,९,१२
  • (६) चतुरस्र ४,८ ।
  • (७) त्रिक ६,८,१२
  • (८) त्रिकोण ५,९
  • (९) त्रिविकोण ९

इन सबको उदाहरण देकर समझाते हैं ।

१ केन्द्र (१) लन में वृश्चिक (४) चतुर्थ भाव में कुंभ राशि का सं० (७) सप्तम भाव में वृष का वृ० श० (१०) दशम में सिंह राशि है, ये सब राशियां और ग्रह (८,११,२,५, राशियां और सं० वृ० श० ग्रह) केन्द्र में हैं ।

२ पणफर—(२) में धन राशि, (५) में मीन, (८) में मिथुन, (११) भाव में

कन्या राशि है । इन स्थानों की राशियां पणफर में हैं । अष्टम में चन्द्र गुरु शुक्र हैं । ये ग्रह भी पणफर में हैं ।

लनकुण्डली

१६६ . सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

३ आपोक्लिम--(३) में मकर का केतु, (६) में मेष का सुर्य, (९) में ककं का राहु और (१२) में तुला राशि ये सब आपोक्लिम में हैं।

केन्द्र अर्थात्‌ वीच के स्थान से दुसरा पणफर और तीसरा आपोक्लिम का घर होता है, जैसा यहाँ समझा चुके हैं ।

४ उपचय, ५ अपचय--यहां कुंडली

में जहां उ० लिखा है वह उपचय स्थान है

शेष जहां + है वे अपचय स्थान हैं। यहां लग्न कुण्डली में उपचय में (३) में मकर

का केतु, (६) में मेष का सूयं, (१०) में

सिह और (११) में कन्या राशि है । शेष

बचे हुए स्थान अपचय कहलाये ।

६ चतुरस्न-- किसी भी स्थान से चौथा और आठवां चतुरस्र कहलाता है, जैसे मंगल से शनि और बुध चतुर्थ में और कन्या राशि (११ भाव) अष्टम में हैं ये मंगल से चतुरल् में हुए । इसी प्रकार किसी भी स्थान से चौथा आठवां स्थान गिनने से जो आवे वह चतुरस्र कहलाता है ।

७ त्रिक--किसी भी स्थान से ६-८ और १२ वें स्थान त्रिक स्थान कहलाते हैं, जैसे मंगर से छठा ककं का राहु नवम भाव में है। मंगल से आठवां लाभ भाव में कन्या राशि है । मंगल से बारहवें मकर का केतु तृतीय भाव में है । ये सब मंगल के त्रिक स्थान में हुए ।

८ विकोण--किसी भी स्थान से नवम स्थान और वहां से पंचम स्थान त्रिकोण कहलाता है । एक दूसरे से नवम पंचम राशियाँ इस प्रकार होंगी । १, ५, ९। ३, ७, ११ । ४, ८, १२ । ये राशियां एक दूसरे से त्रिकोण में हैं । जैसे मंगछ से पंचम में चन्द्र गुरु शुक्र है और चंद्र से नवम स्थान में कुंभ का मंगळ - है तो १ वह स्थान जहाँ ग्रह हैं वहां से १ गिना, वहां से(५) पांचवें स्थान में मिथुन का चन्द्र है और वहाँ से (९) नवम स्थान में मंगल है, इस प्रकार ये स्थान एक दूसरे से त्रिकोण में हुए, क्योंकि यहाँ इनसे त्रिकोण बनता है । इसी प्रकार किसी भी स्थान से 1०१०९ स्थान गिनो तो वे दोनों स्थान त्रिकोण में पड़ते हैं । १ स्थान तो केवल उस स्थान को गिनने के लिये था, यहां बचे हुए २ ही स्थान त्रिकोण के होते हैं जैसा कुंभ का मंगल और मिथुन को चन्द्र एक दुसरे से त्रिकोण में हूँ । ९ त्रित्रिकोण--किती स्थान से नवम स्थान नित्रिकोण कहलाता है, जैसे चन्द्र से मंगल नवम स्थान में है तो कहेंगे कि चन्द्र से त्रित्रिकोण में मंगल है ।

भाव परिचय : १६७

इसी प्रकार लगन से या किसी भाव विशेष से दूसरे भाव या ग्रह कितने स्थानान्तर पर हैं विचार कर भाव संज्ञा ऊपर बताए अनुसार निश्चित करना ।

भाव स्वामी Lord of the house

जिस भाव में जो राशि है उस राशि का जो स्वामी होगा वही ग्रह भावस्वामी कहलाता है । भाव स्वामी को भावेश्वर, भुवन पति, भावेश या भाव अधिपति भी कहते हैं ।

भाव स्वामी का भाव सम्बन्ध से भी पृथक्-पृथक् नाम होता है, जैसे:—लगन का स्वामी-लगनेश, द्वितीय भाव का स्वामी-द्वितीयेश या धनेश, ११वाँ लाभ स्थान है उसका स्वामी लाभेश इत्यादि ।

भाव स्वामी के विशेष योग Special aspects of the Lords of the houses ( अध्याय २८ का दृष्टि योग भी देखो )

१ भावेश योग—जब दो या अधिक भावेश ( भाव स्वामी ) का योग होता है तो भावेश योग कहते हैं ।

जब कोई त्रिकोण ( त्रिक ६-८-१२ भाव के स्वामी ) जब-जब दूसरे भावों से योग करते हैं तो अनिष्ट फल देते हैं ।

केन्द्रेश ( केन्द्र भाव का स्वामी ) व त्रिकोणेश ( त्रिकोण भाव का स्वामी ) का योग शुभ फल देता है । ये स्थान के अनुसार फल देते हैं । ( त्रिक ) ६, ८, १२ भाव में भावेश निर्बल होता है ।

२ भावेश दृष्टि योग—जब दो या अधिक भावेश एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि सं देखते हैं तो भावेश पर दृष्टि योग करते हैं । त्रिक भाव का स्वामी, जिस भावेश पर दृष्टि करता है उस भावेश के फल को निर्बल कर देता है ।

३ त्रिकोण योग—जब दो भावेश एक दूसरे के त्रिकोण ( नवम पंचम स्थान ) में हों तो उसे त्रिकोण योग कहते हैं । ये योग लक्ष्मी, राज वैभव, विभूति, कीर्ति देने वाला होता है । केन्द्रेश और त्रिकोणेश का त्रिकोण योग श्रेष्ठ होता है ।

