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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

२४ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा; प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चमकदार है और तीसरा तारा जो पूर्व में है वह सबसे तेजस्वी है। इसके पश्चिम में भी एक तारा है। देखें चित्र संख्या १५। यह नक्षत्र कुंभार के महीने में ८-९ बजे रात को पूर्व बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर हट कर उदय होने के ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त सिर पर आता है और ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त पश्चिम बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर अस्त होता है।

यह नक्षत्र जनवरी के आरम्भ में म्यालू के समय सिर पर आता है और शिरो-बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर दिखता है। इसके ३ तारों का आकार घोड़े के मुख सदृश होने से अभिवनी कहते हैं। कुंभार की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है।

२ भरणी—इसके ३ छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे छोटा सा त्रिकोण बनता है। अभिवनी और भरणी के बीच में रेखा खींचने पर उस रेखा के उत्तर में यह त्रिकोण पड़ता है। यह अभिवनी के आगे पूर्व की ओर है इसका आकार योनि सरीखा बताया है परन्तु यह त्रिकोणाकार है। देखें चित्र संख्या १६।

३ कृतिका—यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है किसान लोग इसे अच्छी तरह पहिचानते हैं। वे लोग इसे घोड़ी का मांगरा कहते हैं। कालिक के महीने में म्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है और इसी को देखकर कार्तिक स्नान करने वाले समय

चित्र संख्या-१५ चित्र संख्या-१६ चित्र संख्या-१७ चित्र संख्या-१८

१ अभिवनी २ भरणी ३ कृतिका ४ रोहिणी

का अनुमान करते हैं। इसके ६ तारे माने जाते हैं और इसका आकार खुरा सदृश कहा है। फरवरी में यह म्यालू के समय सिर पर आता है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। देखें चित्र संख्या १७।

४ रोहिणी—इसमें ५ तारे माने जाते हैं और आकार गाड़ी सदृश बताया गया है। परन्तु देखने में यह एक कोण सा दिखता है। यह कृतिका के कुछ बाजू से नीचे की ओर दिखता है। इसमें नीचे का तारा अधिक प्रकाशवान् है। ये तारे कृतिका से कुछ दक्षिण की ओर हैं। फरवरी में म्यालू के समय ये सिर पर आते हैं और कुछ दक्षिण की ओर रहते हैं। इनका आकार चित्र संख्या १८ देखने से समझ पड़ेगा।

कहते हैं शनि और मंगल जब इस शकट (गाड़ी) का भेदन करते हैं (इस त्रिकोण में से होकर जाते हैं) तब प्रलय होता है। इसलिए ये ग्रह शकट भेदन नहीं करते। केवल चन्द्र ही यहाँ से जाता है। इसी कारण रोहिणी को चन्द्र की स्त्री कहा है।

नक्षत्रों की पहिचान : २५

५ मृगशिर या मृगशिरा—इसे बहुधा सब किसान पहिचानते हैं। इसे वे हिरनी या खटोला कहते हैं। इसके चारों ओर चौकोन बनाते हुए ४ प्रकाशवान् तारे हैं। इनके बीच में ३ तारे एक दूसरे की सीध में हैं। इसे व्याघ्र का तीर कहते हैं। व्याघ्र का तारा बहुत नीचे हटकर अतिप्रकाशवान् है और शीघ्र पहिचाना जा सकता है। मृगशिर के अन्त में ३ तारे पास-पास एक सीध में हैं। इसे हिरन की पूँछ कहते हैं और सामने की ओर ३ तारों का एक छोटा त्रिकोण है उसे हिरन का मुख कहते हैं। अगहन के महीने में ब्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है। अगहन की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। इन तारों में मृगशिर के ३ ही तारे माने जाते हैं। और आकार हिरन सदृश माना जाता है। ये तारे आकाश गंगा के किनारे हैं और जब सिर पर आते हैं तब दिखते हैं। ये रोहिणी से कुछ दूर हट कर दक्षिण की ओर हैं। मार्च के महीने में ब्यालू के समय ये सिर पर आते हैं। उदय के ६ घण्टा बाद सिर पर आते हैं। देखें चित्र संख्या १९।

चित्र संख्या-१९

५ मृगशिर

चित्र संख्या-२०

६ आर्द्रा

६ आर्द्रा—इसका एक तारा है। यह प्रायः भरणी के सीध में है और मृगशिर तथा पुनर्वसु के बीच में दिखता है। मार्च के महीने में लगभग ब्यालू के समय सिर पर आता है और सिर से कुछ दक्षिण की ओर दिखता है। इसका आकार मणि सदृश माना है। इसका प्रकार साधारण है। यह भी आकाश गंगा के बाहरी किनारे पर है। इसकी पहिचान के लिए और तारों को पहिचान कर इसे खोजें। देखें चित्र सं० २०।

७ पुनर्वसु—इसके ४ तारे हैं। घर सदृश इसका आकार बताया है। २ तारे इसके पहिली श्रेणी के ( अधिक प्रकाशवान् ) और तीसरा तारा भी पहिली श्रेणी का है। इस प्रकार उत्तर की ओर २ तारे हैं और दक्षिण की ओर २ तारे हैं। उत्तर की ओर के २ तारे सबसे पहिले उगते हैं। देखें चित्र संख्या २१। तारे किनरी श्रेणियों के हैं उनकी श्रेणी का क्रम चित्रपट ३९-४०-४१ देखने से प्रगट होगा।

८ पुष्य—इसके ३ तारे लिये जाते हैं और बाण सदृश इसका आकार माना जाता है। देखें चित्र संख्या २२। ये बारीक-बारीक तारे हैं जिनका छोटा त्रिकोण बनता है।

