सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टक वर्ग विचार : १०९.
"पर्वं अष्टक वर्ग कुण्डली पर विचार
(१) जहाँ कुम्भ में २३ रेखा=कनिष्ट
फल । मीन में २६ वृष में २७, तुला में
३० रेखा है=मध्यम शुभ। ककं ६० सिंह
और मकर ३२=कुछ अधिक मध्यम से
शुभ । मेष और मिथुन ३७, धन ३९-्श्रेष्ठ
फल । वृश्चिक ४३ का अति श्रेष्ठ फल
होगा ।
(२) लग्न में ३७ रेखा होने से भाग्यवान् होगा ।
« (३) सबसे लग्न की रेखा अधिक हो तो भाग्यवान् होता है सबसे कम होने से
भाग्यहीन होता है 1
(४) दशम से एकादश में कम रेखा होने से लाभ अल्प व्याधि अधिक हो यहाँ
लान रेखा होने से लाभ आदि अधिक हो वहाँ दशम से लाभ में रेखा अधिक होने से शुभ है।
हृ (५) दशम से लग्न की रेखा अधिक होने से लाभ मान आदि अधिक होगा मध्यम
से मध्यम फल, हीन से भोग सम्पत्ति की हानि होती है यहाँ दशम से लग्न में अधिकः
रेखा है शुभ है लाभजनक है ।
(६) लग्न की दिशा--लग्न आदि १२ राशियों का सबं मागे से पूर्व आदि क्रम से'
तीन-तीन राशियाँ पूर्व आदि दिशा में जानना ।
जैसे पूर्वे-१-१२-११ भाव ] प्रत्येक दिशा के ३ राशियों का फल योग
दक्षिण--१०- ९-८ „ ( जहां अधिक हो उस दिशा में शुभ या पश्चिम--७- ६-५ ,, । लाभ । जहाँ हीन फल हो वहाँ अशुभ ।
उत्तर--४- ३-२ » J
यहाँ लग्न से लाभ तक ३७+ २७+ ३७=१०१ पूर्व यहाँ पश्चिम दिशा
दशम से अष्टम , २६+ २३+ ३२-८१ दक्षिण | में अधिक रेखा हैं वहाँ से सप्तम से पंचम , २९--४३ -- ३०१११ पश्चिम|छाभ होगा उससे कम रेखा
चतुर्थ से धन ,, २९+ ३२+ ३१-९१ उत्तर | उत्तर की हैं ।
यहाँ ५४ से ७५ तक क्षीण फल होता है । ७५ से ९० तक योग में मध्यम फल
और ६० के ऊपर उत्तम फल होता है । यहाँ दक्षिण दिशा में मध्यम फल है । शेष
दिशाओं में उत्तम फल है । उन २ दिशाओं से लाभ होगा ।
(७) जिस दिशा में रेखा अधिक हों वहाँ स्वोच्च आदि गत ग्रह भी हो उस दिशा
में कायं सिद्ध होता है ।
(८) धनेश जिस दिशा में हो वहाँ से घन लाभ । अष्टमेश जिस दिशा में हो वहाँ
मृत्यु । वहाँ धनेश चन्द्र नवम में दक्षिण है और अष्टमेश शनि तृतीय उत्तर में है ।