४ केन्द्र योग—दो भावेश परस्पर केन्द्र में हों तो केन्द्र योग होता है। यह योग महत्व सूचक है । एक ग्रह के केन्द्र स्थान से दूसरा ग्रह भी केन्द्र में हो तब यह योग होता है ।

५ लाभ योग—दो भावेश एक दूसरे पर तृतीय एकादश योग करते हों तो उसे लाभ योग कहते हैं । यह बहुत सम्पत्ति देने वाला होता है । एक ग्रह जहाँ हो उससे दूसरा ग्रह ग्यारहवें स्थान में हो तो दूसरे ग्रह से पहिला ग्रह तीसरे स्थान में पड़ता है । इस प्रकार जब एक ग्रह से गिनने पर दूसरा ग्रह ग्यारहवें स्थान में हो तब यह योग होता है ।

६ द्विद्विधा योग—जब दो भावेश एक दूसरे से दूसरे या बारहवें स्थान में हों तो यह योग होता है । यह योग दरिद्रता सूचक है ।

७ षड्पत्क योग—दो भावेश एक दूसरे से छठे या आठवें स्थान में हो तो यह योग होता है । यह दुःख और कष्ट देता है ।

१६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

८ अन्योन्य आश्रय योग—दो भाव के स्वामी जब एक दूसरे के भाव में हों तब यह योग होता है, जैसे लगनेश लाभ स्थान में हो और लाभेश लग्न में हो तो यहाँ लगनेश और लाभेश का अन्योन्य आश्रय योग हुआ। इसे परिवर्तन योग भी कहते हैं।

९ युति—जब दो भावेश एक ही राशि के एकही अंश पर हों तो उसे युति कहते हैं।

१० षड्भांतर या प्रति योग—जब एक भावेश एक दूसरे से ६ राशि के अंतर पर हो अर्थात् एक दूसरे के सम्मुख हो तब यह योग होता है।

इन योगों का वर्णन दृष्टि विचार में भी हो चुका है, परन्तु भाव से सम्बन्ध होने के कारण यहाँ दिया है। यहाँ केवल मुख्य-मुख्य योग ही दिये हैं, क्योंकि योग अनेक हैं।

योग—ग्रहों का ऐसी परिस्थिति में आ जाना जिससे वह दूसरे ग्रह, भाव या राशि से किसी प्रकार सम्बन्धित होकर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर देवे जिससे कोई विशेष फल उत्पन्न होने की सम्भावना हो। ऐसे अनेक योगों का वर्णन फलित ज्योतिष में दिया है।

यहाँ इन्ही योगों को उदाहरण देकर समझाते हैं :—

इस कुण्डली में षष्ठ भाव का स्वामी मंगल और अष्टमेस बुध है, ये त्रिक भाव के स्वामी हैं। मंगल सहज भाव में है और मंगल से दूसरा स्थान चतुर्थ भाव है जिसमें बुध है। यहाँ मंगल और बुध का (६) द्विर्दिक्ष्य योग हुआ। क्योंकि मंगल से बुध दूसरा और बुध से मंगल बारहवाँ है। यह योग द्रविष्टा सूचक है। इस पर भी त्रिक भाव के स्वामियों का इस प्रकार योग होना अनिष्ट कारक है।

यहाँ चन्द्र सप्तम भाव में है, मंगल से यह गिनने पर पंचम स्थान होता है, इस कारण मंगल से नवम पंचम (३) त्रिकोण योग हुआ। यह योग अच्छा है, परन्तु यह त्रिकोण के स्वामियों का योग नहीं हुआ।

शनि लाभ स्थान में है वह चतुर्थ्या (केन्द्र का स्वामी) है, इससे पंचम स्थान में शुक्र तृतीय भाव में है तो शनि और शुक्र का नवम पंचम होने से (३) त्रिकोण योग हुआ। यहाँ शुक्र सप्तमेस (केन्द्र स्वामी) है, इस कारण यहाँ केन्द्र के अधिपतियों का (शनि और शुक्र का) त्रिकोण योग हुआ। यह योग अच्छा है।

लाभ भाव का स्वामी बुध (चतुर्थ) केन्द्र में है। धर्म का भाव स्वामी चंद्र भी केन्द्र (सप्तम) में है। यहाँ दोनों भावेश केन्द्र में हैं और एक दूसरे के केन्द्र में भी हैं तो यह (४) केन्द्र योग हुआ। यह अच्छा योग है।

भाव परिचय : १६९

जब कोई ग्रह एक दूसरे से चतुर्थ या सप्तम में हो तो एक दूसरे से केन्द्र में होते हैं, क्योंकि जो एक के चतुर्थ है वह दूसरे से दशम में पड़ता है और जो एक दूसरे से सप्तम में है वह दूसरे से भी सप्तम होता है। लग्नकुण्डली में १, ४, ७, १० स्थान में रहने वाले ग्रह केन्द्र में कहलाते हैं, परन्तु एक ग्रह से दूसरे ग्रह के स्थान का अन्तर भी ४, ७, १० स्थान की दूरी पर होने से पहिले ग्रह के केन्द्र में दूसरा ग्रह है ऐसा कहेंगे।

यहाँ शनि जो तृतीयेश और चतुर्थेश होकर लाभ स्थान में है, इससे तीसरे स्थान में लगनी (लग्न का १) गुड बैठता है जो धनेश और पंचमेश है। इन दोनों ग्रहों का (५) तृतीय एकादश योग है, क्योंकि शनि से गुड तीसरा और गुडसे शनि ग्यारहवाँ है। यह सम्पत्तिदाता योग हुआ।

षष्ठेश मंगल तृतीय भाव में है। मंगल से षष्ठ स्थान में सूर्य अष्टम भाव में बैठता है यह सूर्य दशमेश है। यहाँ षष्ठ और दशम भाव स्वामी और मंगल और सूर्य का (७) षड्पटक योग हुआ जो कष्टदायक है।

गुरु लग्न में वृश्चिक के १०° पर है और चन्द्र सप्तम भाव में वृष के १०° पर है तो गुरु और चन्द्र का (१०) षड्मान्तर योग या प्रतियोग हुआ।

मंगल भकर के २२° पर है और शुक्र भी भकर के २५° पर है तो मंगल और शुक्र की (९) युति हुई। यदि शुक्र भी भकर के २२° पर होता तो पूर्ण युति होती। परन्तु दोनों के अंशों में केवल ३° का अन्तर है अर्थात् दीप्तांश के भीतर है तो यह भी युति कहलायगी।