२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

है। जो देखने में एक ही तारा सदृश दिखता है। अप्रेल के महीने में म्यालू के समय यह सिर पर आता है। पूष के महीने में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है।

चित्र संख्या २१ ७ पुनर्वसु

चित्र संख्या २२ ८ पुष्य

चित्र संख्या २३ ९ आश्लेषा

६ आश्लेषा या अश्लेषा—इसके ५ तारे और चक्र सरीखा आकार बताया है। यह पुष्य के दक्षिण में है और उसी की बराबरी से सिर पर आता है। चन्द्र पुष्य से आश्लेषा पर शीघ्र आ जाता है। इसके बारीक तारे हैं जिनमें एक प्रकाशवान् तारा है। देखें चित्र संख्या २३।

१० मघा—इसके ६ तारे माने जाते हैं और आकार भवन सदृश बताया गया है। परन्तु इन ६ तारों पर विचार करने से हंसिया सरीखा आकार दिखाई देता है। ध्यान में आते ही यह शीघ्र पहिचाना जा सकता है। इसके ४ बड़े तारे हैं। इनका आकार एक समानान्तर भुज चौकोन सा बनता है, जिस प्रकार दियासलाई की डिव्वी के ऊपर के ढक्कन को दवा देने से कुछ तिरछा चौकोन बनता है। इसके पश्चिम की ओर दक्षिण कोण का तारा तेजस्वी है और पहली श्रेणी का है। इसके दक्षिण में एक बारीक तारा है जो पाँचवाँ तारा है। पूर्व बाजू से दोनों दक्षिण के तारे अधिक तेजस्वी हैं। मई महीने के आरम्भ में म्यालू के समय यह सिर पर कुछ दक्षिण की ओर हटा हुआ दिखता है। माघ की पूर्णिमा को चन्द्रमा इसके समीप रहता है। कोई इसके ५ तारे मानते हैं। देखें चित्र संख्या २४।

११ पूर्वा फाल्गुनी } मघा के पूर्व में कुछ उत्तर को दोनों फाल्गुनी के ४ १२ उत्तरा फाल्गुनी } गरे हैं जो चौकोन सरीखे दिखते हैं। उसके पूर्व-पश्चिम बाजू का उत्तर-दक्षिण बाजू से अन्तर दुगने से कुछ कम है। पश्चिम की ओर के २ तारे पूर्वा फाल्गुनी हैं। इसके उत्तर की ओर का अधिक तेजस्वी है। पूर्व बाजू के दोनों तारों को उत्तरा फाल्गुनी कहते हैं। इसके नीचे दक्षिण का तारा अधिक तेजस्वी है। उत्तर का बारीक है। फाल्गुन में इस नक्षत्र पर पूर्णिमा को चन्द्र आता है फाल्गुन में ये दो नक्षत्र म्यालू के समय पूर्व में दिखते हैं। कोई जून में म्यालू के समय सिर पर दिखते हैं। और ठीक सिर पर आते हैं। देखें चित्र संख्या २५।

नक्षत्रों की पहिचान : २७

चित्र संख्या २४

१० मघा

चित्र संख्या २५

११ पूर्वा फाल्गुनी

चित्र संख्या २६

१३ हस्त

१२ उत्तरा फाल्गुनी

१३ हस्त—इसके ५ तारे हैं। आकार हाथ सदृश है। यह मघा के दक्षिण ओर है। यीघ्र पहिचाना जा सकता है। हाथ की अंगुलियों की ५ नोक सदृश ये पाँचों तारे दिखते हैं। जून के महीने में ये ब्यालू समय सिर पर दिखते हैं और शिरोविन्दु से ३०-४० अंश दक्षिण की ओर रहते हैं। देखें चित्र संख्या २६।

१४ चित्रा—हस्त के बाजू पूर्व को कुछ उत्तर की ओर यह एक ही तारा है जो बड़ा प्रकाशवान् है। आकार इसका मोती सदृश बताया है। जून के अन्तिम भाग में यह ब्यालू के समय सिर पर आता है। चैत्र की पूर्णिमा को चन्द्र इस पर आता है। यह तारा प्रायः आतिवृत्त पर है। देखें चित्र संख्या २७।

१५ स्वाती—यह अकेला और बहुत बड़ा तारा है। सरलता से पहिचाना जा सकता है। चित्रा से बहुत उत्तर को यह चमकता हुआ दिखता है। यह तारा चित्रा से भी अधिक प्रकाशवान् है। चित्रा के प्रायः ५० मिनट बाद यह शिरोविन्दु पर आता है और उसके १॥ घंटा बाद दूबता है। यह चित्रा से प्रायः ३०° दक्षिण को है। इसका एक ही तारा है और आकार मूंगा सदृश बताया है। यह कुछ लाल रंग का है। देखें चित्र संख्या २८।

१६ विशाखा—इसके २ तारे हैं। चित्रा के सामने ही नीचे की ओर २ तारे चमकते हुए दिखते हैं, परन्तु चित्रा से उनका तेज कम है। फरवरी में ५ बजे प्रातः के लगभग ये सिर पर दिखते हैं। पहिले तारे के उपरान्त दूसरा तारा २६ मिनट के अन्तर से उगता है। उसकी बराबरी से २ और छोटे तारे हैं जिनको मिला कर देखने से एक चौकोन सा बन जाता है। इसके ४ तारे और आकार तोरण सदृश

