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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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२५० : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

१० दशमेश—यह लाभ स्थान का व्ययेश है । लाभ का व्यय अर्थात् हानिकारक होने से यह अशुभ कहलाता है ।

दशमेश पाप ग्रह होकर अशुभत्व के फल का नाशक होने से शुभ समस्या जाता है और शुभ ग्रह अशुभ बढ़ाने के कारण बुरा समस्या जाता है ।

११ लाभेश—यह व्यय का व्ययेश हुआ । व्यय का नाश करता है । खर्च नहीं होने देने के कारण बुरा है, क्योंकि पैसा रहने पर भी व्यय नहीं करने दे तो आवश्यक सामग्री अन्य वस्त्र आदि प्राप्त करना कठिन हो जायगा । इससे लाभेश अशुभ कहा गया है ।

१२ व्ययेश—यह लग्न का व्ययेश है । लग्न शरीर है उसका व्ययकारक होने से यह अशुभ हुआ ।

इससे प्रगट हुआ कि—

त्रिषडाय—( ३-६-११ ) भाव के स्वामी पापकारक होते हैं ।

त्रिकोण—( ५-९ ) भाव के स्वामी शुभ कारक होते हैं ।

केन्द्र के स्वामी—शुभ हों तो अशुभकारक होते हैं । और पाप हों तो शुभकारक होते हैं ।

२-५-१२ भाव के स्वामी—अपने साथी और स्थान आदि के अनुसार फल देते हैं । २ और ७ भाव—मारक स्थान हैं—इनके स्वामी मारकेश कहलाते हैं ।

अध्याय ४५

गोचर विचार

गो का अर्थ है तारा ( नक्षत्र या ग्रह ) और चर अर्थात् चलना । सूर्यादि नवग्रह प्रतिदिन दैनिक गति के प्रमाण से प्रमण करते हैं, जिनकी साप्ताहिक या दैनिक स्थिति पंचांग में दी रहती है ।

इन्हीं ग्रहों की गति के अनुसार भिन्न भिन्न समय में भिन्न राशियों पर ग्रह सदा चलते रहते हैं और उस प्रमण से जो प्रभाव भिन्न राशियों पर पड़ता है उसे गोचर फल कहते हैं ।

गोचर के अनुसार ग्रह का फल जानने की यह रीति है कि जन्म समय के चन्द्र की जो अपनी राशि हो, उसको प्रथम स्थान मान कर उसपर से प्रत्येक स्थान के फल का क्रमानुसार विचार होता है । उसी जन्म राशि को प्रथम स्थान मान कर उसपर प्रत्येक ग्रह का स्थान गिनकर जानना चाहिए । जैसे किसी की कुम्भ राशि है तो जब