सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोचर विचार : २५१
कभी गोचर फल देखना हो तो पंचांग में जो कुण्डली ग्रहस्थिति के अनुसार दी रहती है उस कुण्डली में जहाँ कुम्भ राशि दी हो उसे पहिला स्थान माने और उसके आगे के स्थानों की क्रमानुसार गणना करो। तन धन आदि द्वादश स्थान लान-कुण्डली में जैसे गिनते हैं उसी प्रकार यहाँ भी पहिले स्थान को तन स्थान समझ कर स्थानों की गणना करना।
उदाहरण के लिए सम्वत् २००२ आषाढ़ कृष्ण अमावस्या की कुंडली पंचांग से ली। जन्म राशि कुम्भ का विचार करना है।
जन्म समय चन्द्र कुंभ राशि का था, इस कारण राशि कुंभ कहलाई। पंचांग की कुण्डली को घुमाकर इस प्रकार रखो कि अपनी राशि लान स्थान पर आ जावे।
पंचांग में दी हुई कुण्डली
अपनी गोचर कुण्डली
कुम्भ राशि को लान स्थान में लिख कर शेष राशियां क्रमानुसार बाईं ओर से लिख कर उसमें वे ही ग्रह स्थापित कर दो जो पंचांग की कुंडली में दिये हैं, तो अपनी गोचर कुंडली बन जायगी, जैसा यहाँ बताया है। जिस राशि पर जो ग्रह पंचांग की कुंडली में दिये रहते हैं उसी के अनुसार गोचर कुंडली में रहते हैं, केवल अन्तर यही रहता है कि पंचांग में सूर्य जिस राशि पर रहता है वह लान के स्थान में सबसे ऊपर दिया रहता है, अपनी गोचर कुंडली में लान स्थान पर अपनी राशि रहती है। अपनी इसी गोचर कुण्डली पर से फल का विचार करना पड़ता है।
अपनी कुण्डली में मेष का मंगल तीसरे स्थान में है और वृष का शुक्र चौथे स्थान में है। पंचम में मिथुन का सूर्य चन्द्र शनि और राहु हैं। षष्ठ में कर्क का वृध, अष्टम में कन्या का गुरु और लाभ स्थान में धन का केतु है। वस, इसी के अनुसार फल का विचार करना पड़ेगा।
गोचर फल विचारने का चक्र प्रत्येक पंचांग में दिया रहता है उससे देख लेना। इसका पूरा फल विचारना पृथक फलित खण्ड में दिया जायगा।