चित्र संख्या २७

१४ चित्रा

चित्र संख्या २८

१५ स्वाती

चित्र संख्या २९

१६ विशाखा

चित्र संख्या ३०

१७ अश्विनी

२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

मानते हैं। वैशाख में चन्द्रमा पूर्णिमा को इस नक्षत्र पर आता है। मई महीने में ब्यालू समय यह उदय होता है और उदय होने के समय पूर्व और आग्नेय कोण के बीच दिखता है। दोनों बड़े तारों में एक चित्रा के तारे के सामने नीचे की ओर दिखता है और दूसरा उसके बाईं ओर दिखता है। दोनों तारे एक से तेजस्वी हैं, परन्तु चित्रा से तेज कम है। कभी चन्द्र दोनों बड़े तारों के बीच से होकर जाता है। देखें चित्र संख्या २९।

१७ अनुराधा—इसके ४ तारे हैं, जो प्रायः एक सीध में उत्तर दक्षिण को हैं और विशाखा के नीचे पूर्व को हैं। विशाखा के बड़े तारों से एक सीधी रेखा अनुराधा के तारों की सरल रेखा के छोरों से मिलाई जावे तो उत्तर की अपेक्षा दक्षिण का अन्तर अधिक प्रगट होगा। इन तारों का आकार भात की बलि ( पिंड ) सदृश बताया है अर्थात् किसी ने भात की बलि के ४ कोर उठाकर ४ जगह में एक रेखा में एक के नीचे एक रख दिये हों। देखें चित्र संख्या ३०।

१८ ज्येष्ठा—इसके ३ तारे प्रायः एक सीध में पूर्व पश्चिम को हैं। अनुराधा से सीधी रेखा में बीच से पूर्व को एक लम्ब बाँचा जावे तो उसकी सीध में ३ अनुराधा के तारे खड़े एक के नीचे एक हों तो ज्येष्ठा के तारे आड़े एक के बाद एक हों। ज्येष्ठा के बीच का एक तारा पहिली-श्रेणी का है। ज्येष्ठ मास में पूर्णमासी को चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। इसका आकार कुण्डली सरीखा बताया है देखें चित्र संख्या ३१।

१९ मूल—ज्येष्ठा के पूर्व में ११ तारे हैं, जो सिंह की पूँछ सरीखा या बिच्छू के डंक सरीखा आकार गोलाई लिये बनाते हैं। यह शीघ्र पहिचाना जा सकता है। आकाश गंगा में यह कांतिवृत्त के दक्षिण को है। देखें चित्र संख्या ३२। इसका आकार सिंह पुच्छ सरीखा माना है। यह जून के उत्तरार्द्ध में ब्यालू के समय उदय होता है। सितम्बर में ५ बजे संघा को और अप्रैल में प्रातः के समीप सिर पर दिखता है। अनुराधा आदि के तारों को मिला कर देखने से आकाश में एक बड़ा बिच्छू सरीखा आकार सिर से ५०-६० अंश दक्षिण की ओर लटकता हुआ दिखता है।

२० पूर्वाषाढ़ा } इनमें प्रत्येक के २-२ तारे हैं। इनके २-२ तारे मिल कर २१ उत्तराषाढ़ा } एक समकोण सरीखा बन जाता है। २ तारे पूर्वाषाढ़ा के आकाश गंगा के बाहर हैं। उत्तराषाढ़ा की उत्तर-दक्षिण लम्बाई से पूर्व-पश्चिम लम्बाई

नक्षत्रों की पहिचान : २९

का प्रमाण प्रायः कुमुना है । अत्रैल के प्रातः के लगभग यह चौकोन सिर पर आता है । देखें चित्र संख्या ३३ । पूर्वाषाढ़ा का आकार हाथी दांत और उत्तराषाढ़ा का आकार मंच ( मर्चैया ) सरीखा माना है ।

३३ अभिजित्—दोनों आषाढ़ा के बाद अभिजित् का तारा लिया जाता है । परन्तु यह क्रांतिबुत प्रवेश से दूर और बाहर है इस कारण इसे नक्षत्र की गणना करते समय छोड़ देते हैं । यह तारा उत्तर की ओर आकाश गंगा के किनारे है और बड़ा प्रकाशवान् है । इसके पास दो छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे एक त्रिकोण सरीखा दिखता है । इस नक्षत्र को मिलाने से २८ नक्षत्र हो जाते हैं परन्तु इसे छोड़कर केवल क्रांति प्रवेश के ही २७ नक्षत्र लिये जाते हैं । यह प्रायः प्रथम श्रेणी का है । देखें चित्र संख्या ३४ ।

२२ श्रवण—इसके ३ तारे हैं जिनमें बीच का तारा पहिली श्रेणी का और बहुत चमकीला है । ये तारे आकाश गंगा में उत्तराषाढ़ा से बहुत उत्तर की कुछ पूर्व कोने में हैं । श्रावण मास की पूर्णमासी को चंद्र इस नक्षत्र के समीप आता है । ये तारे शीघ्र

चित्र संख्या ३३

चित्र संख्या ३५

चित्र संख्या ३६

३३ अभिजित्

२२ श्रवण

२३ धनिष्ठा

पहिलाने जा सकते हैं । एक सीध में ये तीनों तारे हैं और प्रायः उत्तर दक्षिण कुछ तिरछे हैं । इन तीन तारों का आकार वामन औरार के चरण सदृश माना जाता है परन्तु देखने में ये बाण सरीखे दिखते हैं । देखें चित्र संख्या ३५ ।

२३ धनिष्ठा—इसके ५ तारे हैं जो पास-पास हैं । श्रवण के पूर्व कुछ उत्तर बाजू इसका झुमका दिखता है । इसका आकार मूर्दंग सरीखा कहा गया है । नीचे का छोटा तारा छोड़ कर ४ तारों को देखें तो चपटा चौकोन सरीखा दिखता है । यह आकाश गंगा के बाहर है । ये ४ तारे पास-पास और संद ज्योति के हैं । देखें चित्र संख्या ३६ ।

