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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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मारक स्थान और मारकेश विचार : २५७

अध्याय ४८

मारक स्थान और मारकेश बिचार

जन्म कुण्डली में विशेष स्थान जिस से मुत्यु होने का विचार होता है उसे मारक

स्थान कहते हैं । मारक स्थान का स्वामी मारकेश कहलाता है 1

ज्योतिष में मृत्यु शब्द का अर्थ विस्तीर्ण है ।

यहाँ मृत्यु शब्द में-व्यथा, दुःख, भय, लज्जा, रोग, शोक, मरण तथा अपमान भी

सम्मिलित है । मारक स्थाना

(१) लग्न से अष्टम स्थान ओर

अष्टम से अष्टम स्थान अर्थात्‌ तीसरा

स्थान ।

इन दोनों का व्यय स्थान ( वारहवाँ

स्थान अर्थात्‌ अष्टम, का व्यय स्थान सप्तम

हुआ और तीसरे का व्यय स्थान दूसरा

भाव हुआ । अर्थात्‌ दूसरा तीसरा सप्तम

और अष्टम स्थान, कुंडली में जहाँ चिल्ल ८00 ! ४

हैं, मारक स्थान कहाते हैं । इन चारों में द्वितीय और सप्तम मुख्य और बलवान

मारक स्थान है । इन मारक स्थानों के स्वामी मारकेश कहलाते हैं ।

मारकेश विचार ( संक्षिप्त में )

कुण्डली में अल्प, मध्य, पूर्ण आयु के -विचार के उपरांत मारकेश का विचार

करना चाहिए.

(१ ) शनि और केतु की महामारक संज्ञा है। ये मारकेश होते हैं तो गति

अनिष्ट प्रभाव पहुंचाते हैं ।

(२) सूर्य और चन्द्र को छोड़ कर शेष सब ग्रह, राहु केतु भो मारक स्थान के

स्वामी होने पर मारकेश होते हैं । छ १

( ३ ) चन्द्र जब बुरे स्थान में हो तो उसकी अंतर्दशा में भी मृत्यु हो जाती है।

( ४ ) शनि जब पाप ग्रह के साथ होतो मारकेश होने पर सव ग्रहों को दबा

कर मृत्यु कारक होता है । पक

(५ ) मारकेश की मुख्य दशा व मारक स्थान में स्थित क्र्र ग्रह की अंतदेशा म

या, पाप ग्रह की महादशा में जब पाप ग्रह का अन्तर ( अन्तर्देशा ) हो तो मृत्यु होती है।

( ६ ) बलवान ग्रह की दशा में जब वह मारकेश होता है तो मृत्युतुल्य कष्ट,

रोग, भय, शोक, अग्नि भय, चोर भय, आदि दुःखद प्रभाव उत्पन्न करता हैत

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