इस कुण्डली में लाभ भाव में बुध के स्थान में शनि बैठता है और चतुर्थ में शनि के स्थान में (कुंभ राशि में) बुध बैठता है यह (८) अत्योन्म आश्रय योग हुआ। इसे परिवर्तन योग भी कहते हैं। इसी प्रकार और भी ग्रहों का योग विचारना।

अध्याय ३३

भाव विचार

जब कोई ग्रह किसी भाव में जाता है तो उस भाव के सम्बन्ध से ग्रह के फल का विचार होता है, इस कारण इन भावों से क्या-क्या विचार किया जाता है यहाँ बतलाते हैं।

१ प्रथम भाव—इसे लग्न, सूर्य, उदय या पूर्व भी कहते हैं। इस स्थान का नाम सनु है। इस स्थान से स्वभाव, प्रकृति, मन, स्वरूप, आगुण्य और इतर शारीरिक

१७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

दुःख सुख का विचार होता है। शरीर की दुर्बलता, पुष्टता, शरीर का रंग, शील, आकृति, शरीर के लहसन, मत्ता, तिल आदि चिह्न, आरोग्य, शरीर लक्षण आदि का विचार होता है। इसका मुख्य प्रभाव मस्तक पर है।

२ द्वितीय भाव—इसे घन स्थान कहते हैं। इससे जातक ( जिसका जन्म हुआ है और जिसके सम्बन्ध में विचारना है ) की सम्पत्तिक स्थिति का बोध होता है। इस भाव से कोष ( खजाना ), सोना, रत्न आदि की प्राप्ति, मित्र, वस्त्र, कुटुम्ब व स्त्री पुत्र का सुख और पूर्व अर्जित घन, अब्ध कार्य, विहृत्ता, लेखन, पट्टुच, वाणी, नेत्र और खाद्य पदार्थ आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव कण्ठ, नेत्र और मुख पर होता है।

३ तृतीय स्थान—इसे सहज ( साथ में उत्पन्न हुए ) स्थान या प्रातःस्थान व पराक्रम-स्थान भी कहते हैं। इससे आई बहिन, भाइयों का सुख, पास के सम्बन्धियों का सुख या थोड़ी यात्रा रेल, बैल गाड़ी आदि की, पराक्रम ( साहस ), सेवक, चाचा, मामा, दासी, हाथ कान सम्बन्धी रोग, कान के गहने आदि का विचार होता है। इसका मुख्य प्रभाव हाथ, बाहू, कन्धा और कान पर होता है।

४ चतुर्थ स्थान—इसे सुदृढ़, पाताल और सुख स्थान भी कहते हैं। इस भाव से सुख-दुःख का, माता का, स्थावर सम्पत्ति का, आयुष्य के दिन का, क्षेत्र, गृह ( घर ) भूमि, वगीचा, तालाब, चौपाया, मित्र, सुख, वन्धु, उद्यम, ससुर, नानी और छाती का विचार होता है। इसका प्रभाव छाती और पेट पर होता है।

५ पंचम स्थान—इसे सुत भाव कहते हैं। इससे संतति, गर्भ, विद्या, शील-स्वभाव, मन्त्र, उपासना, सट्टा, लाटरी या इसी प्रकार के व्यवहार में यश, अपयश, आनन्द और बुद्धि का विचार होता है। इसका प्रभाव हृदय और पीठ व कुक्षि पर होता है।

६ षष्ठ भाव—इसको रिपु स्थान भी कहते हैं। इससे शत्रु, मामा, मौसी, होने वाला रोग, सेवक, अपने अधीन कार्य करने वाले, ऊंट, घोड़े, भैंस आदि पशु चोर भय, संग्राम, क्रूर कर्म, वधन भय, सौतेली माँ, अपयश, हात्ति, रोग, चिन्ता और शङ्का आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव कमर, अंत, नाभि और पेट पर होता है।

७ सप्तम भाव—इसे अस्त या कलत्र या जाया-स्थान कहते हैं। इससे स्त्री, स्त्री-सुख, विवाह, व्यापार, गमन, अश्लीली झगड़े, साक्षीदार, प्रगट शत्रु या प्रतिद्वन्दी, संग्राम, विवाद, वाणिज्य, प्रवास या स्थानान्तर, जारकर्म, कलह आदि का विचार होता है। स्त्री का पति या पतिसुख का भी विचार इसी से होता है। इसका प्रभाव वस्ति, मूषपिंड और कमर पर भी होता है।

भाव विचार : १७१

८ अष्टम भाव—इसे मृत्यु या आयु स्थान भी कहते हैं। इससे मृत्यु का निदान, आयु, संकट, शस्त्र, अकल्पित लाभ, स्त्री की ओर से धन प्राप्ति, नदी तीरता, अत्यन्त विषम मार्ग, गुदा रोग, गुह्य रोग, रिपु, दुर्गस्थान, श्रृण, रण, लावारसी धन, व्याधि का उत्पन्न होना, छिद्र मार्ग, टेढ़ी बात, युद्ध समय, शत्रु का भय, वस्तु का नाश आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव गुह्योद्दिप्य किंवा प्रजोत्पादक इन्द्रिय पर होता है।

९ नवम स्थान—इसे धर्मस्थान कहते हैं। इससे धर्म, यद्धा, तप, तीर्थयात्रा, लौकिक, भ्राण्योदय, दूर की यात्रा, जल प्रवास, स्वप्न, तत्त्वज्ञान, बुद्धिमत्ता, प्रथ, कर्त्तव्य, दीक्षा, मठ, देवप्रह, कुश-तालाव आदि का विचार, भाग्य की वृद्धि, निर्मल स्वभाव नम्रता आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव जंघ पर पड़ता है।

१० दशम भाव—इसे कर्मस्थान या राज्यस्थान भी कहते हैं। इससे पितृ सुख, ओहदा, कीर्ति, कर्म, कार्य से होने वाला अच्छा या बुरा काम, यज्ञ, उद्योग-धन्दा, व्यापार, मुद्रा, राजा से आदर, बड़ी पदवी की प्राप्ति का विचार, नौकरी, पेशा, अधिकार, राज्य, वृष्टि आदिक आकाशीय वृत्तांत आदिका, प्रवास ( परदेशगमन ) और श्रृण आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव घुटने पर होता है।

११ एकादश भाव—इसे आय या लाभस्थान भी कहते हैं। अनेक प्रकार का लाभ, आशा, इच्छा, द्रव्य लाभ, आभूषण, हाथी, घोड़े, पालकी आदि ऐश्वर्य, मित्र सुख, धान्य, विद्या लाभ, परिवार, दामाद, मित्र कैसे मिलेंगे आदि का विचार होता है। इसका प्रभाव पैर व पिंडली पर होता है।