२४ शतभिषक या शतभिषा—इसे शततारक भी कहते हैं । कहा जाता है कि इसमें १०० तारों का झुण्ड है । इसका आकार वृत्त Circle सरीखा बताया गया है परन्तु कोई इसमें से १० तारा को कोई १ ही तारा को ही शतभिषक मानते हैं । यह नवम्बर में व्यालू के समय सिर पर आता है और प्रायः २८ अंश सिर से दक्षिण की ओर दिखता है । इसीके सीध में बहुत नीचे दक्षिण में १ बहुत ही प्रकाशवान् तारा है जिसे याममत्य कहते हैं । दोनों का अन्तर ८ अंश का है । १०० तारे होने से इसका नाम शततार पड़ा है । वहाँ बहुत से तारेगण पास-पास हैं ।

३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

२५ पूर्व भाद्रपद } याममत्स्य और शतभिषक् के प्रकाशवान् तारा को सरल २६ उत्तर भाद्रपद } रेखा से मिलाओ और इस रेखा को उत्तर की ओर बढ़ाते जाओ तो इस रेखा के कुछ पश्चिम की ओर पूर्व भाद्रपद के २ तारे आते हैं। याममत्स्य से जितने अंश पर उत्तर में शतभिषक् है उतने ही अन्तर पर शतभिषक् से उत्तर में पूर्व भाद्रपद का १ तारा है और उसके बाजू ठीक उत्तर में १३° पर पूर्व भाद्रपद का दूसरा तारा है। ये दोनों तारे एक से तेजस्वी हैं। नवम्बर में व्यालू के समय सिर पर आते हैं इस समय शिरोबिन्दु के दक्षिण ५-६ अंश पर रहते हैं और दूसरा उतने पर ही उत्तर को रहता है। इन दोनों तारों के बीच जितना अन्तर है उससे भी अधिक अन्तर पर प्रत्येक के पूर्व में एक-एक तारा है इस प्रकार २ तारे हैं। इन दोनों को उत्तर भाद्रपद कहते हैं। इन दोनों में उत्तर का अधिक तेजस्वी है यह दूसरी श्रेणी का तारा है।

पूर्व भाद्रपद के २ तारे और उत्तर भाद्रपद के २ तारे मिलकर एक चौकोन सरीखा बनता है। देखें चित्र संख्या ३७। भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा इस नक्षत्र के

चित्र संख्या ३७

२५ पूर्वा भाद्रपद, २६ उत्तरा भाद्रपद

चित्र संख्या ३८

२७ रेवती

समीप आता है। पूर्व भाद्रपद का आकार मच्छ सरीखा और उत्तर भाद्रपद का आकार यमल ( जोड़ा ) सरीखा बताया है।

२७ रेवती—इनमें ३२ तारे हैं। आकार मूदङ्ग सरीखा है और वैसा ही दिखता है। ये छोटे-छोटे तारे हैं। उत्तर भाद्रपद के दोनों तारों में से दक्षिण के तारे के आग्नेय कोण के लगभग १०-१० अंश पर तारों की १ कतार है जो पूर्व-पश्चिम गई है। इसमें ६-७ तारे तेजस्वी हैं और प्रायः एक दूसरे के समानांतर पर हैं। इनके दक्षिण में अग्वनी है। देखें चित्र संख्या ३८।

इन नक्षत्रों के अतिरिक्त आकाश गंगा याममत्स्य आदि चित्र में दिये हैं जिनको देखकर आकाश में पहिचानने का प्रयत्न करें।

आकाश गंगा Milk way

यह आकाश में उत्तर से दक्षिण की ओर तिरछी गई है। इससे बहुत से तारों का घना समुदाय होता है, जिसके कारण आकाश का वह भाग श्वेत सरीखा दिखता है जैसे बापल के टुकड़े छाये हों।

नक्षत्रों की पहिचान : ३१

क्रांति प्रदेश का वर्णन आगे मिलेगा ।

अश्विनी से १२ नक्षत्र तक सब तारे विषुवत्बृत्त के उत्तर में हैं और स्वाती अभिजित श्रवण धनिष्ठा पूरवाभाद्रपद उत्तराभाद्रपद रेवती इनके तारे भी विषुवत् बृत्त के उत्तर में हैं । शेष तारे दक्षिण में हैं ।

चन्द्र का भ्रमण मार्ग—चन्द्रमा इस प्रकार नक्षत्रों में से होकर जाता है ।

१—इन १० नक्षत्रों के दक्षिण की ओर से चन्द्रमा जाता है । नक्षत्रों के नाम के आगे उनकी क्रम संख्या दी है ।

( १ ) अश्विनी १, ( २ ) भरणी २, ( ३ ) पुनर्वसु ७, ( ४ ) पू० फा० ११, ( ५ ) उ० फा० १२, ( ६ ) स्वाती १५, ( ७ ) श्रवण २२, ( ८ ) धनिष्ठा २३, ( ९ ) पू० भा० २५, ( १० ) उ० भा० २६ ।

२—इन ५ नक्षत्रों के उत्तर से चन्द्रमा जाता है ।

( १ ) मृग० ५, ( २ ) आर्द्रा ६, ( ३ ) आश्लेषा ९, ( ४ ) हस्त १३, ( ५ ) मूल १९ ।

३—शेष १२ नक्षत्रों के दोनों ओर से, कभी पास से कभी उन को डाकते हुए, चन्द्रमा जाता है ।

