सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशनि का विशेष विचार : २५३
इस प्रकार जब लगातार ३ अशुभ स्थानों में शनि ७। वर्ष रहता है तब इसी को साड़ेसाती कहते हैं। इस कुण्डली में जहाँ-जहाँ पर शनि रहने से अशुभ स्थान शनि का माना गया है वहाँ + चिह्न देकर समझाया गया है। जब शनि की साड़ेसाती होती है तो इस साड़ेसाती में अशुभ फल होता है।
जिस राशि के जितने अंश पर जन्म समय चन्द्र रहता है उस राशि के समीप बारहवें स्थान पर जब शनि का प्रवेश होता है तो साड़ेसाती का आरम्भ होता है, और शनि नेश पर आया है ऐसा कहते हैं। शनि जब जन्मराशि और उसके अंश पर आ- है तो साड़ेसाती का मध्य भाग होता है उस समय शनि उदर में आया कहते हैं जन्म राशि के आगे के (दूसरे) स्थान में अंश के बराबर शनि आता है तो साड़ेसातों अन्त्य भाग में प्रवेश हुआ है या शनि चरणों में आया है ऐसा कहते हैं। इस प्रकार जन्मराशि से बारहवाँ, पहिला और दूमरा स्थान तक शनि रहने के काल को शनि की साड़ेसाती कहते हैं।
इस काल में नाना प्रकार के कष्ट और भिन्नर मनुष्यों को जन्म कुण्डली के अनुसार शनि के प्रभाव से भिन्नर प्रकार की आपत्तियाँ आती हैं। इस में किसी की मृत्यु होती है, किसी के माना पिता का मरण होता है, किसी की स्त्री की मृत्यु होती है, किसी का घर जलता है, किसी की जीविका जाती है इत्यादि अनेक प्रकार के संकटमय प्रसंग आते हैं। परन्तु विशेष परिस्थिति में यह कभीर शुभ फल भी देता है। जब शनि की अशुभ साड़ेसाती हो तो लोहे की अंगूठी पहिरना, शनि की उपासना करना, जप दान आदि करना चाहिए।
किसी को भी साड़ेसाती आने पर फिर ३० वर्ष में साड़ेसाती आती है। एक मनुष्य को ३ बार से अधिक साड़ेसाती नहीं आती। चौथी साड़ेसाती लाखों में बिरला मनुष्य भोगता है।
शनि की साड़ेसाती का शुभाशुभ जो फल मिलता है नीचे चक्र में बताया है कि किस राशि वाले को किस प्रकार पीडा आदि देता है।
| राशि समय और प्रभाव | राशि समय और प्रभाव |
|---|---|
| १ मेष बीच के २।। वर्ष अनिष्ट | ७ तुला अंत के २।। वर्ष अनिष्ट |
| २ वृष आरंभ के २।। वर्ष अनिष्ट | ८ वृश्चिक पहिले २।। वर्ष अच्छे शेष अनिष्ट |
| ३ मिथुन अन्तके " " | ९ धन अंत के २।। अच्छे शेष अनिष्ट |
| ४ कर्क पहिले २।। वर्ष अच्छे शेष अनिष्ट | १० मकर २।। वर्ष किंचित् अनिष्ट |
| ५ सिंह अन्त के २।। श्रेष्ठ शेष अनिष्ट | ११ कुंभ सब अच्छा |
| ६ कन्या पहिले २।। वर्ष अनिष्ट | १२ मीन अंत के २।। वर्ष अनिष्ट |
मतान्तर—कोई कहते है धन के पूर्ण ७।। वर्ष अनिष्ट, मकर के पहिले ५ वर्ष और कुंभ के पहिले २।। वर्ष अनिष्ट कारक होते है।