१२ द्वादश भाव—इसे व्यय स्थान कहते हैं। इससे मोक्ष, गुप्त विद्या, आध्यात्मिक विद्या, कैंद, दण्ड, शत्रु, खर्च का विचार, हानि, दान, व्यय, पाखण्ड, आत्महत्या, राजकीय संकट, कर्ज, ठगबाजी और घेरना या पकड़ना आदि का विचार इससे होता है। इसका प्रभाव पाँच का पंजा, जंगली और तलुवा पर होता है।

इस भावकुंडली से अपने सम्बन्धियों का भी विचार होता है। उसे नीचे के पैरों में चक्र में दिये अंक के अनुसार मिलावें जैसे—

१—तन, आजी, नाना। २—धन-समधि। ३—सहज, भाई, बहन, नौकर-चाकर। ४—सुहृद, मित्र, माता, ससुर। ५—पुत्र, सन्तान। ६—रिपु, काकी, मौसी, मामा, फूका। ७—जया, स्त्री, आजी, भाई-बहन की सन्तान, नानी। ८—मृत्यु, समधी। ९—धर्म, भावज, बहनोई, नाती, चाले, साली। १०—कर्म, स्वाधी, पिता, सास, राजा। ११—आय, लड़के की बहू, दामाद। १२—व्यय, काका, मामी, फूकी।

१७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस लगनकुंडली पर से उसके सम्पूर्ण सम्बन्धियों का इस प्रकार विचार हो सकता है कि जिसका विचार करना है उस भाव को लगन मानकर उसी से तन धन, सहज आदि भाव क्रमानुसार गिन कर उसी से उसके सम्बन्ध का सम्पूर्ण फल निकाला जा सकता है।

जैसे स्त्री के सम्बन्ध में विचार करना है तो स्त्रीभाव ( सप्तम भाव ) को लगन मान कर उससे तन-धन सहज आदि भाव गिन कर विचारना पड़ेगा। जैसे सप्तम को लगन माना तो उससे स्त्री के शरीर आदि का विचार होगा, उससे दूसरा घर (अष्टम भाव) से स्त्री का धन, तीसरे घर ( नवम भाव ) से, उसके भाई-बहन, चतुर्थ घर ( दशम भाव ) से, उसका सुख, माता आदि का विचार होगा। इसी प्रकार सप्तम को लगन मान कर उससे पूरे १२ भाव का विचार कर, स्त्री के सम्बन्ध का फल विचार हो सकता है।

अब साठे साली का विचार करना है तो स्त्री भाव सप्तम को लगन मान कर उसके भाई बहिन जानने को सप्तम से तीसरा गिनने पर नवम भाव आया। इससे स्त्री के भाई-बहन ( साठे-साली ) का फल जान सकते हैं। इसी प्रकार साठ ( स्त्री की माँ ) का विचारना है तो चौथा घर माता का होने से, सप्तम से चौथा गिना तो दशम भाव आया, यह स्त्री की माँ ( साठ ) का घर हुआ। उससे सप्तम घर साठ के पति अर्थात् ससुर का होता है। तो दशम से चौथा घर, चौथा भाव यह ससुर का घर हुआ।

पुत्र-पुत्री का घर पाँचवाँ है। उससे सातवाँ स्त्री का और पति का घर होता है तो पंचम भाव से सातवाँ, एकादश भाव, पुत्र की स्त्री ( वह ) या लड़की का पति ( दामाद ) का हुआ। वहू की माँ ( समधिन ) जानने को एकादश भाव से चौथा घर ( धन भाव ) वहू की माँ ( ससधिन ) का घर हुआ। उससे सातवाँ ( अष्टम भाव ) उसके पति अर्थात् समधौ का घर हुआ।

तीसरा भाव भाई बहिन का है, उससे सातवाँ नवम भाव हुआ। यह भाई की स्त्री या बहिन का पति ( बहूनेई ) का घर हुआ। भाई बहिन की सन्तान जानना है तो पंचम भाव सन्तान का होने से तीसरे से पाँचवाँ घर गिना तो सप्तम भाव आया। यह भाई बहिन की सन्तान ( भतीजे ) ( भतीजी ) का घर हुआ।

पिता के भाई बहिन के बारे में जानने को पिता के दशम घर से सहज तीसरा गिना तो व्यय भाव आया। यह काका या फुआ का घर हुआ। इससे सप्तम में छठा

भाव विचार : १७३

भाव है, वह काकी या फूफा का घर हुआ। पिता की माँ (आजी) का स्थान जानने को पिता के दशम स्थान से, चौथा स्थान लग गया, यह आजी का घर हुआ। इससे सप्तम घर सप्तम स्थान हुआ, इससे आजा का विचार होगा।

माता के स्थान चतुर्थ से चौथा घर सप्तम स्थान हुआ। यह माता की माँ अर्थात् नानी का घर हुआ, इससे सप्तम घर लग गया, यह नाना का घर हुआ।

इसी प्रकार एक ही कुंडली पर से सम्पूर्ण सम्बन्धियों के फल का विचार हो सकता है।

अध्याय ३४

ध्रुव घड़ी

जहाँ घड़ी नहीं है या घड़ी विगड़ जाने के कारण समय नहीं मालूम हो सकता, वहाँ ध्रुव घड़ी अवश्य बना लेनी चाहिए। ध्रुव घड़ी का समय सच्चा स्थानिक समय Local Time है। ध्रुव रहते रहते दिन भर का समय ठीक-ठीक जाना जा सकता है। यह व्योतिषियों के बड़े काम की चीज है, क्योंकि ध्रुव घड़ी के समय के अनुसार जो लग्न निकाली जायगी वह शुद्ध लग्न निकलेगी। इस कारण ध्रुव घड़ी का बनाना जानना चाहिए। इसके बनाने की युक्ति नीचे दी है। एक सीधा बांस लो उसे सीधा करके ( जहाँ समभूमि और खुला हुआ स्थान हो ) गाड़ दो। कई दिन तक लगातार इसकी छाया न बने दिन को देखो तो प्रतीत होगा कि इसकी छाया सदा एक ही स्थान पर नहीं रहती और थोड़ी बहुत उसकी दिशा में अन्तर पड़ जाता है। यदि उत्तर ध्रुव पर सीधा बांस गाड़ा जावे तो उसकी छाया सदा एक ही समय में एक ही स्थान पर रहेगी। कारण यह है कि उत्तरी ध्रुव पर जो बांस गाड़ा गया वह पृथ्वी की अक्षरेखा के समानान्तर होता है और धरातल जिस पर छाया पड़ती है वह अक्षरेखा से समकोण होता है। यदि किसी दूसरे स्थान पर इस प्रकार बांस गाड़ा जावे तो वह अक्षरेखा के समानान्तर नहीं होता। वह धरातल जिस पर बांस की छाया पड़ती है बांस से समकोण बनाती है, इस कारण सीधे गाड़े हुए बांस की छाया एक ही समय पर एक ही स्थान पर नहीं पड़ती।