( १ ) कृतिका ३, ( २ ) रोहिणी ४, ( ३ ) पुष्य ८, ( ४ ) मघा १०, ( ५ ) चित्रा १४, ( ६ ) विशाखा १६, ( ७ ) अनुराधा १७, ( ८ ) ज्येष्ठा १८, ( ९ ) शतभिषक् २४, ( १० ) पू० वा० २०, ( ११ ) उ० वा० २१, ( १२ ) रेवती २७ ।

आकाश के नकशे को देखने की रीति

नकशे में जो दिखाएँ दी हैं उनके सम्बन्ध में कुछ प्रश्न हो सकता है । कारण यह है कि उत्तर के उपरान्त बाईं ओर पूर्व फिर दक्षिण फिर पश्चिम दिया है । पूर्व के स्थान में पश्चिम होने का कारण नीचे समझाया गया है ।

नकशे को आकाश से मिलान करने के लिये खुले मैदान में बैठें जहाँ से आकाश अच्छी तरह दिखे । मुँह ऊपर की ओर कर आकाश को देखें फिर नकशे को लोटाकर सिर के ऊपर रखें जिससे नकशे की पीठ आकाश की ओर रहे और नकशा पढ़ने में आ सके । नकशे में उत्तर दिया है वह उत्तर ध्रुव की ओर करे और नकशे के पूर्व को पूर्व की ओर रखें तो नकशे की शेष दिखाएँ ठीक स्थिति पर आ जायेंगी । इसके उपरान्त तारा देखने का जो समय बताया है उन्हीं यहीनों की उन्हीं तारीखों को जैसा आगे बताया है उस नकशे के अनुसार ताराओं को खोजें तो अवश्य मिलेगा ।

इसी प्रकार आकाश में देखते-देखते और पहिचानने का प्रयत्न करते रहने से मुख्य-मुख्य नक्षत्रों की अवश्य पहिचान होने लगेगी । जब आकाश खुला रहे और अंधेरी रात हो, तारा गणों का अवलोकन कर नक्षत्र पहिचानने का प्रयत्न करते हैं ।

३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

जब नक्षत्रों की पहिचान हो जावे तो ग्रहों की भी खोज करें। किसी पञ्चांग से प्रगट हो सकता है कि अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र या राशि पर है। इनको समझ लेने से ज्योतिष शास्त्र की ओर बातें शीघ्र समझ में आने लगेंगी।

आकाश का नक्शा देखने का समय

तारागण प्रतिदिन पश्चिम को १° पीछे हटते हैं। जो तारा आज संध्या को ७ बजे सिर पर है वह कल ७ बजने को ४ मिनट शेष रहेंगे तब सिर पर आवेगा। अर्थात् ४ मिनट यहिले दिखेगा।

वृत्त में ३६०° होते हैं और २४ घण्टे में एक वृत्त का चक्कर पूरा होता है। अर्थात् एक दिन रात में सूर्य या नक्षत्र का पूरा एक चक्कर हो जाता है। इस प्रकार से १ घण्टे में १५° या ४ मिनट में १° नक्षत्र चलते हैं। इसी हिसाब से प्रति दिन नक्षत्रों की चाल में १° का अन्तर पड़ जाता है। अन्तर=१ दिन में=४ मिनट। १५ दिन=१ घण्टा। १ मास=२ घण्टा। ३ मास=६ घण्टा।

कारण यह है कि सावन मास से नक्षत्र दिन का मान २३ घण्टा ५६ मि० ४.०९०६ से० का है अर्थात् सावन दिन से नक्षत्र दिन लगभग ४ मिनट छोटा है। नक्षत्र उदय होने से अस्त होकर फिर दूसरे दिन उदय होने तक १ नक्षत्र दिन होता है। वह सूर्य के समय से ४ मिनट छोटा है अर्थात् सूर्य का विषुवांश प्रतिदिन ४ मिनट बढ़ता है।

नक्षत्रों की पहिचान : ३३

३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

तारा की श्रेणी

  • भीहमी दूसरी तीसरी चौथी अन्तर्धे हट्टयो

      • ● ● ●

चित्र संख्या ४०—आह्नपद मास का आकाश का चित्र पट

नक्षत्रों की पहिचान : ३५

तारा की श्रेणी

... त्रिहोत्रे इत्येते मीनस्ये-पोषी संघेनी कटकी

चित्र संख्या ४१—मार्गशीर्ष मास का आकाश का चित्र पट

३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस हिसाब से आज ७ बजे संध्या को जो नक्षत्र सिर पर दिखेगा वह कल ७ बजे संध्या को १° पश्चिम में हुटा दिखेगा। १५ दिन में वहीँ तारा ( १५ × ४ ) = ६० मिनट ( १ घण्टा ) पहिले अर्थात् ६ बजे संध्या को सिर पर आवेगा। ७ बजे संध्या को उसे देखेगे तो १५° पश्चिम को वह तारा हुटा दिखेगा। जो नक्षत्र आज ७ बजे संध्या को सिर पर है वह तीन महीना बाद ७ बजे संध्या को आकाश में दूबते दिखेगा; अर्थात् ३ महीने में ९०° का अन्तर पड़ जाता है। जो तारा आज १० बजे रात सिर पर दिखेगा, एक महीना बाद वह सिर पर ८ बजे रात दिखेगा अर्थात् १ महीने के बाद वह तारा आज से २ घण्टा पहिले उस स्थिति में आवेगा।

इस नियम को ध्यान में रख कर नक्षत्र पर ( नकशा ) देखने का समय जान सकते हैं कि किस-किस तारीख को किस-किस समय पर चित्रपट में दिए हुए तारागण दिखाई देंगे।

