सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें4१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अष्टक वर्ग रेखा का विशेष विचार
(१) शुक्र या पाप ग्रह की रेखा--सब शुभ फल देती है ।
(२) शुभ या पाप ग्रह का शुन्य--दुःख देने वाले हैं ।
(३) रेखा अधिक हो तो शूभ फल, बिन्दु अधिक हो तो अशुभ फल होता है रेखा
और बिन्दु समान हो तो--समफल प्राप्त होता है यदि गोचर में अन्तर न होवे तव ।
(४) १ रेखा अधिक--लक्ष्मी प्राप्त १ बिन्दु अधिक---उद्देग ।
२ रेखा अधिक--भोग प्राप्त २ विन्द्र अधिक--हानि ।
३ रेखा अधिक--सूख प्राप्त ३ बिन्दु अधिक--रोग ।
४ रेखा अधिक*न्चेक्रंवर्ती राजा हो ४ बिन्दु अधिक--मृत्यु भय ।
(५) ग्रह गोचर में श्रेष्ठ हो परन्तु अष्टक वग में मध्यम हो और अपनी दशा में
अधम हो तो बहुत खराब ही होता है ।
(६) अष्टक वर्ग से किसी शुभ आदि कार्य करते समय उस दिन का अष्टक वर्ग
बनाकर प्रत्येक ग्रह की रेखाओं का योग करके शुभाशुभ फल का विचार होता है ।
इसे लिये जिस कायं में जिस ग्रह का फल कहा है वह ग्रह जब श्रेष्ठ राशि में हो
तो उस कार्य को करना । जेसे चन्द्र बल सब कायं में देखा जाता है जब चन्द्रमा श्रेष्ट
राशि में हो तभी शुभ कार्य का आरम्भ करना । कष्टप्रद राशियों में शुभ कार्य नहीं
करना । उपनयन विवाह आदि कार्य में गुरु ग्रह की शुद्धता ली जाती है परन्तु वह भी
अष्टक वर्ग में शुद्ध हो तभी ग्रहण करना गोचर शुद्धि नहीं भी हो प रन्तु अष्टकवगं से
शुद्धि हो अर्थात् उस राशि में अधिक रेखा हों तो वह समय शुद्ध समझना । अष्टकवगं
शुद्ध हो तो गोचर शुद्ध विचारने की आवश्यकता नहीं है ।
(७) जिसके समुदाय अष्टकवगं में दशवे भाव से एकादश भाव में अधिक रेखा हो
और एकादश से व्यय भाव में अल्प रेखा हो तथा व्यय से लग्न में अधिक रेखा हो तो
वह भोगवान सुखी और धनवान् होता है ।
(८) जिस राशि में कम रेखा होने से अनिष्ट फल कहा है उस राशि के सम्वत्सर
सें जब उस राशि का मास (सौर मास) हो तथा उसी राशि में यदि चन्द्रमा झा जाय
इस प्रकार कम से कम ३ ग्रहों का योग उस राशि में हो तभी पूर्वोक्त फल की ( अर्थात्
पहिले जो सामूहिक रेखा का अच्छा या बुरा फल बता चुके हैं उसकी ) संभावना है । यदि उस राशि में और ग्रहों का संयोग हो जाय तब उक्त फल निश्चित रूप से समझना ।
( ९ ) जिस राशि में ३० से अधिक रेखा हो उस राशि के सम्वत्सर और मास एवं
नक्षत्र में धन पुत्र तथा अनेक सुख की वृद्धि हो ४० से अधिक रेखा हो तो धन पुत्रादि प्राप्ति के साथ ही पुण्य प्रतिष्ठा एवं सम्पत्ति की भी वृद्धि होती है। ( १० ) जो ग्रह उच्च, मित्र गृही हो और जो केन्द्र कोण उप्रचय में हो, शुभवगं में हो, वलवान् हो उनकी भी यदि अल्प रेखा हो तो हानिकारक हैं । (११) जो ग्रह नीच या पाप ग्रह के वर्ग में युक्त हो जो गुलिक राशि के स्वामी