यदि बांस समकोण पर न गाड़ कर भूमि में ध्रुव की सीध में गाड़ा जाय तो छाया में परिवर्तन नहीं होगा। ध्रुव का कोण जिसकी सीध में बांस गाड़ा गया है उस स्थान का अक्षांश सूचक है अर्थात् उस स्थान के अक्षांश के कोण के अनुसार

१७४ : सचित्र ज्योतिष शिखा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

यदि उस बांस का झुकाव ध्रुव की ओर हो तो वह बांस ध्रुव की सीध में हो जायगा और आस पास जहाँ बांस की छाया पड़ती है, समय सूचक चिन्ह बना देने से पशु घड़ी का काम देगा। इसी सिद्धान्त पर घूघ घड़ी बनी है।

घूघ घड़ी बनाने के लिए गोल पुट्टे का टुकड़ा लो उसमें समान २४ भाग बना कर घंटे का निशान लगा दो जिससे २४ निशान २४ घंटा बन जायेंगे। फिर एक सलाई उस पुट्टे के ठीक बीचों बीच इस प्रकार छेद कर लगा दो कि वह पुट्टे के समकोण में रहे। फिर उस सलाई की एक नोक ध्रुव की ओर करके उसे जमीन में इस प्रकार गाड़ दो या जमा दो कि सलाई भूमि में उस स्थान के अक्षांश के बराबर कोण बनाये। उस सलाई की छाया समय सूचक अंकों पर पड़ने से वहाँ का ठीक समय ज्ञात होगा। जैसे चित्रसंख्या ८३ में बताया है, समय सूचक अंकों पर सलाई की जहाँ छाया पड़ेगी उसी के अनुसार स्थानिक समय होगा।

चित्रसंख्या ८३ देखो यहाँ गोल पुट्टे में बाहर की ओर समय सूचक घंटों के चिन्ह बने हैं। आगे आवश्यक न होने से और भी घंटों के अंक नहीं लिखे गये हैं। मध्यान्द्र के १२ बजे का चिन्ह सबसे नीचे रहता है। यह घूघघड़ी २८° के अक्षांश के स्थान पर समय बतायेगी।

भीतर की ओर १५-१५ अंश के अन्तर पर अंश के चिन्ह लगाकर अंश लिखे हैं। एक घंटे के भीतर १५-१५ मिनट के ४ कोटि बने हैं। यहाँ स्थानाभाव के कारण और विभाग नहीं किये गये। इन प्रत्येक कोटों के ३-३ और विभाग करने से प्रत्येक विभाग ५-५ मिनट का बन जायेगा।

अब घूघघड़ी को कहीं स्थापित करने के लिए स्थाई बनाना है तो इस प्रकार बनायेंगे-

चित्र संख्या ८३ घूघघड़ी

एक त्रिकोण इस प्रकार बनाओ जिसका एक कोण अपने स्थान के अक्षांश के बराबर हो और उसे किसी सम चबूतरे पर इस प्रकार पक्की तौर पर जमा दो कि

धूप घड़ी : १७५

उस त्रिकोण का ऊपरी किनारा ध्रुव की सीध में रहे। फिर इस गोल समय सूचक चक्र को (जो किसी घातु के पत्र पर बनाया गया हो) नीचे की ओर जहाँ १२ वजे का चिन्ह है इस प्रकार समकोण बनाते हुए केन्द्र विन्दु तक काटो, जिससे वह पहिले बताये हुए त्रिकोण में फँसाया जा सके। फिर उसे उस त्रिकोण में इस प्रकार फँसा दो कि त्रिकोण पर वह समकोण बनावे। अब इस त्रिकोण की ऊपरी छाया गोल चक्र पर पड़ेगी, वह समय सूचक होगी। इस गोल चक्र का ऊपरी अनावश्यक भाग काटकर फेंक दो। बड़े से बड़ा जितने घंटे का दिनमान उस स्थान पर होता

चित्रसंख्या ८४ धूपघड़ी बनाने का चक्र बनाना

है उतने ही घंटों के चिन्ह की आवश्यकता पड़ेगी। शेष भाग अनावश्यक होंगे, इस कारण अनावश्यक भाग को निकाल देना चाहिए, जैसा चित्रसंख्या ८४ में बताया है।

यहाँ २८° के अक्षांश पर धूपघड़ी बनी है, इस कारण १४ घंटे के चिन्ह यहाँ रहने दिये हैं। पहिले बता चुके हैं कि २४°-१२° से ३०°-३८° अक्षांश तक १४ घंटे का परम दिन होता है। इस कारण केवल १४ घंटे के चिन्ह यहाँ बनाये हैं। इस प्रकार के कटे हुए चक्र को त्रिकोण समकोण बनाते हुए जमाया है जैसा चित्र

चित्रसंख्या ८५ चक्र को त्रिकोण में फँसाना

१७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

संख्या ८५ में बनाया है। चक्र में जो १२ वज्रे के स्थान में केन्द्र तक फँसाने के लिए पहिले काट लिया गया था, उसी कटे हुए स्थान को त्रिकोण में फँसा कर जमाना चाहिए जिससे त्रिकोण के दोनों ओर उस चक्र का भाग निकला रहे। इसी चक्र में जिस स्थान पर त्रिकोण की छाया पड़ेगी, वहाँ बनाये हुए चिन्ह के अनुसार समय घंटा मिनट में जाना जा सकेगा।

चक्र को त्रिकोण में फँसाने के लिए यदि आधा त्रिकोण का भाग और आधा चक्र का भाग काट कर फँसाया जाय तो अच्छा अम जाता है और इसे त्रिकोण में जमाते समय इस बात का ध्यान रहे कि त्रिकोण और चक्र के बीच दोनों ओर समकोण रहे।

फिर इस त्रिकोण को किसी लकड़ी के छोटे पटिया पर जमा दो। वस यही धूप घड़ी बन गई। समय देखने के लिए इसे सदैव इस प्रकार रखना चाहिए कि त्रिकोण का ऊपरी किनारा और नोक ध्रुव की सीध में रहे।

