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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

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पृथ्वी के अक्षांश और देशान्तर का स्फोटिकरणः ४१

देशान्तर—जो रेखाएं उत्तर ध्रुव से होकर भूमध्य रेखा को काटती हुई दक्षिण ध्रुव में जाकर मिली हैं ये देशान्तर रेखाएं हैं, जो बिन्दुओं द्वारा चित्र में बताई गई हैं। ये रेखांश भी कहलाती हैं। इनका नाप पूर्व पश्चिम होता है। उत्तर-दक्षिण रेखाएं तो केवल नाप बताने वाली द्विबंदी रेखाएं हैं।

कोई स्थान ग्रीनविच या उज्जैन (किसी प्रधान मध्याह्न रेखा के स्थान से) चाहे वह वहाँ से पूर्व या पश्चिम में हो उस स्थान से कितने अंश की दूरी पर है, बताया जाता है। यदि पूर्व में अपना देश है तो पूर्व देशान्तर होगा, पश्चिम में है तो पश्चिम देशान्तर होगा।

मान लो कि (क.) स्थान की स्थिति जाननी है। यह स्थान भूमध्य रेखा से ३० अंश उत्तर में है। देखें उस लकीर के छोर पर ३० अंश लिखा है, तो उस स्थान का अक्षांश ३० अंश उत्तर हुआ। अब उत्तर से दक्षिण जाने वाली रेखा का नाप देखें जो (क.) स्थान पर से जाती है। यह देशान्तर रेखा बिन्दुओं से बताई गई है। नीचे १४० लिखा है यह नाप पश्चिम से पूर्व का है। यदि ० स्थान पर प्रधान मध्याह्न रेखा का देश है तो वहाँ से (क.) का देशान्तर १४०° पूर्व हुआ। इस प्रकार (क.) का अक्षांश ३०° उत्तर और देशान्तर १४०° पूर्व हुआ।

दूसरा उदाहरण—मान लो (ख.) स्थान का अक्षांश देशान्तर जानना है। आड़ी अक्षांश की रेखायें १०° और २०° के बीच में हैं (ख.) दोनों के बीच १० का अन्तर है मान लो १८° के आगे और ५° आगे (ख.) है तो भूमध्य रेखा से १०° + ५° = १५° दूरी पर है। इससे इसका अक्षांश १५° दक्षिण हुआ। अब देशान्तर जानना है। मान लो मध्याह्न रेखा का स्थान ८१°—पर है जहाँ (ग.) है। ३०° और ४०° देशान्तर रेखा के बीच (ख.) स्थान है। मान लो ३०° के आगे ४° और चलकर यह स्थान है अर्थात् ३४° पर (ख.) स्थान है, तो यह स्थान मध्याह्न रेखा से पश्चिम में हुआ। अब दोनों का अन्तर निकाला (मध्याह्न रेखा ८१° अपना स्थान ३४°) = ४७° देशान्तर हुआ। इससे (ख.) का देशान्तर ४७° पश्चिम हुआ। क्योंकि (ग.) से ४७° पश्चिम में है।

(१) किसी स्थान के अक्षांश जानने की युक्ति

एक पतली सुतली लेकर उसका एक छोर सम धरातल (भूमि) में लगाकर रखें और दूसरा छोर ध्रुव तारा की सीध मिलाकर किसी ऊँची चीज पर (या किसी बांस को गाड़ कर या किसी वृक्षादि से) इस प्रकार बांध दें कि सुतली का ऊपरी छोर ठीक ध्रुव तारा की सीध में रहे, तो उस सुतली से जमीन के धरातल पर एक कोण बनेगा। उस कोण को नाप लें, जितने अंशादि वह कोण नाप में होगा वही वहाँ का अक्षांश होगा। यहाँ पर २३° का कोण बना है इससे अक्षांश २३° हुआ। देखें चित्र संख्या ५५।