नक्षत्र पट ( नकशा ) देखने का समय।

चित्रपट संख्या ३९चित्रपट संख्या ४०चित्रपट संख्या ४१
तारीखमहीनासमय
२० नवम्बर ४ बजे रात८ मई ५ बजे रात२२ अगस्त ४ बजे रात
६ दिसम्बर ३ "२३ " ४ "६ सितम्बर ३ "
२१ " २ "७ जून ३ "२१ " २ "
५ जनवरी १ "२२ " २ "६ अक्टूबर १ "
२० " १२ "७ जुलाई १ "२१ " १२ "
४ फरवरी ११ "२२ " १२ "५ नवम्बर ११ "
२० " १० "६ अगस्त ११ "२० " १० "
७ मार्च ९ "२१ " १० "६ दिसम्बर ९ "
१२ " ८ "५ सितम्बर ९ "२१ " ८ "
६ अप्रैल ७ "२० " ८ "५ जनवरी ७ "

अध्याय ८

राशियों के स्वरूप

आकाश में इन नक्षत्रों का आकार यदि ध्यान पूर्वक देखें तो कुछ आकृतियाँ बनी हुई प्रतीत होंगी। इन्हीं आकृतियों के अनुमान से राशियों का नाम पड़ा है। जैसे :-

१—मेघ=भेड़ा

२—वृष=वैल

राशियों के स्वरूप : ३७

३—मिथुन=स्त्री पुरुष का जोड़ा ।

४—कर्क=केकड़ा ।

५—सिंह=सिंह ।

६—कन्या=नाव में बैठी कुमारी ।

७—तुला=तराजू ।

८—वृश्चिक=विच्छू ।

९—धन=धनुषधारी पुरुष जिसका धड़ घोड़े सरीखा है ।

१०—मकर=सिर हिरन सरीखा और धड़ घोड़े सरीखा ।

११—कुम्भ=हाथों में चड़ा लिए हुए पुरुष ।

१२—मीन= मछलियाँ जिनमें १ का मुँह दूसरी की पूछ की ओर है ।

इनके आगुमानिक चित्र संख्या ४२ से ५३ तक में दिए हैं ।

राशियों के कल्पित चित्र

चित्र संख्या ४२ मेष

चित्र संख्या ४३ वृष

चित्र संख्या ४४ मिथुन

चित्र संख्या ४५ कर्क

चित्र संख्या ४६ सिंह

चित्र संख्या ४७ कन्या

३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चित्र संख्या ४८ तुला

चित्र संख्या ४९ वृश्चिक

चित्र संख्या ५० धन

चित्र संख्या ५१ मकर

चित्र संख्या ५२ कुंभ

चित्र संख्या ५३ मीन

अध्याय ६

पृथ्वी के अक्षांश और देशान्तर का स्पष्टीकरण

पृथ्वी के आकाश और देशान्तर का अधिक काम पड़ता है। इस कारण इनको समझ लेना चाहिए।

पृथ्वी नारंगी के सट्टा गोल है और दोनों सिरों पर चपटी है। पृथ्वी के इन दोनों सिरों को ध्रुव Pole कहते हैं। उत्तर के छोर को उत्तर ध्रुव और जो ठीक उमके विरुद्ध नीचे का छोर है उसे दक्षिण ध्रुव कहते हैं। दोनों ध्रुवों के बीचोंबीच एक कल्पित रेखा गई है उसे धुरी axle कहते हैं। दोनों ध्रुवों के बीचोंबीच एक समानान्तर दूरी पर जो एक कल्पित रेखा पूर्व-पश्चिम पृथ्वी की सतह पर से पृथ्वी को घेरते हुए गई है उसे विषुववृत्त या विषुवत् रेखा या भूमध्य रेखा Equator कहते हैं। इस रेखा से उत्तर या दक्षिण ध्रुव समानान्तर दूरी पर हैं। इसे भूमध्य रेखा कहते हैं।

अक्षांश Latitude

भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण को समानान्तर दूरी पर जो कल्पित रेखाएँ पृथ्वी की सतह पर पूर्व-पश्चिम बनाई गई हैं वे रेखाएँ अक्षांश कहलाती हैं। इन,

पृथ्वी अक्षांश और देशान्तर का स्पष्टीकरण : ३९

रेखाओं से प्रकट होता है कि किसी स्थान की उत्तर या दक्षिण दूरी भूमध्य रेखा से कितनी है।

अक्ष=धुरी, अक्ष+अंश=धुरी का कोणार्मक अंश।

अर्थात् उससे प्रगट होता है कि उस स्थान में पृथ्वी की धुरी का झुकाव कोणार्मक अंश क्या है और भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण किसी स्थान विशेष की कोणार्मक दूरी का ही नाम अक्षांश है।

चित्र संख्या ५४—अक्षांश और देशान्तर

चित्र संख्या ५४ देखने से अक्षांश समझ में आ जायेगा। भूमध्यरेखा पर अक्षांश होता है और उसे निरक्ष देश कहते हैं क्योंकि वहाँ कुछ भी अक्षांश नहीं रहता। यहाँ से ज्यों-ज्यों उत्तर या दक्षिण की ओर जाओ तो अक्षांश बढ़ता जायेगा।

देशान्तर Longitude देश+अंतर=देशों का अंतर।

इसे मध्याह्न रेखा Meridian भी कहते हैं। किसी प्रधान रेखा Prime meridian से पूर्व या पश्चिम में किसी स्थान का अन्तर इससे नापा जाता है।