अध्याय ३५

१ बिना पंचाङ्ग के तिथिज्ञान

यदि पंचाङ्ग पास न हो तो स्थूल रूप से तिथि वार नक्षत्र आदि का ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है यह नवीन विचार्यों को जानना आवश्यक है। इस कारण इन सबके जानने की रीति यहाँ बतलाते हैं।

इन विधियों से स्थूल ज्ञान ही होता है। सूक्ष्म ज्ञान तो गणित द्वारा ही होता है, इसका सूक्ष्म ज्ञान गणित-खण्ड में मिलेगा। यहाँ तो प्रारम्भिक ज्ञान की बातें बताई जायेगी।

पहिले बता चुके हैं कि किस-किस मास की पूर्णमासी को कौन-कौन नक्षत्र पड़ते हैं, उनको स्मरण रखना चाहिये।

१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ मास चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भा. प. आश्विन कार्तिक मार्ग शेष माघ फाल्गुन नक्षत्र चित्रा वि. ज्येष्ठा पू. रा. श्रवण. पू. भा. अश्वि० कृत्ति० मृग० पुष्य. मघा. उ.फा.

जिस दिन की तिथि जानना है उस दिन का नक्षत्र मालूम करो। फिर पूर्णमासी के आगे जो नक्षत्र हो उससे इष्ट दिन के नक्षत्र तक गिनो। जो संख्या हो, कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से उतना गिन कर तिथि कह दो। कभी-कभी तिथि में क्षय वृद्धि होने

विना पंचांग के तिथिज्ञान : १७७

से एक तिथि का अन्तर पड़ जाता है। १५ दिन से अधिक हो तो अमावस्या की १५ तिथि घटा कर शेष तिथि शुक्ल पक्ष की जानना।

पूर्णमासी को जो नक्षत्र बताये हैं उनमें भी कभी-कभी एक नक्षत्र का अन्तर पड़ जाता है, क्योंकि कोई नक्षत्र दिन के पहिले भाग में ही अन्त हो जाता है, कोई पूरे दिन भर रहता है, इस कारण तिथि में भी कभी-कभी अन्तर पड़ जाता है और कभी-कभी तिथि ठीक निकलती है।

(१) जैसे सम्वत् २००० में धनिष्ठा नक्षत्र को कौन तिथि वैशाख में होगी जानना है। चैत्र पूर्णिमा को नक्षत्र बिन्दा था, उसके आगे का नक्षत्र स्वाती से धनिष्ठा तक गिना तो ९ हुए। कृष्ण प्रतिपदा से गिना तो ९. तिथि हुई। पंचाङ्ग देखो तो उस दिन दशमी तिथि है। सप्तमी की हानि होने से तिथि का अन्तर पड़ गया।

(२) आवण में मूल नक्षत्र को कौन तिथि पड़ेगी यह जानना है। आपाङ्क की पूर्णिमा को पू. पा. नक्षत्र के आगे का नक्षत्र उ. पा. से मूल तक गिना तो—२५ आये, ये १५ से अधिक होने से, १५ तिथि अमावस्या तक के घटाये तो, शेष १० रहे। ये शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि हुई। पंचाङ्ग में उस दिन म्यारस थी। इस उदाहरण में आवण की पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र होता है, अपना मूल नक्षत्र उसके पहिले आता है, इससे इसके पहिले का मास आपाङ्क की पूर्णमासी ली गई।

सूर्य और चन्द्र से तिथि जानना और तारीख से तिथि जानना आगे बताया गया है।

२-विना पंचाङ्ग के वार (दिन) जानना

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जो दिन हो वह उस वर्ष का राजा कहलाता है। चैत्र शुक्ल परिव्रा से गत मास की अमावस्या तक गिनो, जो संख्या हो उसे १३ से गुणा करो और उसमें वर्तमान महिना के पक्ष के बीते हुए दिन जोड़ दो और योग में ७ का भाग दो, शेष बचे उसे वार के राजा से उस संख्या तक गिनो तो वार ज्ञात होगा।

(१) जैसे सम्वत् २००० में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सोमवार था। यही सोम-वार वर्ष का राजा कहलाया।

सम्वत् २००० में आपाङ्क शुक्ल ११ का वार जानना है।

चैत्र शुक्ल १ से आपाङ्क की अमावस्या तक गत मास=३ हुए ५ \times १३ = ६५ आपाङ्क की अमावस्या से आपाङ्क शुक्ल ११ तक गत दिन=१० पहिले के ४३ + १० = ५३ ५३ \div ७ = ७ शेष ३। वर्ष का राजा सोमवार से ३ गिना, तो सोमवार गत हुआ, वर्तमान मंगल वार आया। पहिले गत दिन लिया था, इस कारण सोमवार गत दिन आया। यदि वर्तमान दिन लिया होता तो उत्तर में वर्तमान दिन आता। पंचाङ्ग में आपाङ्क शुक्ल ११ को मंगलवार है।

(२) सम्वत् २००० कुआरि वदी १४ को कौन वार था ?

१२

१७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चैत्र से भादों की अमावस तक=१ मास X १३=१३ भादों की अमावस से भादों की पूर्णिमा तक १५ दिन, आगे कातिक बदी १४ तक=१४ दिन। ७३+१४+१४ दिन=३६३ दिन=७-शेष १३ दिन। वर्ष के राजा सोमवार से १३ गिना तो दूसरा मंगलवार आया। इस कारण उस दिन मंगलवार था।

(३) सम्बत् २००१ राजा शनि। माघ कृष्ण १० का दिन जानना है।

चैत्र शुक्ल १ से पूस की अमावस तक=१ मास X १३=१३ पूस की अमावस से पूस की पूर्नो तक=१५ दिन। पूस की पूर्णिमा से माघ कृष्ण १० तक=१० दिन। १३+१५+१०=३८=शेष ३३ दिन। वर्ष का राजा शनि से गिना चौथा दिन मंगल बार का दोपहर आया। आधा दिन बचा था इतने मण्ट हुआ उस दिन बसो आये दिन तक थी।

(४) सम्बत् २००१ राजा शनि। आषाढ़ शुक्ल १३ का दिन जानना है।

चैत्र शुक्ल १ से आषाढ़ कृष्ण ३० तक=३ मास X १३=४३ आषाढ़ ३० से आषाढ़ शुक्ल १३ तक=१३ दिन। ४३+१३=१७३=७ शेष ३॥ दिन ३ राजा शनि से चौथा बार मंगलवार हुआ। आधा दिन आया है अर्थात् १३ तिथि उस दिन आये दिन तक ही थी।

