सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ें२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
( १६ ) शुभ ग्रह उदय हो (अस्त न हो) और वक्त्री हो और निर्मल कांति हो अर्थात् देखने में प्रकाशवान दिखे तो अच्छा फल देता है ।
( १७ ) पाप ग्रह वक्त्री हो तो अशुभ है !
( १८ ) पाप ग्रह युक्त या भाव स्वामी के शत्रु से युक्त या दृष्ट ग्रह अनिष्ट फल देता है । जैसे चतुर्थ में वृश्चिक का बुध पाप ग्रह राहु से युक्त हो तो पाप युक्त होने से बुध बुरा हुआ । यदि दशम स्थान में वृष का राहु है जो चतुर्थम मंगल का शत्रु है तो बुध पर राहु की दृष्टि पड़ने से बुरा फल देगा ।
( १९ ) शुभ ग्रह जैसे शुभ या अशुभ स्थान में हो उसके शुभ या अशुभ फल को बढ़ाते हैं ।
पाप ग्रह अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फलों को घटाते हैं । इसलिए शुभ ग्रह शुभ स्थान में अति शुभ और अशुभ ग्रह अशुभ स्थान में हो तो उसके अशुभ फल को कम करने के कारण अच्छे होते हैं और अशुभ ग्रह शुभ घर में बैठ कर उसके शुभ प्रभाव को घटाने के कारण हानिकारक होते हैं ।
( २० ) शुभ स्थान=१, ४, १०, ५, ९, ११ भाव । सदा अशुभ स्थान=६, ८, १२ अशुभ स्थान=२ और ७ घर मारक स्थान हैं । इनमें अशुभ ग्रह हों तो ये अशुभ होते हैं । परन्तु इनमें शुभ ग्रह हो तो समान भाव हो जाता है ।
सम स्थान=३ भाव ( यह न शुभ है और न अशुभ है ) ।
( २१ ) ग्रह जिस स्थान को देखता है उसके बल को बढ़ाता है । यदि भाव स्वामी होकर उस भाव को देखे तो अच्छा फल देता है । जैसे लाभ स्थान में मिथुन का गुरु पंचम भाव अपने स्वस्थान ( धन राशि ) को पूर्ण दृष्टि से देखता है तो पंचम भाव का फल अच्छा होगा ।
( २२ ) बुरे भी ग्रह हों परन्तु अच्छे घर में हों जैसे त्रिकोण, केन्द्र या लाभ में तो अच्छा फल देते हैं । जैसे सूर्य पाप ग्रह है परन्तु दशम ( केन्द्र ) स्थान में अच्छा होता है ।
( २३ ) शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो अच्छा फल देते हैं ।
( २४ ) ग्रह जो ३, ६, ११ या, २, ७, ८ भाव के स्वामी न हों तो शुभ फल देते हैं ।
( २५ ) ग्रह जो एक दूसरे से १-१२ भाव में या ६-८ घर में हों तो बुरा प्रभाव करते हैं ।
अर्थात् एक ग्रह दूसरे भाव में हो और दूसरा उससे बारहवें भाव में हो तो उसका सम्बन्ध बुरा है । या एक छठे दूसरा वहाँ से आठवें स्थान में हो तो उनका सम्बन्ध बुरा होता है । जैसे लून में मंगल है और छठे स्थान में शनि है तो ये एक दूसरे से ६-८ स्थान में हुए । मंगल पूर्ण दृष्टि से शनि को देखता है तो दृष्टि द्वारा सम्बन्ध हो गया यह बुरा है ।