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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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२४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

( ५८ ) त्रिकोण में लग्न भी ली जाती है।

पंचम नवम भाव में चाहे शुभ या अशुभ ग्रह हों शुभ फल देते हैं।

( ५९ ) उच्च का ग्रह त्रिकोण में बहुत अच्छा होता है, परन्तु नीच का ग्रह त्रिकोण में बुरा फल देता है।

( ६० ) केन्द्र स्वामी का शुभ फल का परिणाम परिश्रम से होता है। परन्तु त्रिकोण में बुरा फल देता है।

( ६१ ) केन्द्रेश या त्रिकोणेश यदि त्रिक स्थान में हो तो अपने सम्बन्ध वाले भाव में अशुभ प्रभाव डालते हैं।

( ६२ ) कोई भावेश अपने भाव से केन्द्र या त्रिकोण में पड़े तो शुभ फल देता है। जैसे तृतीयेश बुध, तीसरे भाव से केन्द्र ( सप्तम ) में पड़े अर्थात् तीसरे भाव से सातवाँ, नवम भाव आया तो यदि नवम भाव में तृतीयेश बुध पड़े तो शुभ फल देगा।

( ६३ ) यदि केन्द्रेश त्रिकोणेश के साथ हो तो अच्छा है। यदि दूसरे त्रिकोण के स्वामी से भी योग या दृष्टि द्वारा सम्बन्धित हो तो बहुत अच्छा फल देता है। जैसे वृष लग्न है, चतुर्थ में सिंह का सूर्य और बुध हैं तो केन्द्रेश सूर्य है, त्रिकोणेश ( पंचमेव ) बुध का यहाँ साथ हो गया। तब दूसरा त्रिकोणेश ( नवमेव ) शनि है, यदि वह दशम स्थान में स्वस्थानी है, चतुर्थ के ग्रहों को देखता है तो अच्छा है।

( ६४ ) द्विदोष भाव ( १-१२ भाव ) विचार।

घनेश और व्ययेश अपने स्वभाव अनुसार फल नहीं देते। ये जिस शुभ या अशुभ घर में रहते हैं या जिस शुभ या अशुभ भावेश के साथ रहते हैं या जिस स्थान के वे स्वामी हैं वहाँ जैसी शुभ या अशुभ राशि हो उसीके अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं। अर्थात् २ और १२ भाव के स्वामियों का स्वतः का कोई विशेष गुण दोष नहीं है, उनके गुण दोष विचारने को देखो कि इन भावेश की राशि का स्वामी किस भाव में है ये किस ग्रह के साथ है और ये भावेश किस भाव में पड़े हैं। इन तीनों रीति से इनका गुण दोष विचारना। अर्थात् २-१२ भाव के स्वामी शुभस्थान में या शुभ युक्त हो तो शुभ हैं। यदि अशुभ स्थान ( ६-८-१२ भाव ) में या अशुभ युक्त हों तो अशुभ हैं।

( ६५ ) छठा भाव यह श्लृण रोग शत्रु का प्रमुख स्थान है, यदि पाप ग्रह इसमें हो तो उस भाव के बुरे फल को नष्ट करेगा अर्थात् इनके नाश होने से वह सुखी होगा। यदि शुभ ग्रह हो तो इनको बढ़ने नहीं देंगा, परन्तु अधिक लाभ नहीं कर सकते। यदि छठे भाव का स्वामी अपने घर वृष में हो तो अच्छा समझा जाता है।

( ६६ ) अष्टम भाव में सूर्य चन्द्रमा बलवान नहीं होते, परन्तु ये अष्टमेव हों तो अच्छे समझे जाते हैं। और अष्टमेव यदि लगनेश भी हो तो वह अच्छा समझा जाता है।