सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) जा० भरण, फल दीपि० आदि ने लग्न अष्ट० वर्ग नहीं दिया । शेष. ग्रन्थों में दिया है यहाँ वू० जा० वृहृत्पारा० आदि के अनुसार ही दिया है ।
लर्न अ० वर्ग में कहीं चन्द्र में १२ भी दिया है और शुक्र में ११ नहीं दिया ॥ परन्तु यहाँ वृ० जा० आदि के अनुसार चन्द्र में १२ नहीं दिया । और शुक्र में ११ दिया है ।
(९) राहु का शुक्र में ५ नहीं दिया शनि का १२ अधिक किसी में दिया है इस प्रकार मतभेद है ।
अष्टक वर्ग चक्र उदाहरण का स्पष्टीकरण
यहां लग्न का अष्टक वर्ग भरना समझा देते हैं जिसके समझ लेने पर उदाहरण देख कर सम्पुर्ण अष्टक वर्ग चक्र भरना आ जायगा । छ्न अष्टकवगं चक्र आठवां है उसे देखो । उसमें सूर्य ३,४,६,१०,११,१२ स्थान में शुभ रेखा देता है। यहाँ सूर्य मीन में है वहाँ से गिनना आरम्भ किया वहाँ पहले स्थान में ० रखा । वहाँ से दूसरा स्थान मेष में भी० है तीसरे स्थान वृष में शुभ की रेखा दी है । चोथे स्थान मिथुन में भी शुभ की रेखा दी है। पांचवा स्थान कर्क में ० हैं । छठे स्थान सिंह में शुभ रेखा है । ७,८,९ स्थान कन्या तुला वृश्चिक में ० है आगे १०,११,१२ स्थानों शुभ की रेखा है इससे नवाँ स्थान घन, दशम मकर और एकादश स्थान कुम्भ में रेखा दी है । चन्द्र जहाँ है वहाँ से इसीप्रकार ३,६,१०,११ स्थान में शुभ रेखा पड़ी है शेष अशुभ स्थानों में ० दिया है अर्थात् चन्द्र कुम्भ में है वहाँ से तीसरा स्थान मेष राशि, छठा स्थान ककं में, १० स्थान वृश्चिक राशि में और चन्द्र से म्यारहवें स्यान धन राशि में शुभता सूचक रेखा दी है । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह या छन्न से गिनती करके उनके शुभ स्थानों में रेखा दी है शेष अशुभ में ० दिया है। ध्यान पुर्वक आगे भी उदाहरण देखने से सव समझ में आ जायगा ।
इन अष्टक वर्ग चक्रों में एक विशेषता यहाँ दी है । सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि लग्न आदि क्रम से जैसा कि इतर ग्रंथकारों ने दिया है, यहाँ न देकर शनि गुरु मंगल सूर्य शुक्र बुध चन्द्र और लग्न इस क्रम से दिया है। इसका कारण यह है जब अष्टक वर्ग के अनुसार उसके प्रभाव का समय जानने की आवश्यकता हो तो उस राशि के पूरे तीस अंश में इसी क्रम से ग्रहों का प्रभाव पडेगा । पहिले शनि का फिर गुरु का फिर मंगल का इत्यादि यहाँ दिये क्रम से अपने-अपने अष्टमांश में प्रभाव पड़ेगा ।