सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 288 में से
संदर्भ में पढ़ेंमारक स्थान और मारकेश विचार : २५७
अध्याय ४८
मारक स्थान और मारकेश बिचार
जन्म कुण्डली में विशेष स्थान जिस से मुत्यु होने का विचार होता है उसे मारक
स्थान कहते हैं । मारक स्थान का स्वामी मारकेश कहलाता है 1
ज्योतिष में मृत्यु शब्द का अर्थ विस्तीर्ण है ।
यहाँ मृत्यु शब्द में-व्यथा, दुःख, भय, लज्जा, रोग, शोक, मरण तथा अपमान भी
सम्मिलित है । मारक स्थाना
(१) लग्न से अष्टम स्थान ओर
अष्टम से अष्टम स्थान अर्थात् तीसरा
स्थान ।
इन दोनों का व्यय स्थान ( वारहवाँ
स्थान अर्थात् अष्टम, का व्यय स्थान सप्तम
हुआ और तीसरे का व्यय स्थान दूसरा
भाव हुआ । अर्थात् दूसरा तीसरा सप्तम
और अष्टम स्थान, कुंडली में जहाँ चिल्ल ८00 ! ४
हैं, मारक स्थान कहाते हैं । इन चारों में द्वितीय और सप्तम मुख्य और बलवान
मारक स्थान है । इन मारक स्थानों के स्वामी मारकेश कहलाते हैं ।
मारकेश विचार ( संक्षिप्त में )
कुण्डली में अल्प, मध्य, पूर्ण आयु के -विचार के उपरांत मारकेश का विचार
करना चाहिए.
(१ ) शनि और केतु की महामारक संज्ञा है। ये मारकेश होते हैं तो गति
अनिष्ट प्रभाव पहुंचाते हैं ।
(२) सूर्य और चन्द्र को छोड़ कर शेष सब ग्रह, राहु केतु भो मारक स्थान के
स्वामी होने पर मारकेश होते हैं । छ १
( ३ ) चन्द्र जब बुरे स्थान में हो तो उसकी अंतर्दशा में भी मृत्यु हो जाती है।
( ४ ) शनि जब पाप ग्रह के साथ होतो मारकेश होने पर सव ग्रहों को दबा
कर मृत्यु कारक होता है । पक
(५ ) मारकेश की मुख्य दशा व मारक स्थान में स्थित क्र्र ग्रह की अंतदेशा म
या, पाप ग्रह की महादशा में जब पाप ग्रह का अन्तर ( अन्तर्देशा ) हो तो मृत्यु होती है।
( ६ ) बलवान ग्रह की दशा में जब वह मारकेश होता है तो मृत्युतुल्य कष्ट,
रोग, भय, शोक, अग्नि भय, चोर भय, आदि दुःखद प्रभाव उत्पन्न करता हैत
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