सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंफलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण नियम : २४९
अष्टमेय अशुभ है परन्तु यह त्रिकोणश भी हो तो शुभ है । अष्टमेय त्रिपङ्क्य का भी स्वामी हो तो अशुभ कारक है । अष्टम में शुभ ग्रह हो तो अशुभता कम हो जाती है और कुछ शुभ भी हो जाता है । जिस भाव में अष्टमेय हो उस भाव का नाश हो जाता है ।
( ६७ ) व्ययेय व्यय भाव में हो तो शुभ समझा जाता है ।
( ६८ ) पाप ग्रह १, ८, १२ भाव में बुरा फल करते हैं । क्षीण चन्द्र १, ६, ८, १२ भाव में अशुभ है । पाप ग्रह ३, ६, ११ भाव में अच्छे हैं । शुभ ग्रह सब स्थानों में अच्छा फल देते हैं । गुरु शुक्र सदा शुभ हैं चाहे वे नीच के हों या ऐशों के साथ हों । परन्तु बुरी परिस्थिति में रहने के कारण उनकी शलाई करने की शक्ति घट जाती है ।
व्ययेय के विचार से स्थानों के स्वामियों की अच्छाई बुराई का विचार—किसी भी भाव के व्ययेय से उस भाव के स्वामी की स्थिति पर विचार ।
१ लगनेश—यह धन भाव का व्ययेय हुआ, धन अपने तन की रक्षा के लिए व्यय कराने में, लगनेश शुभ हुआ ।
२ द्वितीयेश—यह तृतीय भाव का व्ययेय हुआ । तृतीय भाव सहज पराक्रम और आयु का स्थान है । इस कारण इसके व्यय कारण होने से द्वितीयेश अशुभ और मारक कहलाता है ।
३ तृतीयेश—यह चतुर्थ का व्ययेय हुआ । चतुर्थ से सुख आदि का विचार होता है । इससे तृतीयेश यह सुख का व्ययकारक होने से अशुभ होता है ।
४ चतुर्थेश—यह पंचम का व्ययेय हुआ । पंचम विद्या का स्थान है यदि वह पापी होकर विद्या का नाश करता है तो उचित ही है । यदि शुभ होकर विद्या का नाश करता है तो अनुचित है । इस कारण चतुर्थेश शुभ हो तो अशुभ और पाप ग्रह हो तो शुभ कारक कहा जाता है ।
५ पंचमेय—यह षष्ठ भाव का व्ययेय हुआ । षष्ठ रोग, शत्रु आदि का स्थान है, उसका नाशक पंचमेय हुआ । इससे पंचमेय अच्छा कहा जाता है ।
६ षष्ठेश—यह सप्तम स्थान का व्ययेय हुआ । इस कारण सप्तम स्त्री का नाशक षष्ठेश हुआ ।
७ सप्तमेय—अष्टम का व्ययेय हुआ । अष्टम आयु का स्थान है जिसका नाशक सप्तमेय हुआ, जिससे सप्तमेय मारक कहलाया ।
८ अष्टमेय—यह नवम का व्ययेय हुआ । नवम भाग्य का स्थान है, जिसका व्ययकारक होने से अष्टमेय अशुभ हुआ ।
९ नवमेय—यह दशम भाव का व्ययेय है । दशम कर्म स्थान अर्थात् संसार का बन्धन है । इस कारण सांसारिक बन्धन अर्थात् कर्म का व्यय करने वाला होने के कारण नवमेय शुभ हुआ ।