सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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विशेष अनुभव से यह सिद्ध हुआ है कि साढ़े सातों का शुभाशुभ फल जातक के जन्म शनि के ऊपर निर्भर है।
जब शनि जन्म राशि से
१२ वें स्थान में आता है तो—शरीर कष्ट, अधिक खर्च, व्यापार में अड़चन, धन की हानि और शरीर नेत्र में पीड़ा करता है।
जन्म स्थान में आता है तो—उदर विकार, जमीन-सम्पत्ति तथा पशु-वाहन की हानि, अधिकारियों से मनमुटाव और अपयश करता है।
दूसरे स्थान में आता है तो—निरर्थक आज्ञा, कुटुम्ब तथा शत्रु विरोध, कुटुम्ब वियोग, राजमार्ग में झंझट उत्पन्न हो।
शनि का स्वस्थान मकर और कुम्भ है। जब शनि अपने स्वस्थान या उच्च स्थान पर आता है तो जन्मकुण्डली की स्थिति के अनुसार वह जातक को लाभ भी करता है।
अर्द्धेया का चरण विचार—
जब शनि जन्मराशि से चतुर्थ या अष्टम स्थान में होता है तो उसे अर्द्धेया शनि कहते हैं। इसमें भी शनि कष्ट देता है, जिसका फल इस प्रकार होता है :—
चतुर्थ में—शरीर तथा माता पिता को कष्ट, राज मार्ग से चिता, सम्पत्ति सम्बन्धी झंझट, धन खर्च।
अष्टम में शरीर व शत्रु भय, मानसिक चिन्ता और धन का अपव्यय।
शनि का चरण विचार—
शनि जब एक राशि छोड़ कर दूसरी राशि में जावे उस समय देखो शनि अपनी जन्म राशि से कितने स्थान में है, उसके अनुसार निम्नलिखित फल का विचार करना।
१-६-११ स्थान में हो तो—शुवर्णपाद=फल=सौख्य फल।
२-५-९ ,, ,, =रजत पाद=फल=हर्ष काम फलप्रद।
६-७-१० ,, ,, =ताम्र पाद=फल=मध्यम फल प्रद।
४-८-१२ ,, ,, लोह पाद =फल दुःख दारिद्र्य दायक।
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अध्याय ४७
आयुर्दोष
आयु के ३ भेद हैं। ( १ ) अल्पायु, ( २ ) मध्यायु, ( ३ ) दीर्घायु। साधारण प्रकार से आयु का विचार लगनेश और अष्टमेश से होता है।