बहूधा दिन के किसी भी समय पर तिथि का अन्त हो जाता है। तिथि की हानि या वृद्धि भी हो जाती है, जिसके कारण बार में भी कभी-कभी एक दिन का अन्तर पड़ जाता है।

आगे वर्ष के राजा का चक्र कई वर्षों का दिया है जिससे कहीं खोजना न पड़े।

कई वर्षों के वर्ष के राजा का चक्र

सम्बत्राजाबारसम्बत्राजासम्बत्राजासम्बत्राजासम्बत्राजा
१८४८सोम.१८६९शनि.१८८४बुध.१८९७शुक्र.१९१०शनि.
१८४९शुक्र.१८७०शुक्र.१८८५रवि.१८९८बुध.१९११बुध.
१८५०शुक्र.१८७१मंगल१८८६शनि.१८९९सोम.१९१२सोम
१८५१मंगल१८७२सोम.१८८७गुरु.१९००शुक्र.१९१३रवि.
१८५३शुक्र.१८७३शुक्र.१८८८मंगल१९०१मंगल१९१४गुरु.
१८५४बुध.१८७४मंगल१८८९सोम.१९०२शनि.१९१५मंगल
१८५७बुध.१८७६शुक्र.१८९०शुक्र.१९०३शनि.१९१६सोम.
१८५८रवि.१८७७बुध.१८९१गुरु.१९०४बुध.१९१७शुक्र.
१८५९शनि१८७८मंगल१८९२सोम.१९०५मंगल१९१८गुरु.
१८६०गुरु.१८८०शनि.१८९३शुक्र१९०६रवि.१९१९सोम.
१८६१बुध.१८८१बुध.१८९४गुरु.१९०७गुरु.१९२०शुक्र.
१८६२सोम.१९०२रवि.१८९५सोम.१९०८बुध.१९२१गुरु.
१८६७गुरु.१८८३शनि.१८९६शनि.१९०९रवि.१९२२मंगल

बिना पंचांग के तिथिज्ञान : १७९

सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा सम्वत्‌ राजा

१९२३ शनि. १९४३ सोम. १९६३ रवि. १९८३ रवि. २००३ वुध.

१९२४ शुक्र. १९४४ शुक्र. १९६४ शुक्र, १९८४ रवि. २००४ रवि.

१९२५ वृध, १९४५ गुरुः १९६५ गुर. १९८५ गुरु. २००५ शनि.

१९२६ रवि १९४६ सोम. १९६६ सोम. १९८६ बुध, २००६ बुध,

१९२७ शनि, १९४७ शुक्र. १९६७ रवि. १९८७ सोम. २००७ रवि.

१९२८ बुध. १९४८ गुरु. १९६८ शुक्र. १९८८ शुक्र. २००८ शनि,

१९२९ सोम. १९४९ मंगल १९६९ मंगल. १९८९ वुध, २००९ बुध.

१९३० शनि. १९५० रवि. १९७० सोम. १९९० सोम. २०१० सोम.

१९३१ गुरु, १९५१ शनिः १९७१ शुक्र. १९९१ शुक्र २०११ रवि.

१९३२ बुध, १९५२ वुध. १९७२ मंगल १९९२ गुरु.

१९३३ रवि. १९५३ रवि. १९७३ सोम. १९९३ मङ्गल

१९३४ शुक्र, १९५४ शनि. १९७४ शुक्र. १९९४ सोम.

१९३५ बुध. १९५५ बुध. १९७५ शुक्र, १९९५ शुक्र

१९३६ रवि. १९५६ मंगल १९७६ मंगल १९९६ बुध,

१९३७ शनि. १९५७ शनि. १९७७ रवि. १९९७ सोम.

११३८ वुध. १९५८ गुरु, १९७८ शनिः १९९८ शुक्र.

१९३९ सोम. १९५९ बुध १९७९ बुध. १९९९ मंगल. `

१९४० रवि. १९६० रवि १९८० रवि. २००० सोम.

१९४१ शुक्र १९६१ शुक्र, १९८१ शनि. २००१ शनि.

१९४२ मंगल १९६२ बुधः १९८२ बुध. २००२ गुरु.

३-बिना पंचांग के नक्षत्र जानना

किसी चान्द्र मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है पहिले बता चुके हैं । पूणिमा

से आगे की तिथि तक गिनो, उस संख्या को गत पूर्णिमा की नक्षत्र संख्या में जोड़ दो

अर्थात्‌ पूणिमा को जो नक्षत्र हो उसके आगे इष्ट तिथि की संख्या तक गिनो तो इष्ट

नक्षत्र निकल आयगा ।

( १ ) जैसे सम्बत्‌ २००० में कातिक शुक्ल चतुर्थी को नक्षत्र जानना है.। इसके

पहिले कुँआर पूर्णिमा को अश्विनी नक्षत्र होता है । कुंआर पूणिमा से कातिक अमावस्या

तक १५ दिन और कातिक शुक्ल चौथ तक गत दिन १५+ ३=१८ दिन हुए । अब

पूर्णिमा का नक्षत्र अश्विनी से गिना तो १५ वां नक्षत्र ज्येष्ठा आया । पंचांग में भी

उस दिन ज्येष्ठा दिया है ।

(२) दूसरी रीतिन्कातिक कुष्ण १ से इष्ट मास तक गिन कर दूना करो ओर

बीते पक्ष के दिन जोड़ कर १ ओर मिला दो और २७ का भाग दो । शेष जो बचे

१६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उसे अश्विनी से गिन कर इष्ट नक्षत्र कहना। पक्ष के दिन जोड़ने के लिए कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को गिनो और आगे गिनना आरम्भ कर इष्ट तिथि तक गिनना चाहिए।

जैसे ऊपर के उदाहरण में गत मास कुंभार है। इसे कार्तिक से गिना तो यह कुंभार १२ वां महिना हुआ। १२ x २ = २४ + गततिथि (कुंभार पूर्णिमा से कार्तिक अमावस्या तक १५ + चौथे के ४ दिन) + १ = २४ + १५ + ४ + १ = ४४ ÷ २७ = शेष १७ = १७ वां नक्षत्र अनुराधा होता है। इस कारण इष्ट तिथि को अनुराधा नक्षत्र आया। पंचांग में उस दिन ज्येष्ठा नक्षत्र है। इसमें भी कभी २ एक नक्षत्र का अन्तर पड़ जाता है।