किसी प्रधान मध्याह्न रेखा से आरम्भ कर समानान्तर दूरी पर भूमध्य रेखा पर जो रेखाएं पूर्व-पश्चिम की दूरी बताने को खींची जाती हैं, वे ही देशान्तर रेखाएं कहलाती हैं। इन रेखाओं का एक छोर उत्तर ध्रुव में और दूसरा छोर दक्षिण ध्रुव

४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

में मिलता है। ये रेखाएँ भूमध्य रेखा को काटते हुए उत्तर और दक्षिण को जातो हैं। इनके बीच का हिस्सा अपने शिर के ऊपर से होकर जाता है। ये भी कल्पित रेखाएँ हैं। यद्यपि ये रेखाएँ उत्तर दक्षिण खींची गई हैं परन्तु इससे किसी स्थान का पूर्व पश्चिम अन्तर प्रधान मध्याह्न रेखा के स्थान से मालूम होता है जैसा चित्र संख्या ५४ के देखने से प्रकट होगा। जब सूर्य इस रेखा पर आता है तो उन सब स्थानों में एक ही समय मध्याह्न ( दोपहर ) होता है, जहाँ-जहाँ से वह रेखा जाती है, उसके पैर के नीचे वाले देशों में उस समय अर्द्धरात्रि होती है। इसी कारण इसे मध्याह्न रेखा भी कहते हैं।

प्रधान मध्याह्न रेखा Prime meridian

जहाँ से आदि स्थान मानकर पूर्व-पश्चिम अन्तर नापा जाता है। पहिले उर्ज्जैन से—अर्थात् जो रेखा उर्ज्जैन पर से होते हुए उत्तर दक्षिण गई है, उससे—देशान्तर नापा जाता था। परन्तु अब इंग्लैण्ड के ग्रीनविच नामक स्थान को प्रधान मध्याह्न रेखा मान कर देशान्तर ( ग्रीनविच से ही ) नापा जाता है। और आज कल के सब नक्शों में देशान्तर इसी के अनुसार बताया जाता है।

परन्तु ज्योतिष शास्त्र में पंचांग बनाने आदि के लिए अब भी उर्ज्जैन को प्रधान रेखा मान कर उर्ज्जैन से देशान्तर निकालते हैं।

प्राचीन मध्याह्न रेखा इन देशों पर से जाती है :-

लंका, देवकांची, ध्वेत पर्वत, पर्जली, वत्सगुलम, अवन्ती, गर्गराट, कुशक्षेत्र, रोहितक और मेरु। इन स्थानों का नाम ज्योतिष ग्रन्थों में आया है। इनमें से कुछ स्थानों के नाम प्राचीन होने से नहीं समझ पड़ते परन्तु अवन्ती ( उर्ज्जैन ), कुशक्षेत्र, लंका आदि के नाम सबको प्रकट हैं। इस कारण भारत वर्ष में उर्ज्जैन पर से ही देशान्तर नापा जाता है।

चित्र संख्या ५४ में गोलाकार पृथ्वी बताई है। इसके उत्तर में उत्तर ध्रुव और दक्षिण में दक्षिण ध्रुव है और (अ. व.) कल्पित रेखा घुरी है पृथ्वी के बीच से जो (पू. म.) रेखा दोनों ध्रुवों के समानान्तर पर पूर्व-पश्चिम गई है वही भूमध्य रेखा है।

इस रेखा के उत्तर और दक्षिण को जो आड़ी रेखाएँ लकीर द्वारा बताई गई हैं वे अक्षांश हैं। ये रेखाएँ पूर्व-पश्चिम खींची गई हैं। ये आड़ी रेखाएँ उत्तर-दक्षिण नाप के लिए मानों नाप सूचक हृदबंदी हैं।

भूमध्य रेखा पर अक्षांश ० है। यहाँ से उत्तर ध्रुव तक १ से ९० अंश तक अक्षांश बने हैं। इसी प्रकार दक्षिण ध्रुव की ओर भी १ से ९० अंश तक अक्षांश दिये हैं क्योंकि एक वृत्त के चौथाई भाग में ९० अंश होते हैं। भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण में कोई स्थान जितने अंश दूरी पर होगा, वही अंश उस स्थान का अक्षांश है। वह स्थान उत्तर में होगा तो उत्तर अक्षांश कहलायेगा, दक्षिण में होगा तो दक्षिण अक्षांश कहलायेगा। इन अक्षांशों का नाप चित्र संख्या ५४ में गोला के किनारे-किनारे बताया है।

पृथ्वी के अक्षांश और देशान्तर का स्फोटिकरणः ४१

देशान्तर—जो रेखाएं उत्तर ध्रुव से होकर भूमध्य रेखा को काटती हुई दक्षिण ध्रुव में जाकर मिली हैं ये देशान्तर रेखाएं हैं, जो बिन्दुओं द्वारा चित्र में बताई गई हैं। ये रेखांश भी कहलाती हैं। इनका नाप पूर्व पश्चिम होता है। उत्तर-दक्षिण रेखाएं तो केवल नाप बताने वाली द्विबंदी रेखाएं हैं।

कोई स्थान ग्रीनविच या उज्जैन (किसी प्रधान मध्याह्न रेखा के स्थान से) चाहे वह वहाँ से पूर्व या पश्चिम में हो उस स्थान से कितने अंश की दूरी पर है, बताया जाता है। यदि पूर्व में अपना देश है तो पूर्व देशान्तर होगा, पश्चिम में है तो पश्चिम देशान्तर होगा।

