सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
में मिलता है। ये रेखाएँ भूमध्य रेखा को काटते हुए उत्तर और दक्षिण को जातो हैं। इनके बीच का हिस्सा अपने शिर के ऊपर से होकर जाता है। ये भी कल्पित रेखाएँ हैं। यद्यपि ये रेखाएँ उत्तर दक्षिण खींची गई हैं परन्तु इससे किसी स्थान का पूर्व पश्चिम अन्तर प्रधान मध्याह्न रेखा के स्थान से मालूम होता है जैसा चित्र संख्या ५४ के देखने से प्रकट होगा। जब सूर्य इस रेखा पर आता है तो उन सब स्थानों में एक ही समय मध्याह्न ( दोपहर ) होता है, जहाँ-जहाँ से वह रेखा जाती है, उसके पैर के नीचे वाले देशों में उस समय अर्द्धरात्रि होती है। इसी कारण इसे मध्याह्न रेखा भी कहते हैं।
प्रधान मध्याह्न रेखा Prime meridian
जहाँ से आदि स्थान मानकर पूर्व-पश्चिम अन्तर नापा जाता है। पहिले उर्ज्जैन से—अर्थात् जो रेखा उर्ज्जैन पर से होते हुए उत्तर दक्षिण गई है, उससे—देशान्तर नापा जाता था। परन्तु अब इंग्लैण्ड के ग्रीनविच नामक स्थान को प्रधान मध्याह्न रेखा मान कर देशान्तर ( ग्रीनविच से ही ) नापा जाता है। और आज कल के सब नक्शों में देशान्तर इसी के अनुसार बताया जाता है।
परन्तु ज्योतिष शास्त्र में पंचांग बनाने आदि के लिए अब भी उर्ज्जैन को प्रधान रेखा मान कर उर्ज्जैन से देशान्तर निकालते हैं।
प्राचीन मध्याह्न रेखा इन देशों पर से जाती है :-
लंका, देवकांची, ध्वेत पर्वत, पर्जली, वत्सगुलम, अवन्ती, गर्गराट, कुशक्षेत्र, रोहितक और मेरु। इन स्थानों का नाम ज्योतिष ग्रन्थों में आया है। इनमें से कुछ स्थानों के नाम प्राचीन होने से नहीं समझ पड़ते परन्तु अवन्ती ( उर्ज्जैन ), कुशक्षेत्र, लंका आदि के नाम सबको प्रकट हैं। इस कारण भारत वर्ष में उर्ज्जैन पर से ही देशान्तर नापा जाता है।
चित्र संख्या ५४ में गोलाकार पृथ्वी बताई है। इसके उत्तर में उत्तर ध्रुव और दक्षिण में दक्षिण ध्रुव है और (अ. व.) कल्पित रेखा घुरी है पृथ्वी के बीच से जो (पू. म.) रेखा दोनों ध्रुवों के समानान्तर पर पूर्व-पश्चिम गई है वही भूमध्य रेखा है।
इस रेखा के उत्तर और दक्षिण को जो आड़ी रेखाएँ लकीर द्वारा बताई गई हैं वे अक्षांश हैं। ये रेखाएँ पूर्व-पश्चिम खींची गई हैं। ये आड़ी रेखाएँ उत्तर-दक्षिण नाप के लिए मानों नाप सूचक हृदबंदी हैं।
भूमध्य रेखा पर अक्षांश ० है। यहाँ से उत्तर ध्रुव तक १ से ९० अंश तक अक्षांश बने हैं। इसी प्रकार दक्षिण ध्रुव की ओर भी १ से ९० अंश तक अक्षांश दिये हैं क्योंकि एक वृत्त के चौथाई भाग में ९० अंश होते हैं। भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण में कोई स्थान जितने अंश दूरी पर होगा, वही अंश उस स्थान का अक्षांश है। वह स्थान उत्तर में होगा तो उत्तर अक्षांश कहलायेगा, दक्षिण में होगा तो दक्षिण अक्षांश कहलायेगा। इन अक्षांशों का नाप चित्र संख्या ५४ में गोला के किनारे-किनारे बताया है।