सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंफलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण नियम : २४७
है। यदि दूसरे भाव में गुह है और चौथे भाव में शक्र हो तो यह शुभ ग्रहों से घिरा होने के कारण अच्छा है। यदि दूसरे भाव में शनि और चौथे भाव में गुह हो तो एक और शुभ और दूसरी ओर अशुभ से घिरा होने के कारण मिथित फल देगा।
( ४८ ) यदि कोई भाव स्वामी पाप ग्रह हो और तीसरे घर में पङ्ग जाय तो अच्छा फल देगा। परन्तु शुभ ग्रह तीसरे घर में पङ्ग जाय तो मध्यम फल देता है।
( ४९ ) त्रिषडाय ( ३, ६, ११ भाव ) ये अशुभ स्थान कहलाते हैं, क्योंकि इनके स्वामी शुभ ग्रह हों तो बुरे होते हैं और पाप ग्रह हों तो शुभ फल देते हैं।
( ५० ) त्रिक स्थान ( ६-८-१२ भाव )—दुष्ट स्थान है, शुभ ग्रह त्रिक में उस भाव के फल की हानि करते हैं और पापग्रह उस भाव की वृद्धि की हानि करते हैं।
( ५१ ) किसी भाव का स्वामी त्रिक में हो या त्रिकेश जिस भाव में हो उस भाव के फल का नाश होता है। परन्तु शुभ ग्रह उसे देखता हो तो शुभ हो जाता है। जिस भाव का स्वामी त्रिक में हो वह उस भाव के अच्छे फल को बुरा और बुरे फल को अच्छा करता है।
( ५२ ) कोई भाव स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी यदि दुष्ट स्थान में हो तो उस भाव की सब बातों में बुरा फल देगा।
( ५३ ) कोई दुष्ट स्थान (त्रिक) का स्वामी अपने स्वस्थान में हो और उसका यदि दूसरा भी स्वस्थान हो जो दुष्ट भाव में पड़ता हो तो वह दुष्ट स्थान का भी स्वामी कहलायगा, परन्तु उस दुष्ट स्थान का फल न देगा, अपने ही स्थान का जहाँ पर वह है, फल देगा। जैसे लाभ स्थान में मेष का मंगल स्वस्थानी है, इसका दूसरा स्वस्थान वृश्चिक छठे घर में पड़ने से यह मंगल षष्टेश भी हुआ, परन्तु उसका हानि कारक फल न देगा, लाभ स्थान का ही फल देगा।
( ५४ ) किसी भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो अच्छा फल देगा।
( ५५ ) केन्द्र में शुभ ग्रह हो यदि वे केन्द्र स्वामी न हों तो बहुत शुभ होते हैं। क्योंकि केन्द्र स्वामी शुभ ग्रह बुरा फल देता है और पाप ग्रह केन्द्रेश हो तो अच्छा फल देता है।
( ५६ ) यदि पाप ग्रह केन्द्रेश होकर त्रिषडाय पति भी हो तो पाप कारक होते हैं। यदि पाप ग्रह केन्द्रेश होकर त्रिकोणेश भी हों तो शुभ फल देने में बलवान होते हैं।
( ५७ ) चार शुभ ग्रहों में से केन्द्रेश होने पर कौन सब से बुरा है इसका विचार-गुह शुक्र में विशेष शुभता होने से विशेष बुरे है।
बुध कर्मों पाप ग्रह के साथ रङ्ग जाने से पाप ग्रह हो जाता है, इससे गुह शुक्र की अपेक्षा बुध में अल्प दोष आता है।
चन्द्रमा ये पूर्ण रहने से शुभ है कीग होने से पाप हो जाता है, इससे बुध की अपेक्षा चन्द्र का दोष न्यून होता है। अर्थात् सब शुभ ग्रहों में चन्द्रमा में बहुत कम बुरा फल होता है।