सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रों की पहिचान : २५
५ मृगशिर या मृगशिरा—इसे बहुधा सब किसान पहिचानते हैं। इसे वे हिरनी या खटोला कहते हैं। इसके चारों ओर चौकोन बनाते हुए ४ प्रकाशवान् तारे हैं। इनके बीच में ३ तारे एक दूसरे की सीध में हैं। इसे व्याघ्र का तीर कहते हैं। व्याघ्र का तारा बहुत नीचे हटकर अतिप्रकाशवान् है और शीघ्र पहिचाना जा सकता है। मृगशिर के अन्त में ३ तारे पास-पास एक सीध में हैं। इसे हिरन की पूँछ कहते हैं और सामने की ओर ३ तारों का एक छोटा त्रिकोण है उसे हिरन का मुख कहते हैं। अगहन के महीने में ब्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है। अगहन की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। इन तारों में मृगशिर के ३ ही तारे माने जाते हैं। और आकार हिरन सदृश माना जाता है। ये तारे आकाश गंगा के किनारे हैं और जब सिर पर आते हैं तब दिखते हैं। ये रोहिणी से कुछ दूर हट कर दक्षिण की ओर हैं। मार्च के महीने में ब्यालू के समय ये सिर पर आते हैं। उदय के ६ घण्टा बाद सिर पर आते हैं। देखें चित्र संख्या १९।
चित्र संख्या-१९
५ मृगशिर
चित्र संख्या-२०
६ आर्द्रा
६ आर्द्रा—इसका एक तारा है। यह प्रायः भरणी के सीध में है और मृगशिर तथा पुनर्वसु के बीच में दिखता है। मार्च के महीने में लगभग ब्यालू के समय सिर पर आता है और सिर से कुछ दक्षिण की ओर दिखता है। इसका आकार मणि सदृश माना है। इसका प्रकार साधारण है। यह भी आकाश गंगा के बाहरी किनारे पर है। इसकी पहिचान के लिए और तारों को पहिचान कर इसे खोजें। देखें चित्र सं० २०।
७ पुनर्वसु—इसके ४ तारे हैं। घर सदृश इसका आकार बताया है। २ तारे इसके पहिली श्रेणी के ( अधिक प्रकाशवान् ) और तीसरा तारा भी पहिली श्रेणी का है। इस प्रकार उत्तर की ओर २ तारे हैं और दक्षिण की ओर २ तारे हैं। उत्तर की ओर के २ तारे सबसे पहिले उगते हैं। देखें चित्र संख्या २१। तारे किनरी श्रेणियों के हैं उनकी श्रेणी का क्रम चित्रपट ३९-४०-४१ देखने से प्रगट होगा।
८ पुष्य—इसके ३ तारे लिये जाते हैं और बाण सदृश इसका आकार माना जाता है। देखें चित्र संख्या २२। ये बारीक-बारीक तारे हैं जिनका छोटा त्रिकोण बनता है।