सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टक वर्ग विचार : १३५
करने से अति शुभदायक होता है। ऐसों के साथ व्यापोर आदि करने से लाभ होता है। (७) चन्द्रमा से अष्टम भाव का स्वामी जिस नक्षत्र में हो उसके त्रिकोण के नक्षत्र में रोग दुःख आदि होता है । जेसे चन्द्रमा कुंभ राशि में है उससे अष्टम कन्या राशि हुई । कन्या का स्वामी बुध है यह पूर्वभाद्रपद में है तो इसमें या इसके त्रिकोण के नक्षत्र पुनर्वसु और विशाखा में व्याधि दुःख आदि होंगे । इसमे शुभ काम न करना । (८) चन्द्र से गिनने पर चतुर्थ के स्वामी या अष्टम के स्वामी का नवांश निकालो जब इस स्थान में या इससे त्रिकोण में सूर्यं जावे तब माता की हानि संभव है । इसी प्रकार पिता की मृत्यु का विचार लग्न से करना । मंगल के अष्टकवग से फल विचार
मंगल के अष्टकवर्ग से भाई, पराक्रम और धेय का विचार होता है मंगल जिस राशि में बैठा हो उस राशि से तीसरे स्थान से भाई का विचार होता है। (१) इस तीसरे स्थान से एवं इस तीसरे स्थान के अष्टम स्थान से भाई के कष्ट
का विचार करने को उस स्थान की रेखा से मंगळ के अष्टकवर्ग योगपिड से गुणा कर २७ का भाग देनो शेष नक्षत्र या उसके त्रिकोण में गोचर में जब शनि आवे तब भाई को कष्ट होगा या योगपिंड और उक्त राशि रेखा + १२=शेष राशि या उसके त्रिकोण
में जव शनि आवे तव भ्रातु कष्ट होगा । जैसे वृश्चिक में मंगल है उससे तीसरे स्थान में मकर है । मंगल अष्टक० में मकर में २ रेखः है योग पिंड ५५ है। २% ५५११० ~+ २७=४३३=्शेष २ भरणी नक्षत्र या उसके त्रिकोण के नक्षत्र पू० फा० या पू० षा०
पर जब शनि गोचर में आयेगा तव भाई को कष्ट होगा ।
या भ्रातृ स्थान यहाँ मकर आया उससे अष्टम सिंह हुआ। सिंह में ५ रेखा हैं ५% योग पिंड ५१--२७५-:-१२-२२३१--शेष ११ कुंभ राशि या इसके त्रिकोण की
मिथुन या तुळा राशि में जब शनि आवेगा तव भ्रातृ कष्ट होगा ।
(२) त्रिकोण शोधन के पश्चात् जिस रथान में अधिक रेखा हों उससे पृथ्वी, घर
सत्री एवं परिवार की वृद्धि, भ्रातृ का उत्तम सुख प्रगट होता है जब मंगल उस राशि
में जावे ।
(३) मंगल अष्ट० में जिस राशि में हो उस राशि में ८ रेखा हों तो जिमीदार हो ।
(४) मंगल लग्न, द्वितीय या दशम मों हो और उस स्थान की ८ रेखा हों तो
राजा हो किसी राज वंश का हो तो अवश्य राजा होता है ।
(५) यदि मंगल उच्च या स्वगृही होकर लग्न, चतुर्थ नवम या दशम में हो और
उस राशि पर ८ रेखा हों तो वह लक्षाधीश बहुत धनाढ्य और राजा होता है ।
(६) यदि मंगल केन्द्र में हो ९,५,१०, या ८ राशि का हो और मंगल की ४ रेखा
से अधिक हो तो अतिधनी हो । (७).मंगल दशम या लग्न में हो और मंगल की ८ रेखा हो तो धनी हो । यदि राजकुल का हो तो अवश्य राजा होता है । यदि मंगल उच्च का या स्वक्षेत्री हो तो
महाराजा होता है ।