मान लो कि (क.) स्थान की स्थिति जाननी है। यह स्थान भूमध्य रेखा से ३० अंश उत्तर में है। देखें उस लकीर के छोर पर ३० अंश लिखा है, तो उस स्थान का अक्षांश ३० अंश उत्तर हुआ। अब उत्तर से दक्षिण जाने वाली रेखा का नाप देखें जो (क.) स्थान पर से जाती है। यह देशान्तर रेखा बिन्दुओं से बताई गई है। नीचे १४० लिखा है यह नाप पश्चिम से पूर्व का है। यदि ० स्थान पर प्रधान मध्याह्न रेखा का देश है तो वहाँ से (क.) का देशान्तर १४०° पूर्व हुआ। इस प्रकार (क.) का अक्षांश ३०° उत्तर और देशान्तर १४०° पूर्व हुआ।

दूसरा उदाहरण—मान लो (ख.) स्थान का अक्षांश देशान्तर जानना है। आड़ी अक्षांश की रेखायें १०° और २०° के बीच में हैं (ख.) दोनों के बीच १० का अन्तर है मान लो १८° के आगे और ५° आगे (ख.) है तो भूमध्य रेखा से १०° + ५° = १५° दूरी पर है। इससे इसका अक्षांश १५° दक्षिण हुआ। अब देशान्तर जानना है। मान लो मध्याह्न रेखा का स्थान ८१°—पर है जहाँ (ग.) है। ३०° और ४०° देशान्तर रेखा के बीच (ख.) स्थान है। मान लो ३०° के आगे ४° और चलकर यह स्थान है अर्थात् ३४° पर (ख.) स्थान है, तो यह स्थान मध्याह्न रेखा से पश्चिम में हुआ। अब दोनों का अन्तर निकाला (मध्याह्न रेखा ८१° अपना स्थान ३४°) = ४७° देशान्तर हुआ। इससे (ख.) का देशान्तर ४७° पश्चिम हुआ। क्योंकि (ग.) से ४७° पश्चिम में है।

(१) किसी स्थान के अक्षांश जानने की युक्ति

एक पतली सुतली लेकर उसका एक छोर सम धरातल (भूमि) में लगाकर रखें और दूसरा छोर ध्रुव तारा की सीध मिलाकर किसी ऊँची चीज पर (या किसी बांस को गाड़ कर या किसी वृक्षादि से) इस प्रकार बांध दें कि सुतली का ऊपरी छोर ठीक ध्रुव तारा की सीध में रहे, तो उस सुतली से जमीन के धरातल पर एक कोण बनेगा। उस कोण को नाप लें, जितने अंशादि वह कोण नाप में होगा वही वहाँ का अक्षांश होगा। यहाँ पर २३° का कोण बना है इससे अक्षांश २३° हुआ। देखें चित्र संख्या ५५।

४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चित्र संख्या ५५-अक्षांश और ध्रुव की ऊँचाई का नाप

सारांश इसका यह है कि उस स्थान पर ध्रुव तारा की जो ऊँचाई है उसी ऊँचाई का कोणात्मक अंश वहाँ का अक्षांश होता है। उत्तरी गोलार्द्ध के किसी भी स्थान का अक्षांश ध्रुव तारा की ऊँचाई से ज्ञात हो सकता है। जैसे लाहौर में ध्रुव तारा की ऊँचाई ३१°-३०' है तो वहाँ अक्षांश भी ३१°-३०' होगा। नरसिंहपुर में ध्रुव की ऊँचाई का कोण २२°-५७' है तो यहाँ का अक्षांश २२°-५७' हुआ।

उत्तरी गोलार्द्ध North Hemis Phere

भूमध्य रेखा से पृथ्वी के २ भाग हो जाते हैं। एक भूमध्य रेखा से उत्तर का आधा भाग, दूसरा दक्षिण का आधा भाग। भूमध्य रेखा से जो उत्तर का भाग है वही उत्तरी गोलार्द्ध है। इसके दक्षिण का भाग दक्षिणी गोलार्द्ध कहलाता है।

ध्रुव तारा उत्तर में है इसलिए वह केवल उत्तरी गोलार्द्ध वालों को दिखता है, यह दक्षिणी गोलार्द्ध वालों को नहीं दिखता।

(२) अक्षांश जानने की दूसरी रीति।

२१ मार्च या २३ सितम्बर को (जब दिन-रात बराबर रहता है) किसी स्थान के मध्याह्न कालीन (दोपहर के) सूर्य की जो ऊँचाई है वह ऊँचाई ९०° से घटा दें, घटाने से जो शेष रहे, वह उस स्थान का अक्षांश होगा।

जिस प्रकार ध्रुव तारा की ऊँचाई निकाली गई थी उसी प्रकार सूर्य की ऊँचाई भी निकाली जाती है। देखें चित्र संख्या ५६ और ५७

पृथ्वी के अक्षांश और देशान्तर का स्पष्टीकरण : ४३

चित्र संख्या ५६-इलाहाबाद में मध्याह्न के समय सूर्य की ऊँचाई

चित्र संख्या ५७-नरसिंहपुर में मध्याह्न के समय सूर्य की ऊँचाई

जैसे यहाँ इलाहाबाद की भिन्न-भिन्न समय की सूर्य की ऊँचाई नापी गई है, २१ मार्च या २३ सितम्बर को मध्याह्न समय की ऊँचाई ६४° है तो ( ९०-६४° ) = २५° अक्षांश हुआ ।

नरसिंहपुर में ऊँचाई ( उसी समय की ) ६७° है तो ( ९०-६७ ) = २३° वहाँ का अक्षांश हुआ ।

(३) स्कूल के नक्शों में प्रायः प्रत्येक स्थान का अक्षांश मिल सकता है। नक्शे में अपना स्थान खोजकर अक्षांश जान लें। यदि अपना स्थान न मिले तो समीप के किसी बड़े स्थान को खोज कर उससे अक्षांश जान लें।