सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा; प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चमकदार है और तीसरा तारा जो पूर्व में है वह सबसे तेजस्वी है। इसके पश्चिम में भी एक तारा है। देखें चित्र संख्या १५। यह नक्षत्र कुंभार के महीने में ८-९ बजे रात को पूर्व बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर हट कर उदय होने के ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त सिर पर आता है और ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त पश्चिम बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर अस्त होता है।
यह नक्षत्र जनवरी के आरम्भ में म्यालू के समय सिर पर आता है और शिरो-बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर दिखता है। इसके ३ तारों का आकार घोड़े के मुख सदृश होने से अभिवनी कहते हैं। कुंभार की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है।
२ भरणी—इसके ३ छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे छोटा सा त्रिकोण बनता है। अभिवनी और भरणी के बीच में रेखा खींचने पर उस रेखा के उत्तर में यह त्रिकोण पड़ता है। यह अभिवनी के आगे पूर्व की ओर है इसका आकार योनि सरीखा बताया है परन्तु यह त्रिकोणाकार है। देखें चित्र संख्या १६।
३ कृतिका—यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है किसान लोग इसे अच्छी तरह पहिचानते हैं। वे लोग इसे घोड़ी का मांगरा कहते हैं। कालिक के महीने में म्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है और इसी को देखकर कार्तिक स्नान करने वाले समय
चित्र संख्या-१५ चित्र संख्या-१६ चित्र संख्या-१७ चित्र संख्या-१८
१ अभिवनी २ भरणी ३ कृतिका ४ रोहिणी
का अनुमान करते हैं। इसके ६ तारे माने जाते हैं और इसका आकार खुरा सदृश कहा है। फरवरी में यह म्यालू के समय सिर पर आता है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। देखें चित्र संख्या १७।
४ रोहिणी—इसमें ५ तारे माने जाते हैं और आकार गाड़ी सदृश बताया गया है। परन्तु देखने में यह एक कोण सा दिखता है। यह कृतिका के कुछ बाजू से नीचे की ओर दिखता है। इसमें नीचे का तारा अधिक प्रकाशवान् है। ये तारे कृतिका से कुछ दक्षिण की ओर हैं। फरवरी में म्यालू के समय ये सिर पर आते हैं और कुछ दक्षिण की ओर रहते हैं। इनका आकार चित्र संख्या १८ देखने से समझ पड़ेगा।
कहते हैं शनि और मंगल जब इस शकट (गाड़ी) का भेदन करते हैं (इस त्रिकोण में से होकर जाते हैं) तब प्रलय होता है। इसलिए ये ग्रह शकट भेदन नहीं करते। केवल चन्द्र ही यहाँ से जाता है। इसी कारण रोहिणी को चन्द्र की स्त्री कहा है।