दूसरा उदाहरण—माघकृष्ण १० को सम्बत् २००० में नक्षत्र जानना है। गत मास पूस हुआ। कार्तिक से पूस तक = ३ मास x २ = ६ + गत दिन माघ कृष्ण के १५ + माघ शुक्ल के १० दिन + १ = ६ + १५ + १० + १ = ३२ ÷ २७ = शेष ५ = मृगशिर। पंचांग में कुछ देर उपरान्त रोहिणी था, १ का अन्तर पड़ गया। तिथि के घट बढ़ जाने से प्रायः १ दिन का कभी २ अन्तर पड़ जाता है।

(३) तीसरी रीति अमावस्या को सूर्य और चन्द्र एक साथ रहते हैं। यदि सूर्य नक्षत्र ज्ञात हो तो अमावस्या से आगे जितने दिन (इष्ट दिन तक) हों गिनो, उतने दिन सूर्य नक्षत्र से गिनने पर अपना दिन नक्षत्र (चंद्र नक्षत्र) आयगा।

आकाश में भी यदि चंद्र दिखता है तो चंद्र के समीप जो नक्षत्र होगा आकाश में देखकर भता दो। उस दिन वही नक्षत्र होगा।

(४) बिना पंचाङ्ग के योग जानना

सूर्य का जो नक्षत्र हो मालूम करो। सूर्य नक्षत्र से पुष्य नक्षत्र तक दोनों नक्षत्रों को मिलाते हुए गिनो, फिर जिस दिन का योग जानना है उस दिन के चन्द्र नक्षत्र तक अवन से गिनो। दोनों संख्या जोड़ कर २७ का भाग दो, जो शेष बचे वह संख्या योग की होगी।

जैसे सं० २००० में श्रावण शुक्ल १० को जानना है। उस दिन सूर्य आश्लेषा नक्षत्र पर है और इष्ट दिन (दशमी) को ज्येष्ठा नक्षत्र है। अब पुष्य नक्षत्र से सूर्य के आश्लेषा नक्षत्र तक गिना = यह दूसरा नक्षत्र है = २ संख्या हुई। फिर श्रावण से इष्ट नक्षत्र ज्येष्ठा तक गिना २३ आये। = २३ + २ = २५ ÷ २७ = शेष २५ रहे, २५ वां योग ब्रह्म योग आया, पंचांग में २६ वां योग ऐन्द्र है। नक्षत्रों के घट बढ़ जाने से इसमें भी कभी-कभी एक दिन का अन्तर पड़ जाता है।

(५) बिना पंचाङ्ग के करण जानना

शुक्ल प्रतिपदा से इष्ट तिथि को गिन कर दूना करो और १ घटा कर ७ का भाग दो तो ये चर करण निकलेंगे। वह करण तिथि के उत्तरार्द्ध में मिलेगा। पूर्वार्द्ध में उसके पहिले का करण जानना।

विना पंचांग के तिथिक्रम : १-१

ये ७ चर करण है : (१) वव (२) वालव, (३) कोलव, (४) तैतिल (५) गर, (६) वणिज, (७) विष्टि ।

स्थिर करण ४ है :—(१) शकुनि, (२) चतुष्पद, (३) नाग (४) किस्तुज ।

स्थिर करण—शुक्ल परिव्रा को पूर्वार्द्ध में किस्तुज; उत्तरार्द्ध में वव (चर) अमावस्या, कृष्ण ३० को पूर्वार्द्ध में चतुष्पद उत्तरार्द्ध में नाग, कृष्ण १४ को पूर्वार्द्ध में विष्टि (चर) उत्तरार्द्ध में शकुनि ।

उदाहरण—सम्बत् २००० में श्रावण पूर्णिमा को करण जानना है । पूर्णिमा तक १५ तिथि=१५ X २=३०-१=२९÷७=शेष १=वव करण उत्तरार्द्ध में, इसके पूर्वार्द्ध में (इसके पहिले का) विष्टि करण होगा । १ तिथि में २ करण होते हैं ।

पहिले करण जानना का चक्र दे चुके हैं, उसके द्वारा किसी भी तिथि का करण सरलता से जान सकते हैं ।

(६) विना पंचाङ्ग को चन्द्र जानना

(इष्ट तिथि X २) X (कृष्ण पक्ष में ३५, शुक्ल पक्ष में ५) ÷ = लब्धि वर्तमान संक्रांति जिस राशि की हो उस राशि से लब्धि संख्या तक गिनो तो चन्द्र की राशि निकलैगी । गिनने में १२ से अधिक संख्या हो तो १२ घटा कर शेष अंक लेना ।

(१) जैसे सं० २००० वैशाख शुक्ल १२ को चन्द्र जानना है ।

तिथि १२ X २=२४+५ शुक्ल पक्ष के=२९÷५=लब्धि ५ ५) २९(५ लब्धि दशमी को वृष संक्रांति थी । वृष से लेकर लब्धि का अंक ५ तक २५ गिना तो कन्या आई । तो उस दिन कन्या का चन्द्र था । ४

(२) कार्तिक अमावस को चन्द्र जानना है । तिथि १५ X २=३०+३५ (कृष्ण पक्ष होने से)=६५÷५=१३ लब्धि । लब्धि १३ यह १२ से अधिक है तो १३÷१२=शेष १ तुला की संक्रांति कृष्ण चौथ को थी उससे १ गिना तो तुला का चन्द्र आया ।

(३) ज्येष्ठ पूर्णिमा सं० २००० को चन्द्र जानना है । तिथि १५ X २=३०+५ (शुक्ल के)=३५÷५=लब्धि ७ । मिथुन संक्रान्ति १२ तिथि को थी, मिथुन से ७ गिना-सातवां धनु आया, इस कारण इष्ट दिन को धनु का चन्द्र हुआ ।

दूसरी रीति—अमावस्या को सूर्य चन्द्र एक राशि पर रहते हैं तो जो सूर्य की राशि हो वही से सवा दो दिन चन्द्र एक राशि पर रहता है । तिथि में २५ दिन=३ का भाग दो । अर्थात् तिथि X ४ ÷ ९=जो लब्धि होगी, सूर्य की राशि से उतना गिनो तो चन्द्र की राशि जान होगी । जैसे वैशाख शुक्ल १२=१२ X ४ ÷ ९=१५÷९=२ लब्धि । सूर्य वृष का है तो वृष से लब्धि ५ तक गिना तो कन्या राशि आई । इस कारण चन्द्र की राशि कन्या हुई ।

सूर्य को संक्रांति जानना आगे बताया है ।