सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
यामोत्तरवृत्त Meridian
आकाशीय दोनों ध्रुवों से जो रेखाएं आकाशीय नाड़ीवृत्त पर लम्ब होकर जाती हैं वे कल्पित रेखाएं यामोत्तरवृत्त कहलाती हैं। यह रेखा उसी प्रकार की हैं जैसे पृथ्वी की देशान्तर रेखा हैं। यामोत्तर=याम+उत्तर। याम=दक्षिण। उत्तर से दक्षिण जाने वाली कल्पित रेखाएं जो नाड़ीवृत्त को काटती हुई जाती हैं वे ही रेखायें यामोत्तरवृत्त हैं।
इसी यामोत्तरवृत्त से पूर्व या पश्चिम का जो अन्तर है वह भोग का भोगांश या क्षेत्र Celestial longitude कहलाता है। आकाश में एक मुख्य यामोत्तरवृत्त से यह पूर्व या पश्चिम को नापा जाता है और यह अन्तर क्रांतिवृत्त पर नापा जाता है। इसका मुख्य यामोत्तरवृत्त वसन्त सम्पात है जिसके विषय में आगे बताया गया है।
ऊपर जो नाड़ीवृत्त का वर्णन किया है उसके विषय में ध्यान रहे कि इस नाड़ीवृत्त का आकाश में कोई स्थिर और पक्का वृत्त नहीं है। जैसे पृथ्वी में भूमध्य रेखा को स्थिति निश्चित है ठीक वैसी स्थिति इस आकाशीय नाड़ीवृत्त की नहीं है। क्योंकि बहुत वर्षों के उपरान्त उसके स्थान में कुछ परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण भिन्न-भिन्न काल में वह आकाश का भिन्नता पूर्वक भाग करता है, क्योंकि सारा विश्व चल रहा है। इसी कारण नाड़ीवृत्त से आकाशीय अक्षांश नहीं नापा जाता।
क्रांति Declination
आकाशीय नाड़ीवृत्त से क्रांतिवृत्त की ओर ग्रहों का अन्तर इस नाड़ीवृत्त से नापा जाता है जिससे प्रकट हो कि कोई तारा नाड़ीवृत्त से उत्तर या दक्षिण को कितने अन्तर पर है। जितने अंश की दूरी पर वह ग्रह या तारा उपरोक्त नाप से निकलेगा वही तारा उस ग्रह या तारे की उत्तर या दक्षिण क्रांति होगी।
अक्षांश=शर=celestial latitude
आकाश में अक्षांश क्रांतिवृत्त से नापे जाते हैं क्योंकि क्रांतिवृत्त की स्थिति स्थिर और निश्चित है।
क्रांतिवृत्त के समानान्तर उत्तर या दक्षिण दूरी पर जितने अंश की दूरी पर वह ग्रह होगा वही उसका अक्षांश होगा। आकाशीय अक्षांश को शर भी कहते हैं। इसी को विलेप भी कहते हैं।
क्रांतिवृत्त से उत्तर या दक्षिण के ग्रहों या तारा के अन्तर को शर या अक्षांश कहते हैं परन्तु नाड़ीवृत्त से ग्रह आदि की उत्तर या दक्षिण की दूरी को क्रांति कहते हैं।
सूर्य सदा क्रांतिवृत्त पर ही चलता है। इससे उसका कोई शर नहीं होता परन्तु नाड़ीवृत्त से उसका अन्तर घटता बढ़ता-रहता है, इस कारण सूर्य की क्रांति घटती-बढ़ती रहती है। उसी प्रकार चन्द्र आदि ग्रह जब क्रांतिवृत्त पर रहते हैं तब उनका कोई शर नहीं रहता।